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फ्रीडम ट्रैशकैन: लिपस्टिक
हाल में अमरीका में हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कार्यस्थल पर उन महिलाकर्मियों को ज़्यादा वेतन मिलता है, जो मेकअप के साथ काम पर आती हैं.
सौंदर्य और श्रृंगार का बाज़ार सालाना क़रीब 50 हज़ार करोड़ रुपए का है. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि सौंदर्य प्रसाधनों की बिक्री जिस तरीके से की जाती है, वो महिलाओं में ग़ैर-कुदरती सुंदरता पाने की चाहत को बनाए रखती है.
कुछ एशियाई देशों में इस तरीके का इस्तेमाल गोरेपन की क्रीम और अन्य ऐसे प्रसाधनों की बिक्री के लिए किया जा रहा है.
कई जगहों पर इनके विज्ञापनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शनाकरियों ने आवाज़ बुलंद की है. उनका कहना है कि विज्ञापन में इस्तेमाल तस्वीरें एडिटेड होती हैं, जो महिलाओं को एक पेशेवर मॉडल से खु़द की तुलना करने के लिए मजबूर करती हैं.
शुरुआत में लिपस्टिक का इस्तेमाल अमरीकी महिलाएं करती थीं. वे मानती थीं कि महिलाओं को तय पाबंदियों से निकलना चाहिए.
लेकिन अब महिलाएं इन श्रृंगार प्रसाधनों और सामाजिक अपेक्षाओं के विरोध में बिना मेकअप वाली सेल्फी सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर कर रही हैं.
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