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यूक्रेन को क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाता है रूस
- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
यूक्रेन यूरोप का दूसरा सबसे बड़ा देश है.
एक तरफ़ तो इसमें बेहद उपजाऊ मैदानी इलाक़ा है तो दूसरी ओर पूर्व में बड़े उद्योग हैं.
वैसे तो यूक्रेन और रूस के उदय का इतिहास एक जैसा ही है मगर यहां के पश्चिमी हिस्से का यूरोपीय पड़ोसियों, ख़ासकर पोलैंड से ज़्यादा नज़दीकी रिश्ता है.
यूक्रेन के पश्चिमी हिस्से में राष्ट्रवादी भावना भी ज़्यादा है. लेकिन यूक्रेन में रूसी भाषा बोलने वाले अल्पसंख्यक भी अच्छी ख़ासी तादाद में हैं. औद्योगिक रूप से विकसित पूर्वी इलाक़े में इनकी बसावट ज़्यादा है.
आज यूक्रेन और उसके पड़ोसी देश रूस के बीच तनाव चरम पर नज़र आ रहा है. इस ताज़ा विवाद की नींव आज से चार साल पहले पड़ी थी.
साल 2014 में रूस की ओर झुकाव रखने वाले यूक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच के ख़िलाफ़ पश्चिम की ओर झुकाव रखने वाली सरकार में विद्रोह के स्वर उठे थे.
रूस ने इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए क्रीमियाई प्रायद्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया था और विद्रोही गुटों ने पूर्वी यूक्रेन के हिस्सों पर नियंत्रण कर लिया.
जनआंदोलनों के कारण राष्ट्रपति विक्टर को तो पद छोड़ना पड़ा था मगर तब तक रूस क्रीमिया पर क़ब्ज़ा करके उसका अपने यहां विलय कर चुका था.
क्यों है रिश्तों में तनाव
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन को स्वतंत्रता मिली थी.
उसके बाद से यह पश्चिमी यूरोप के साथ क़रीबी रिश्ते बनाना चाहता है मगर रूस को लगता है कि यूक्रेन का पश्चिम के पाले में जाना उसके लिए ठीक नही होगा. यही कारण है कि यूक्रेन पश्चिम और रूस की खींचतान के बीच फंसा हुआ है.
इस बीच इतिहास में कई मौक़े ऐसे रहे हैं जब रूसी साम्राज्य, सोवियत संघ और वर्तमान रूस के कारण यूक्रेन के बांशिंदों को कई तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ा है.
दोनों देशों के बीच वर्तमान के इस राजनीतिक विभाजन को समझना हो तो यूक्रेन के इतिहास पर नज़र डालनी होगी.
रूसी राष्ट्रवादियों को यूक्रेन की ज़मीन से मोह रहा है मगर यहां और भी कई सारे लोग और साम्राज्य रहे हैं. समय-समय पर यूक्रेन की सीमाओं में बदलाव भी होता रहा है.
कीवयाई रूस
नौवीं सदी में कीवयाई रूस की स्थापना हुई थी जो कि पहला बड़ा पूर्वी स्लाव राज्य था.
इतिहासकारों का मत है कि वाइकिंग नेता ओलेग ने इसकी स्थापना की थी जो कि नोवगोरोद के शासक थे. उन्होंने पहले कीव पर क़ब्ज़ा किया. नाइपर नदी के किनारे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जगह बसे होने के कारण कीव को ही कीवयाई रूस की राजधानी बनाया गया था.
10वीं सदी में रूरिक वंश की स्थापना हुई और राजकुमार व्लादिमिर महान (यूक्रेनी भाषा में प्रिंस वोलोदिमिर) कीवयाई रूस के स्वर्णिम युग के ध्वजवाहक बने.
988 में उन्होंने ऑर्थडॉक्स ईसाई धर्म स्वीकार किया और इस तरह कीवयाई रूस में धर्मांतरण की शुरुआत हुई. यहीं से पूर्व में ईसाई धर्म के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ था.
11वीं शताब्दी में कीवयाई रूस का वैभव यारोस्लाव बुद्धिमान के शासन में चरम पर पहुंच गया. इस दौर में कीव पूर्वी यूरोप का अहम राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र बन गया था.
