पुतिन के रूस में कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं

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    • Author, विकास त्रिवेदी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दो दिन के भारत दौरे पर भारत आए थे.

रूस और भारत के बीच हुआ सबसे अहम समझौता एस-400 ट्रिम्फ़ एयर डिफेंस सिस्टम रहा. व्लादिमीर पुतिन कई कार्यक्रमों में शरीक भी हुए.

व्यापारिक समझौतों के अलावा दोनों देशों के बीच एक बात जो कॉमन है, वो है महिलाओं की हालत. मजबूत हथियारों, माचो मैन की छवि और सत्ता में बने रहने को लेकर चर्चा में रहने वाले व्लादिमीर पुतिन सरकार का महिलाओं को लेकर क्या रुख़ रहा है? ये एक ऐसा सवाल है, जिसके जवाब कुछ उलझे हुए हैं.

वजह- पुतिन के महिलाओं पर दिए बयान, रूसी क़ानून और रूस में महिलाओं की हालत.

सवाल ये है कि हर मोर्चे पर आगे नज़र आने वाला रूस महिलाओं के मसले पर क्यों दकियानूसी ख्यालों में उलझा हुआ है? इस सवाल का जवाब खोजने के क्रम में पहले 'रूस और महिलाएं' पर पुतिन सरकार ने क्या कुछ कहा और किया है, इस पर नज़र डालते हैं.

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महिलाएं और पुतिन सरकार...

2017

अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस के दख़ल को लेकर बहस चल रही थी.

आरोप था कि डोनल्ड ट्रंप ने रूसी सेक्स वर्कर्स से मुलाक़ात की थी.

राष्ट्रपति पुतिन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस विवाद को ख़ारिज करते हुए कहा था, ''ट्रंप परिपक्व आदमी हैं. दूसरा वो कई सौंदर्य प्रतियोगिताओं में शामिल रहे हैं. मुझे इस बात पर यक़ीन करना मुश्किल है कि वो किसी होटल में ख़राब चरित्र वाली लड़कियों से मिलेंगे. हालांकि हमारी वाली दुनिया में सबसे बेहतर हैं.''

पुतिन के इस बयान की बौद्धिक वर्ग में जमकर आलोचना हुई.

जून 2018

रूस में फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप चल रहा था. तब रूसी में परिवार, महिला और बच्चों पर बनी कमेटी की प्रमुख और सांसद तमारा प्लेटनेयोवा का एक बयान काफ़ी चर्चा में रहा.

तमारा ने कहा था, ''रूसी महिलाओं को काले विदेशी पुरुषों से शारीरिक संबंध बनाने से बचना चाहिए. रूसी औरतों के विदेशियों से शादी करने पर रिश्ते का अंजाम बुरा होता है.'' हालांकि एक दूसरी सांसद मिखैल इससे इत्तेफाक नहीं रखती थीं.

मिखैल ने कहा, ''वर्ल्ड कप में जितनी ज़्यादा प्रेम कहानियां होंगी, उतनी ज़्यादा दुनिया के देश प्यार में पड़ेंगे और जितने ज़्यादा बच्चे पैदा होंगे, उतना बेहतर होगा.''

ऐसे वाकये आपने भारत में भी सुने होंगे. जब किसी भारतीय नेता की ओर से बच्चों को पैदा करने की सलाह दी जाती रही हैं.

हालांकि रूसी महिलाओं और भारतीय पुरुषों को लेकर रूस की मशहूर लेखक मारिया अरबाटोवा ने एक दिलचस्प बात कही थी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, साल 2006 में मारिया ने कहा था, ''मेरी नज़र में दुनिया के बाकी देशों की तुलना में भारतीय पुरुष रूसी महिलाओं के लिए सबसे ज़्यादा अच्छे रहते हैं. इसकी वजह उनकी परवरिश है.''

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औरतों को लेकर रूस में क्या हैं क़ानून?

जनवरी 2017 में रूस में घरेलू हिंसा के क़ानून को बदला गया.

बदलने के बाद रूस में घरेलू हिंसा के नियम कुछ यूं हैं:

  • अगर पत्नी या घर के किसी सदस्य को पीटने पर वो अस्पताल में भर्ती नहीं होते हैं और ये आपका पहला दर्ज अपराध है. तब आपको दो साल के लिए जेल नहीं जाना होगा जबकि पहले जाना होता था.
  • ऐसा करने पर आप पर क़रीब पांच रुपए से लेकर 33 हज़ार रुपए तक का जुर्माना लग सकता है या फिर 15 दिन की जेल.

