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वो फ़्लू जिसने करोड़ों लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया
- Author, जेनीफ़र मायरहांस, डेनियल वेनराइट
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
स्पेनिश फ़्लू महामारी से बचे हुए लोगों के पत्र बताते हैं कि 1918-1919 में ब्रिटेन पर डर और अराजकता का अंधेरा छा गया था. ये पत्र समझने में मदद करते हैं कि किसी घातक बीमारी के साये में रहना क्या होता है.
लंदन में इंपीरियल वॉर संग्रहालय में दस्तावेजों की जांच कर रही रिसर्चर हेन्ना मोडस्ली इन पत्रों के संग्रह को 'महामारी के इंसानी अनुभवों' की खिड़की कहती हैं. इस महामारी ने ब्रिटेन में ढाई लाख लोगों की जान ले ली थी और दुनिया भर के 5-10 करोड़ लोगों ने इसकी चपेट में आकर जान गंवाई थी.
इतिहासकार और पत्रकार रिचर्ड कोलियर ने इन पत्रों को संग्रहालय में दिया था. 1700 सच्ची कहानियों का ये संग्रह 1970 के दशक में बनाया गया था. ये उन लोगों की दास्तां हैं जिन्होंने पहली बार महामारी देखी थी.
उनमें से एक कोवेन्ट्री की नौ वर्षीय लड़की की यादें भी हैं जिसने दो दिन के अंतराल में अपनी 35 साल की मां और सात साल की छोटी बहन को खो दिया था. इस लड़की ने बीमारी के प्रभाव के बारे में 1970 के दशक में कोलियर को लिख कर भेजा था.
उन्होंने लिखा था, "11 नवंबर, 1918 को दो-दो अंतिम संस्कार वाला दिन मेरे लिए बहुत चौंकाने वाला था. ये वही दिन था जब पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ था."
"मुझे याद है जब अंतिम यात्रा चर्च की ओर जा रही थी. हर जगह घंटियां, सायरन और जश्न की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं, लेकिन जब लोग हमारी अंतिम यात्रा को देखते तो चुप हो जाते थे."
"यह वास्तव में एक भयानक पल था, हम नहीं जानते थे कि हम में से अगला कौन मरने वाला है."
युद्ध के बाद
इसे भाग्य का क्रूर मोड़ ही कहा जा सकता है कि जब सैनिक युद्ध से घर लौट रहे थे तब स्पेनिश फ़्लू ब्रिटिश तटों तक भी पहुंच गया.
लंदन में क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी की रिसर्चर मोडस्ली कहती हैं, "युद्ध से बचे सैनिकों की भयानक कहानियां हैं. वे जहाज से वापस घर लौट रहे थे जब उन्हें अपनी पत्नी की मौत का ख़त मिला."
"युद्ध के अंत के उत्सव, खुशी और राहत के साथ मृत्यु और दर्द का मातम भी आ गया था."
लेस्टर में एक पादरी के बेटे ने बताया कि सुबह से शाम तक अंतिम संस्कार करते-करते उनके पिता कब्रिस्तान में ही सो गए थे.
ऐसा इसलिए क्योंकि वो वायरस को अपने घर लाने से बचना चाहते थे जहां उनकी पत्नी और आठ बच्चे रहते थे. वे सब बच गए थे. वे भाग्यशाली थे क्योंकि 1918 में लेस्टर में जन्म से ज़्यादा मौतें हुईं थीं.
उस साल शहर में लगभग चार मौतों में से एक फ़्लू की वजह से हुई थीं.
19 मई 1973 को इस लड़के ने कोलियर को लिखा, "तब शहर में एक के पीछे एक शव यात्रा चल रही थी."
उन्होंने कहा, "एक यात्रा में अक्सर एक से अधिक ताबूत होते थे, एक कब्र में एक से अधिक व्यक्तियों को दफ़नाया गया. ख़ासकर जब परिवार के एक से अधिक सदस्य एक ही समय में फ़्लू का शिकार हुए थे."
मौत की गंध को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता
मोडस्ली कहती हैं कि खतों में स्पेनिश फ़्लू के लक्षणों के बारे में भी लिखा गया है.
"कुछ लोग हेलियोट्रॉप साइनोसिस नामक किसी चीज़ से पीड़ित थे. इसकी वजह से उंगलियों के सिरों में नीला रंग आना शुरू हो जाता था. साथ ही कानों, नाक के सिरों और होंठों पर भी. फिर ये पूरी तरह काला हो जाता था."
"जैसे-जैसे ये रंग गहराता था, मरने की संभावना भी बढ़ जाती थी. मृत्यु के तुरंत बाद लाश पूरी तरह से काली पड़ जाती थी. प्रियजनों के लिए ये बहुत दर्दनाक रहा होगा."
सड़कों पर लगातार शव यात्राएं गुज़र रहीं थीं और पूर्वी लंदन में रहने वाले स्टेपनी इस मंज़र को कभी भूल नहीं पाए.
उन्होंने 16 मई, 1973 को अपने ख़त में लिखा, "ताबूत बनाने वाले तेज़ी से ताबूत बना नहीं पा रहे थे. मौत के बाद शरीर का रंग इतनी जल्दी बदलता था कि उन्हें दफ़नाने के लिए इंतज़ार नहीं किया जा सकता था."