विदेशी क़ब्ज़ा
13वीं सदी की शुरुआत में रूसी राज्यों पर मंगोलों ने हमला किया, जिसमें कई शहर तबाह हो गए.
1237-1240 के इस दौर में हुए इन हमलों ने कीव की शक्ति को ख़त्म कर दिया.
इसके बाद मंगोल गोल्डन हॉर्ड के वंशज तातारों ने काला सागर के उत्तरी सिरे के पास अपने साम्राज्य (खनैत) की स्थापना की.
1349 से 1430 के बीच पोलैंड और बाद में पॉलिश-लिथुएनियाई राष्ट्रमंडल ने धीरे-धीरे आज के यूक्रेन के उत्तरी और पश्चिमी हिस्से को अपने क़ब्जे में ले लिया.
1441 में क्रीमियाई खनैत गोल्डन हॉर्ड से अलग हो गई और उसने आज के दक्षिणी यूक्रेन के अधिकतर हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया.
1596 में पॉलैंड ने रोम के साथ मिलकर ग्रीक-कैथलिक या संयुक्त चर्च की स्थापना की, जिसने पश्चिमी यूक्रेन पर प्रभाव जमा लिया. बाक़ी यूक्रेन ऑर्थडॉक्स ईसाई ही रहा.
हेतमन शासन
1648-1657 में पॉलिश शासन के ख़िलाफ़ कज़ाख विद्रोह हुआ और हेतमन शासन की स्थापना हुई. इसे यूक्रेन में आधुनिक स्वतंत्र देश की शुरुआत माना जाता है.
उधर कीव के कमज़ोर होने के कारण उत्तर में एक अन्य रूसी बस्तियों, जिनमें मॉस्को भी था, की ताक़त बढ़ती रही.
1654 में पेरेस्लावल की संधि के बाद हेतमन शासन को रूस की जागीर के रूप में बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई.
1686 में रूस और पॉलैंड के बीच शांति समझौता हुआ, जिससे उस्मानी साम्राज्य के साथ 37 साल से चल रहे युद्ध का अंत हुआ. रूस और पोलैंड ने हेतमन यानी आज के यूक्रेन को बांट लिया.
1708 में इवान स्टेपनोविच माज़ेपा ने विद्रोह किया और हेतमन शासन वाले पूर्वी हिस्से को रूस से मुक्त करवाने की कोशिश की. यह सब उस समय हुआ जब रूस उत्तर में स्वीडन और पोलैंड के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहा था.
1764 में रूस ने पूर्वी हेतमन शासन व्यवस्था को भंग कर दिया यहां पर रूस का आंशिक प्रशासन चला दिया क्योंकि 1781 तक पूरी तरह इसका रूस में विलय नहीं हुआ था.
रूसी राज
18वीं सदी में पॉलैंड का विभाजन भी गया. 1772 से लेकर 1795 तक पूर्वी यूक्रेन का अधिकतर हिस्सा पॉलैंड से विभाजन के बाद रूसी साम्राज्य में शामिल कर लिया गया.
1783 में रूस ने क्रीमियाई खनैत के माध्यम से दक्षिणी यूक्रेन पर नियंत्रण कर लिया. 19वीं सदी में राष्ट्रीय सांस्कृतिक पुनर्जागरूकता से यूक्रेन में साहित्य, शिक्षा और इतिहास के शोध का विकास हुआ.
पॉलैंड के विभाजन के दौरान नियंत्रण में लिया गया गलीशा, यूक्रेन की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के तौर पर विकसित हुआ, मगर रूस ने उस समय अपनी सीमाओं के अंदर यूक्रेनी भाषा के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था.
सोवियत ताक़त का उदय
जब रूसी साम्राज्य का पतन हुआ तो 1917 में कीव में केंद्रीय रादा परिषद की स्थापना की गई
1918 में यूक्रेन ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. लेकिन कई सारी प्रतिस्पर्धी सरकारों ने पूरे यूक्रेन पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की और नतीजा यह रहा कि गृहयुद्ध छिड़ गया.
