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अधिकांश श्रीलंकाई हिन्दू और मुसलमान राजपक्षे के ख़िलाफ़ क्यों हैं
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर राजपक्षे को शपथ दिलाई है. हालांकि विक्रमासिंघे ने इसे अवैध और असंवैधानिक बताया है और कहा है कि वो संसद में बहुमत साबित करेंगे.
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने संसद को स्थगित कर दिया है. श्रीलंकाई संसद के स्पीकर ने स्थगन की जानकारी दी और कहा है कि संसद के नए सत्र की शुरुआत 16 नवंबर से होगी.
प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त किए जाने के बाद विक्रमसिंघे ने स्पीकर से रविवार को संसद का सत्र बुलाने को कहा था ताकि वो बहुमत साबित कर सकें.
इसी मांग के बाद राष्ट्रपति ने संसद का निलंबन कर दिया. विक्रमसिंघे ने संसद में आपातकालीन सत्र की भी मांग की थी. विक्रमसिंघे का कहना है कि 225 सदस्यों वाली संसद में उनके पास बहुमत है और उन्हें पद से हटाया जाना असंवैधानिक है.
सिरीसेना और विक्रमसिंघे में आर्थिक और सुरक्षा के मुद्दों पर बढ़ते मतभेदों के कारण यह नाटकीय घटनाक्रम सामने आया है. सिरीसेना के यूनाइटेड पीपल्स फ़्रीडम गठबंधन ने विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी से अलग होने की घोषणा की है.
राजपक्षे का उत्कर्ष
साल 2005 से 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे महिंदा राजपक्षे जब पिछला चुनाव हारे तो उनके राजनीतिक सफर के अंत की घोषणा की जाने लगी थी.
ऐसा इसलिए भी था क्योंकि राजपक्षे को हरा श्रीलंका के राष्ट्रपति बने मैत्रीपाला सिरीसेना ने संविधान संशोधन कर एक व्यक्ति के दो ही कार्यकाल तक राष्ट्रपति बनने की सीमा का प्रावधान कर दिया था.
शुक्रवार को श्रीलंका के राष्ट्रपति सिरीसेना ने राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई तब लोगों को एहसास हुआ कि वो राजपक्षे की राजनीति को श्रद्धांजलि देने में जल्दबाज़ी कर रहे थे.
1945 में जन्मे राजपक्षे के बारे में कहा जाता है कि उनके जितना ताक़तवर और महत्वाकांक्षी राष्ट्रपति श्रीलंका में कोई दूसरा नहीं हुआ. दक्षिण श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे का इलाक़ाई नेता के रूप में उभार बतौर छात्र ही होने लगा था.
दुतुगमुनु इसी इलाक़े के सिंहली राजा थे. इन्होंने चोल वंश के तमिल राजकुमार को हराया था. यहां का हर पिता अपने बेटे को इसी बहादुरी से जोड़ता है.
सिंहली और बौद्ध धर्म की रक्षा को लेकर यहां के लोग अपने राजा की तरह अपनी संतान के होने की कामना करते हैं. यहां स्वतंत्रता सेनानी दियासेना की लोकप्रियता भी काफ़ी है और महिंदा राजपक्षे को भी इसी रूप में पेश किया जाता है.
26 सालों से तमिल विद्रोहियों के साथ श्रीलंका में जारी गृह युद्ध 2009 में ख़त्म हुआ तो इसका श्रेय महिंदा राजपक्षे को दिया जाता है. राजपक्षे की श्रीलंका की राजनीति में प्रासंगिकता में यह सबसे अहम कड़ी है.
श्रीलंकाई मीडिया में राजपक्षे को सिंहली बौद्धों के मुक्तिदाता के तौर पर देखा जाता है. श्रीलंका में एलटीटीई को मिटाने में राजपक्षे के नेतृत्व की सराहना होती है. कहा जाता है कि राजपक्षे ने देश के भीतर बहुसंख्यकों के डर को ख़त्म किया है.
हालांकि दूसरी तरफ़ एलटीटीई के ख़िलाफ़ लड़ाई में राजपक्षे पर मानवाधिकारों के दमन के भी आरोप लगते हैं. पश्चिम के देशों ने लंबे समय तक श्रीलंका को मानवाधिकारों के मुद्दे पर अलग-थलग रखा.
कहा जाता है कि राजपक्षे 2015 का चुनाव तमिलों और मुसलमानों के वोटों से हारे हैं क्योंकि सिंहला बौद्धों में उनकी लोकप्रियता के सामने आज भी कोई नहीं है.