"कब्र खोदने वाले सुबह से शाम सात दिनों तक काम कर रहे थे. उन मौतों की गंध को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.
लोग कर रहे थे हत्या और आत्महत्या भी
स्पेनिश फ़्लू ने लोगों में मनोवैज्ञानिक डर भी पैदा किया जिसकी वजह से हत्याएं और आत्महत्याएं भी हुईं. अख़बारों की रिपोर्टों के मुताबिक़ अदालतों ने इनमें से कुछ मौतों की वजह "फ़्लू के दौरान हुए भ्रम" को बताया है.
डोरसेट में रॉयल वायुसेना के ब्लेन्डफ़र्ड कैंप में रहने वाले एक व्यक्ति ने लिखा, "कैंप के पास एक छोटा जंगल था जिसका नाम 'आत्महत्या का जंगल' पड़ गया था क्योंकि वहां कई लोगों ने फ़्लू के बाद आत्महत्या कर ली थी."
उन्होंने बताया, "ऐसा लगता था कि फ़्लू से लोगों का दिमाग़ ख़राब हो जाता था."
6 नवंबर, 1918 को हार्टलपूल नॉर्थ डेली मेल अख़बार के अनुसार, एक बेकर ने अपनी पत्नी और बच्चों के मारने के बाद ख़ुद को फांसी लगा ली थी.
अख़बार के मुताबिक़, "पिछले हफ़्ते बीमारी ने सिच को घेर लिया था और पूरा परिवार बिस्तर पकड़ने पर मजबूर हो गया था"
"कल सुबह एक पड़ोसी ने सिच के शरीर को उसके बेडरूम में रस्सी से झूलते पाया और देखा कि उसकी पत्नी और बच्चे दूसरे कमरे में मरे पड़े हैं."
26 नवंबर, 1918 को एबरडीन इवनिंग एक्सप्रेस अख़बार के मुताबिक़ 33 साल के जेम्स सिडनी शॉ ने अपनी दो साल की बेटी एडिथ का गला काट दिया.
अख़बार ने लिखा, "तथ्य हैरान कर रहे थे क्योंकि वो अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे."
ख़बर के मुताबिक़, "18 अक्तूबर की रात को एक पड़ोसी ने शॉ की पत्नी की चीख सुनी- 'जल्दी आओ, मेरे पति पागल हो गए हैं.'
पड़ोसी ने देखा कि छोटी सी लूसी ख़ून भरे बिस्तर पर बैठी थी, लियोनार्ड रो रहा था और कटे गले के साथ एडिथ बिस्तर पर पड़ी थी."
जब डॉक्टर ने शॉ की जांच की तो पाया कि उसे घटना के बारे में ज़्यादा पता नहीं था. उसे 'फ़्लू के दौराम भ्रम' की वजह से पागल घोषित कर दिया गया.
लोग बचने के लिए कुछ भी कर रहे थे
वेलकम लाइब्रेरी के अनुसार, महामारी के दौरान ब्रिटिश आबादी का एक चौथाई हिस्सा स्पेनिश फ़्लू की चपेट में आया और तकरीबन 2 लाख 28 हज़ार लोगों की मौत हुई.
लेस्टर और मालम्सबरी जैसी जगहों पर 1918 में करीब 25 फ़ीसदी मौतें फ़्लू की वजह से हुई थीं.
उस वक्त वायरस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी और डॉक्टरों को पता नहीं था कि लोगों का इलाज कैसे किया जाए.
मोडस्ली बताती हैं, "इलाज के लिए कैम्फर से लेकर क्वीनीन और अल्कोहल तक इस्तेमाल किया गया. विशेष रूप से व्हिसकी सबसे अच्छा उपाय माना जाता था."
"लेकिन कुछ और भी उत्पादों जैसे क्रिओसोट और स्ट्रीचनीन का भी इस्तेमाल किया गया. दरअसल, लोग बचने के लिए कुछ भी कोशिश कर रहे थे."
मोडस्ली कहती हैं, "नर्सिंग एकमात्र ऐसी चीज़ थी जिसने वास्तव में मदद की. उस समय स्वयंसेवी नर्सों की बहुत ज़रूरत थी क्योंकि उनमें से कई युद्ध मोर्चे पर भेजी गईं थी."
"जाहिर है, जो लोग सेवा करते थे, वे वायरस के नज़दीक थे और ऐसी ख़बरें भी आईं कि मदद करने वाली नर्सें खुद फ़्लू का शिकार हो गईं."
आज फ़्लू के लिए सबसे आसान शिकार छोटे बच्चे और बुजुर्ग हैं. लेकिन स्पेनिश फ़्लू तो 20, 30 और 40 साल के लोगों के लिए भी घातक साबित हुआ.
उनकी जांच के एक साल बाद इतिहासकार मोडस्ली ने पाया कि उनकी परदादी की दादी, एलिजाबेथ एन माउडस्ले भी 14 दिसंबर, 1918 को फ़्लू से मर गईं थीं.
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