उधर दूसरी ओर जब रूस की रेड आर्मी ने दो-तिहाई यूक्रेन को जीत लिया और 1921 में यूक्रेनियन सोवियत स्पेशलिस्ट रिपब्लिक की स्थापना कर दी. यूक्रेन का एक तिहाई बचा हुआ हिस्सा पोलैंड में शामिल हो गया.
1920 के दशक में सोवियत सरकार ने यूक्रेन की भाषा और संस्कृति को बढ़ावा दिया मगर कई राजनीतिक शर्तों और पाबंदियों के साथ. मगर अगले ही दशक में फिर इस स्वतंत्रता को छीन लिया गया.
भीषण अत्याचार
1932 में स्टालिन के सामूहिकीकरण अभियान के कारण यूक्रेन में इरादतन अकाल जैसे हालात पैदा किए गए. इसे यूक्रेन में होलोदोमोर कहा जाता है. इस मानव जनित अकाल के कारण यूक्रेन में लाखों लोगों की मौत हो गई.
1939 में सोवियत संघ ने नाज़ी-सोवियत संधि की शर्तों के तहत पश्चिमी यूक्रेन का भी अपने में विलय कर लिया, जो पहले पॉलैंड के पास था.
मगर फिर हालात बदले और 1941 में यूक्रेन पर नाज़ियों ने क़ब्ज़ा कर लिया.
साल 1944 तक यहां नाज़ियों का क़ब्जा रहा जिस कारण यूक्रेन को युद्ध के कारण बहुत नुक़सान झेलना पड़ा. यूक्रेन 50 लाख से ज़्यादा लोग नाज़ी जर्मनी से लड़ते हुए मारे गए. यहां के 15 लाख यहूदियों में से अधिकतर को नाज़ियों ने मार डाला.
1944 में स्टालिन ने दो लाख क्रीमियाई तातारों को साइबेरिया और मध्य एशिया के लिए निर्वासित कर दिया. उनके ऊपर नाज़ी जर्मनी के साथ सांठगांठ करने का झूठा आरोप लगाया गया था.
विश्वयुद्ध के बाद
इस बीच सोवियत शासन के ख़िलाफ़ यूक्रेन में कुछ संगठन हथियारबंद संघर्ष चला रहे थे.
साल 1954 में एक अचानक उठाए गए क़दम में सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्रीमियाई प्रायद्वीप को यूक्रेन में शामिल कर दिया.
इसी दौरान सोवियत शासन के विरोध में चल रहा यूक्रेन की विद्रोही सेना का संघर्ष आख़िरी कमांडर के पकड़े जाने के बाद ख़त्म हो गया.
लेकिन 1960 के दशक में यूक्रेन में सोवियत शासन के प्रति विरोध बढ़ता चला गया. 1972 में सोवियत शासन का विरोध करने वालों का दमन किया गया तो यह आक्रोश और बढ़ गया.
आज़ादी का एलान
1991 में मॉस्को में तख़्तापलट की कोशिश हुई. इसके बाद यूक्रेन ने अपनी स्वतंत्रता का एलान कर दिया.
90 के दशक में लगभग ढाई लाख क्रीमियाई तातार और उनके वंशज सोवियत संघ के विघटन के बाद क्रीमिया लौट आए. ये वही लोग थे जिन्हें स्टालिन के समय निर्वासित किया गया था.
1994 में राष्ट्रपति चुनाव में लियोनिद क्रावचुक को हराकर लियोनिद कुचमा ने पद हासिल किया. उन्होंने पश्चिम और रूस के साथ संतुलन बनाने की नीति अपनाई.
1996 में यूक्रेन नया लोकतांत्रिक संविधान अपनाया और नई मुद्रा राइवन्या जारी की गई.
2002 मार्च में आम चुनाव में किसी को भी बहुमत नहीं मिल पाया. पार्टियों ने राष्ट्रपति कुचमा का विरोध किया और उन पर चुनाव में धांधली करने का आरोप लगाया.
इसी साल मई में सरकार ने नेटो में शामिल होने की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू करने एलान कर दिया.