महिंदा राजपक्षे ने राजनीति में बने रहने पर डेली मिरर से कहा था, ''मैं स्वभाव से ही लड़ाका हूं. मैं राजनीति में ख़ुद की और परिवार की रक्षा के लिए भी हूं.'' कई मौक़ों पर राजपक्षे का यह तर्क कमज़ोर पड़ता है तो वो ये भी कहते हैं, ''मैं राजनीति में अपनी नस्ल, राष्ट्र और आस्था की रक्षा के लिए हूं.''
2015 में महिंदा राजपक्षे को दो चुनावों में हार मिली. ऐसा तब है जब सिंहला बौद्धों में महिंदा राजपक्षे सबसे लोकप्रिय नेता माने जाते हैं. 2015 के बाद राजपक्षे की राजनीतिक प्रासंगिकता भले कम हुई थी, लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई थी.
यह बात भी कही जा रही थी कि अमरीका और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के हिसाब से सिरीसेना और विक्रमसिंघे सरकार ने मानवाधिकारों के मुद्दे पर राजपक्षे के ख़िलाफ़ कार्रवाई की तो लोगों की सहानुभूति उनके पक्ष में जाएगी. ऐसे में सरकार पर अस्थिरता का ख़तरा भी मंडरा रहा था.
श्रीलंका की मीडिया में राजपक्षे को लेकर कहा जाता है कि अगर देशभक्ति के मुद्दे पर चुनाव होगा तो राजपक्षे को कोई चुनौती नहीं दे पाएगा. हालांकि राजपक्षे के साथ केवल सकारात्मक चीज़ें ही नहीं हैं. राजपक्षे के कार्यकाल में अधिनायकवाद, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, प्रतिशोध और कुशासन के भी गंभीर आरोप लगे हैं.
महिंदा राजपक्षे के ख़िलाफ़ कई गंभीर आरोप हैं. राजपक्षे का परिवार बहुत बड़ा है और सत्ता में सीधा दख़ल रहा. यही कारण है कि राजपक्षे के परिवार के ख़िलाफ़ कई तरह की जांच शुरू हुई. राजपक्षे के बेटों पर कई आरोप लगे. इनकी संपत्ति और शक्ति बढ़ने की गति सबके लिए हैरान करने वाली थी.
आज की तारीख़ में श्रीलंका की राजनीति में राजपक्षे का परिवार सबसे मज़बूत परिवार है. जब राजपक्षे राष्ट्रपति थे तो पावर सर्किल में इस परिवार की धमक हर जगह थी और कई जगहों पर आज भी है. रक्षा सचिव से लेकर राजनयिक प्रतिनिधि तक इस परिवार से थे.
कई लोगों को चुना गया था और कई लोगों की नियुक्ति सीधे की गई थी. राजपक्षे सरकार की ऐसी छवि बन गई थी कि बिना इस परिवार के आशीर्वाद पाए इस छोटे से द्वीपीय देश में कोई प्रोजेक्ट किसी को नहीं मिल सकता है.
विपक्ष का आरोप होता था कि देश के 70 फ़ीसदी बजट पर नियंत्रण राजपक्षे परिवार का था. राजपक्षे का संबंध श्रीलंका में रुहुनु के प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार डेविड विदानराचची राजपक्षे से है. डॉन डेविड विदानराचची राजपक्षे महिंदा राजपक्षे के दादा थे. डीडी राजपक्षे श्रीलंका में जल आपूर्ति मंत्री रहे थे.
डीडी राजपक्षे के तीन बेटे और एक बेटी थी. बड़े बेटे डॉन कोरोनेलिस राजपक्षे या डीसी राजपक्षे इस इलाक़े के बड़े अधिकारी थे. दूसरे बेटे डॉन मैथ्यु राजपक्षे थे और सबसे छोटे बेटे का नाम डॉन अल्विन राजपक्षे था.
राजपक्षे का शक्तिशाली परिवार
चुनावी राजनीति में सीधे एंट्री डॉन मैथ्यु राजपक्षे यानी डीएम राजपक्षे ने मारी और ब्रिटिश शासन में काउंसलर चुने गए. बाद में इनकी जगह काउंसलर उनके छोटे भाई डॉन अल्विन यानी डीए राजपक्षे बने. आज़ाद श्रीलंका में डीए राजपक्षे सांसद भी बने.
डीएम राजपक्षे के बेटे लक्ष्मण और जॉर्ज राजपक्षे आज़ाद श्रीलंका में सांसद बने. जॉर्ज राजपक्षे मंत्री भी बने. इन्ही की बेटी निरूपमा आज की तारीख़ में मंत्री हैं.