बीबीसी थ्री में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, ये जुर्माने की राशि कई बार उन साझा बैंक खातों से निकलवाई जाती है, जिसमें पति और पत्नी दोनों साझेदार होते हैं.

ये बदलाव ऐसे देश में हुए, जहां पुलिस के मुताबिक हर महीने 600 महिलाओं की घर में हत्या कर दी जाती है और हर रोज़ क़रीब 36 हज़ार महिलाओं के मारपीट की घटना होती हैं.

फॉरेन पॉलिसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, रूस के नए कानून के बाद अगर घर में महिलाओं के साथ हुई हिंसा में हड्डी नहीं टूटती है और ऐसी घटना साल में सिर्फ़ एक बार होती है तो इसे हिंसा नहीं माना जाएगा.

रूस में महिला के अधिकारों के लिए काम करने वाली अलयोना पपोवा ने बीबीसी से रूसी महिलाओं के मिजाज़ पर रौशनी डाली थी.

पपोवा ने कहा, ''अगर कोई आदमी ये चिल्लाए कि औरत सिर्फ एक जिस्म है और यौन हिंसा को सही ठहराने की कोशिश करे. पीड़ितों को ही ज़िम्मेदार बताए तो ये महिलाएं इसे ही नियम मानकर सच मानने लगेंगी.''

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'वो मारे तो समझो प्यार है'

रूसी महिलाओं की हालत को बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री 'रशिया वॉर ऑन वूमेन' बखूबी समझाती है.

रूस में घरेलू हिंसा इस कदर है कि एक कहावत वहां काफी मशहूर है. कहावत ये कि अगर वो तुम्हें मारता है इसका मतलब कि वो तुमसे प्यार करता है.

इस कहावत का कड़वा सच ये है कि ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जो अपने साथी की मार से बचने के लिए छिपकर रहती हैं. यहां एक बात का ज़िक्र बेहद ज़रूरी है कि अधिकारों की बात करने वाली महिलाओं का रूस में संघर्ष कम नहीं है.

पूरी दुनिया में जो #MeToo अभियान चर्चाओं में रहा. ऐसी रिपोर्ट्स हैं, जिसमें ये दावा किया गया कि इस अभियान में हिस्सा लेने वाली रूसी महिलाओं की आवाज़ को दबाने की कोशिशें हुईं.

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रूस में महिलाओं की स्थिति पर जानकार क्या कहते हैं?

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर संजय पांडे कहते हैं, ''सोवियत पीरियड में महिलाओं का एक तरह का सशक्तीकरण हुआ था. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बड़ी संख्या में आदमी लड़ाई के मैदान में चले गए थे. ऐसे में महिलाएं काम करने कारखाने गईं. नतीजा ये रहा कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ी. तब महिलाएं समाज में तो दिखने लगीं लेकिन वो तब भी फ़ैसला लेने की स्थिति में नहीं थीं. सोवियत संघ के टूटने के बाद 1990 के दशक में हालत काफ़ी ख़राब हो गए. इसका सबसे ज़्यादा असर महिलाओं पर हुआ.''

प्रोफेसर पांडे कहते हैं, ''अभी रूस में राजनीति के स्तर पर बात करें तो महिलाओं की भूमिका सीमित हैं. परिवार की बात करें तो तलाक़ के मामले काफ़ी होते हैं. सिंगल मदर होना भी एक समस्या है. औरतों और मर्दों को मिलने वाली पगार में फ़र्क़ हैं. संबंध बनाने और फ़ैसले लेने के मामले में आप भारत से तुलना करें तो रूस में हालात बेहतर हैं.''

मॉस्को में बीबीसी संवाददाता नीना नाज़ारोवा ने बताया, ''रूस में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के काफ़ी मामले होते हैं. सबसे विभत्स केस मारग्रेटा ग्रेचेवा के साथ हुआ. मारग्रेटा के पति ने सिर्फ जलन के चलते उसका हाथ काट दिया था. अब वो एक बायोनिक हाथ का इस्तेमाल करती हैं.''