ऑरेंज रिवॉल्यूशन
2004 नवंबर में विपक्ष के नेता विक्टर युशचेंको ने रूस समर्थक माने जाने वाले विक्टर यानुकोविच की जीत को धांधली का नतीजा बताते हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू किए.
संतरी रंग के कपड़े, बैनर और टोपियां पहनकर कीव की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों ने सरकार बदलने में अहम भूमिका निभाई. सुप्रीम कोर्ट ने बाद में चुनाव के नतीजे रद्द कर दिए.
2005 दिसंबर में हुए पुनर्चुनाव में विक्टर युशचेंको जीत हासिल करने के बाद राष्ट्रपति बन गए. इसके बाद रूस के साथ यूक्रेन के रिश्तों में खटास आ गई और गैस सप्लाई से लेकर पाइपलाइन फ़ीस को लेकर विवाद होने लगा.
2008 अक्टूबर में आर्थिक मंदी के कारण स्टील की मांग कम हुई. इससे यूक्रेन को बहुत नुक़सान हुआ. उसकी मुद्रा अचानक गिर गई और निवेशकों ने हाथ खींच लिए.
यानुकोविच की वापसी
2010 फ़रवरी में विक्टर यानुकोविच राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण में विजेता घोषित किए गए.
इसी साल जून में संसद ने नेटो में शामिल होने की योजना के ख़िलाफ़ वोट किया. 2013 के नवंबर में यूक्रेन ने यूरोपीय संघ के साथ जुड़ने के फ़ैसले से पीछे हटने का फ़ैसला किया.
इसके विरोध में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए. उनका कहना था कि रूस के दबाव में यह क़दम उठाया गया है.
2014 फ़रवरी में सुरक्षा बलों ने कीव में 77 प्रदर्शनकारियों को मार डाला. इसके बाद राष्ट्रपति यानुकोविच रूस भाग गए और विपक्ष सत्ता मे आ गया.
इसी बीच रूस ने ताक़त का इस्तेमाल करके क्रीमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया जिससे शीत युद्ध के बाद से रूस और पश्चिम के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था. अमरीका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए.
हिंसा का सिलसिला
2014 अप्रैल में रूस समर्थक हथियारबंद समूहों ने रूसी सीमा के पास कुछ इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया.
इस बीच मई में पश्चिम समर्थक कारोबारी पेत्रो पोरोशेंको ने चुना जीता और राष्ट्रपति बन गए.
उधर पूर्वी यूक्रेन में संघर्ष चल रहा था. जुलाई महीने में रूस समर्थक बलों ने संघर्ष वाले इलाक़े के ऊपर से उड़ रहे मलेशियन एयरलाइनर के एक यात्री विमान को गिरा दिया जिससे विमान पर सवार सभी 298 लोगों की मौत हो गई.
सितंबर में नेटो ने कहा कि रूसी सैनिक भारी भरकम सैन्य उपकरणों के साथ पूर्वी यूक्रेन में दाख़िल हो रहे हैं.
यूरोपीय संघ से क़रीबी
2014 अक्टूबर में यूक्रेन में हुए चुनावों में पश्चिम समर्थक पार्टियों को स्पष्ट बहुमत मिला.
2016 तक यूक्रेन की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगी. 2017 जुलाई में यूरोपीय संघ एसोसिएशन समझौते पर हस्ताक्षर हुए और एक सितंबर से यूक्रेन ने यूरोपीय संघ के साथ रिश्ते स्थापित कर लिए.
इसके बाद 2018 मई में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दक्षिणी रूस को क्रीमिया से जोड़ने वाले एक पुल का उद्घाटन किया. यूक्रेन इस क़दम को ग़ैरक़ानूनी बताता रहा.
दोनों देश कई मौक़ों एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाते रहे हैं. हाल ही में आज़ोव सागर में जलसीमा को लेकर दोनों में विवाद उठ खड़ा हुआ है.
रूसी सेना ने यूक्रेन की नौकाओं पर क़ब्ज़े में ले लिया था. जिसके बाद यूक्रेन ने अपने सीमावर्ती इलाक़े में मार्शल लॉ लगा दिया है.
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