डीए राजपक्षे के बेटे चमाल, महिंदा और बासिल भी पिता की तरह सांसद बने. डीए राजपक्षे के दूसरे बेटे महिंदा ही 2005 में राष्ट्रपति बने, चमाल स्पीकर बने और बासिल आज की तारीख़ में मंत्री हैं. महिंदा राजपक्षे के बेटे नमाल सांसद हैं जबकि चमाल के बेटे शशीन्द्रा उवा प्रांत के मुख्यमंत्री हैं. पूरा राजपक्षे ख़ानदान राजनीति में है.
महिंदा राजपक्षे पर बहुसंख्यक सांप्रदायिक राजनीति के भी आरोप लगे. एलटीटीई पर उनके नेतृत्व में विजय के बाद भी वो स्टेट्समैन नहीं बन पाए. कहा जाता है युद्ध जीतकर भी शांति खोने वाली कहावत राजपक्षे पर पूरी तरह से फ़िट बैठती है.
चीन से यारी
आज की तारीख़ में उनकी छवि सिंहली बौद्धों के नेता के तौर पर है. अगले महीने महिंदा 73 साल के हो जाएंगे. 24 साल की उम्र में 1970 में महिंदा राजपक्षे सांसद बन गए थे.
हम्बनटोटा की आबादी 20 हज़ार है, लेकिन इसका विस्तार तेज़ी से हो रहा है. चीनी की मदद से 36 करोड़ डॉलर का एक पोर्ट का निर्माण किया गया है. 35 हज़ार लोगों के बैठने की क्षमता वाले एक स्टेडियम का निर्माण किया गया. 20 करोड़ डॉलर का एक एयरपोर्ट बना.
नई रेलवे लाइन भी बन रही है. ये सब चीनी क़र्ज़ से संभव हुआ और सबको अंजाम दिलाने वाले शख़्स का नाम है महिंदा राजपक्षे. हालांकि बाद में चीनी क़र्ज़ श्रीलंका चुकाने में नाकाम रहा तो उसे हम्बनटोटा पोर्ट ही 100 साल के लीज पर सौंपना पड़ा. यह सब महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में ही हुआ था.
ब्रिटेन के प्रमुख अख़बार द गार्डियन में 27 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में महिंदा राजपक्षे के बारे में लिखा गया है, ''श्रीलंका के लगभग सभी नेता उदार, अंग्रेज़ी बोलने वाले, विदेशों में पढ़े-लिखे और कोलंबो या उसके आसपास के इलाक़ों से रहे हैं. राजपक्षे के पास यूनिवर्सिटी की कोई डिग्री नहीं है. एक राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद वो बिल्कुल अलग रहे हैं. राजपक्षे शायद ही कभी पश्चिमी लिबास में दिखते हैं. राजपक्षे आज भी श्रीलंका के पारंपरिक नाश्ते भैंस का दूध और दही खाना पसंद करते हैं. वो सिंहली में बोलते हैं, लेकिन अंग्रेज़ी भी समझते हैं. उन्होंने तमिल भी सीखी है.''
राजपक्षे के ख़िलाफ़ अब हिन्दू-मुस्लिम साथ-साथ
श्रीलंका में तमिलों की आबादी 15 फ़ीसदी है और तमिलों के बीच राजपक्षे की छवि एक कट्टर सिंहली की है. तमिलों के ख़िलाफ़ अभियान में महिंदा के भाई गोटाभाया राजपक्षे की भी अहम भूमिका रही थी. गोटाभाया अपने भाई की सरकार में रक्षा सचिव थे. श्रीलंका में मुसलमान क़रीब नौ फ़ीसदी हैं. विश्लेषकों का मानना है कि आज की तारीख़ में तमिल हिन्दू और मुसलमान दोनों राजपक्षे को पसंद नहीं करते हैं.
मुसलमानों के ख़िलाफ़ हमले सिंहली राष्ट्रवाद के उभार का नतीजा बताए जा रहे हैं. सिंहलियों का कहना है कि मुस्लिमों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और एक वक़्त में सिंहली इनसे कम हो जाएंगे. राजपक्षे को सिंहली राष्ट्रवादी नेता के तौर पर जाना जाता है. ऐसे में अल्पसंख्यकों के मन में राजपक्षे को लेकर आशंका बनी रहती है. पिछले पांच सालों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ बौद्धों के हमले बढ़े हैं.
श्रीलंका में कट्टरपंथी बौद्धों ने एक बोडु बला सेना भी बना रखी है जो सिंहली बौद्धों का राष्ट्रवादी संगठन है. ये संगठन मुसलमानों के ख़िलाफ़ मार्च निकालता है. उनके ख़िलाफ़ सीधी कार्रवाई की बात करता है और मुसलमानों द्वारा चलाए जा रहे कारोबार के बहिष्कार का वकालत करता है. इस संगठन को मुसलमानों की बढ़ती आबादी से भी शिकायत है.
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