मॉस्को से नीना ने बताया, ''रूस में समाजिक और राजनीतिक माहौल औरतों के लिए बहुत महान नहीं है. घरेलू हिंसा और आरोप पीड़िता पर लगाए जाने के काफी मामले होते हैं. आर्थिक गैर-बराबरी भी आम बात है. महिलाएं वोट डाल सकती हैं, चुनाव लड़ सकती हैं. यूनिवर्सिटी जाने से लेकर ट्रेवल भी खूब कर सकती हैं. यहां मुफ्त में अबॉर्शन करवाए जा सकते हैं और इसको लेकर कानूनी मनाही भी नहीं है.''

जेएनयू में प्रोफेसर रहीं और रूस मामलों की जानकार अनुराधा चिनॉय मानती हैं कि रूस में महिलाओं की हालत मिली जुली सी है.

वो कहती हैं, ''सोवियत संघ के दौर में बच्चों और महिलाओं के लिए काफी सुविधाएं थीं, जो बाद में बदल गईं. रूस में बीते कुछ वक्त में बच्चों को संभालने के लिए सरकार की तरफ से कुछ सुविधाएं दी गईं. हालांकि रूस एक पितृसत्तात्मक समाज है. महिलाएं बाहर भी काम करती हैं और घर लौटकर भी करती हैं. आप रूस में ऐसा कम ही देखेंगे कि औरतें घर पर बैठी रहें.''

पश्चिमी देशों में महिलाओं को काफी अधिकार मिले हैं. इसकी झलक आप विदेशी संसदों में महिलाओं की मौजूदगी या अभियानों में देख सकते हैं. लेकिन क्या रूस में हालात ऐसे नहीं हैं.

अनुराधा चिनॉय कहती हैं, ''रूस में आप देखेंगे कि महिलाएं साहित्य, टीचिंग, नर्सिंग में होंगी लेकिन सत्ता में नहीं होती हैं. आप खुद देखिए आपको पुतिन के आस-पास कभी कोई ताकतवर महिला नहीं दिखेगी. रूस की दिक्कत ये है कि वहां के आदमी काफी ज़्यादा पितृसत्तात्मक सोच के हैं. शराब पीने की लत है. नतीजा ये होता है कि ज़िम्मेदारी औरतों पर आ जाती है.''

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औरतों का वो बैंड, जो उड़ाता है पुतिन का मज़ाक

रूस में 2011 में 'पुसी रॉयट' की शुरुआत हुई थी.

ये महिलाओं का एक रॉक बैंड है, जो चर्च समेत कई जगहों पर जाकर व्लादिमीर पुतिन और उनकी नीतियों की जमकर आलोचना करता है. इसे दबाने की काफी कोशिशें भी हुईं.

'पुसी रॉयट' के तहत एलजीबीटी समुदाय के लोगों के अधिकारों की बात भी की जाती है. अनुराधा बताती हैं, ''गे अधिकारों को लेकर पुतिन की जो नीति है, वो काफ़ी ग़लत है. ये बताता है कि औरतों के लिए भी आपने रास्ते बंद किए हुए हैं.''

अनुराधा चिनॉय कहती हैं, ''अगर रूस में कोई औरत रात को तीन बजे भी कहीं चली जाए तो कोई ख़तरा नहीं है. हालांकि पूरे रूस में ऐसी ही स्थिति है, ये कहना सही नहीं होगा. पर भारत के मुक़ाबले इस मसले पर हालात बेहतर हैं. रूस में बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी औरतों पर ही रहती है. पुरुष कम ही हिस्सा लेते हैं. पितृसत्तात्मक समाज की वजह से रूस में सिंगल मदर्स का ट्रेंड भी काफी है.''

रूस के सत्ता पक्ष की ओर से अक्सर सेक्स वर्कर्स को लेकर बयान आते रहे हैं.

इस पर अनुराधा चिनॉय कहती हैं, ''दिक्कत ये है कि पुतिन पितृसत्तात्मक सोच के हैं. इसी वजह से वो कई बार कुछ भी बोल देते हैं.''

एक सवाल ये है कि रूस जैसे देश में महिलाओं के बीच पुतिन की कैसी छवि है?

अनुराधा चिनॉय बताती हैं, ''पुतिन शराब नहीं पीते हैं. एक ताकतवर मर्दाना छवि रखते हैं. महिलाएं एक वक्त में पुतिन से लगाव रखती थीं, क्योंकि वो शराब से परेशान रहती थीं. लेकिन बीते कुछ वक्त में पुतिन की लोकप्रियता कम हुई है.''

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