अमरीका की चेतावनी के बाद भी ईरान से तेल ख़रीदता रहेगा भारत

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    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ का कहना है कि भारत ईरान से तेल खरीदने और दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग जारी रखने को लेकर प्रतिबद्ध है.

ईरान के विदेश मंत्री ने ये बयान भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ मीटिंग के बाद दिया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की ये मुलाक़ात न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र आम सभा की बैठक से हटकर हुई.

ये बैठक ऐसे वक़्त में हुई है जब अमरीका ईरान के तेल व्यापार को प्रभावित करने के लिए उसके तेल आयात पर नवंबर में कई प्रतिबंध लागू करने वाला है.

वीडियो कैप्शन, अमरीका और ईरान के बीच ज़ुबानी जंग

ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ से जब पूछा गया कि क्या भारत ने उन्हें तेल आयात जारी रखने का भरोसा दिया है?

तो उन्होंने कहा, "ईरान से आर्थिक सहयोग एवं कच्चे तेल का आयात जारी रखने को लेकर हमारे भारतीय मित्रों का रुख हमेशा ही स्पष्ट रहा है. और मैंने यही बयान अपने भारतीय समकक्ष (विदेश मंत्री) से भी सुना."

बुधवार को ही अमरीकी राष्ट्रपति ने यूएन रक्षा परिषद की बैठक में ये चेतावनी दी थी कि जो भी देश अमरीका के प्रतिबंधों का पालन नहीं करेंगे, उन्हें गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा.

मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने ये भी कहा कि "भारत के साथ हमारे व्यापक सहयोगी रिश्ते रहे हैं और इन रिश्तों में एनर्जी को-ऑपरेशन भी शामिल है क्योंकि ईरान हमेशा ही भारत की ऊर्जा जरूरतों का विश्वसनीय स्रोत रहा है."

ज़रीफ़ ने कहा कि ईरान भारत के साथ द्विपक्षीय संबंध और मज़बूत करना चाहता है.

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भारत का ईरान से संबंध

ईरान के विदेश मंत्री ने चाबाहार ट्रांसपोर्ट और ट्रांज़िट कॉरिडोर के बारे में कहा कि उन्हें उम्मीद है कि साल 2019 के मध्य तक इस कॉरिडोर को चालू कर दिया जायेगा.

भारत सरकार के एक अन्य सूत्र ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया है कि भारत यूको बैंक के माध्यम से चाबाहार बंदरगाह के विकास के लिए ईरान को 35 लाख डॉलर बैंक गारंटी के रूप में देने की सोच रहा है.

ज़रीफ़ ने दावा किया कि चाबाहार अभी भी चालू है और ईरान भारत समेत अन्य निवेशकों की मदद से इसकी क्षमता को और बढ़ाना चाहता है.

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दोनों देशों का तेल व्यापार

ओपेक देशों में ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक है. ईरान के कुल उत्पादन का क़रीब 10 प्रतिशत तेल भारत ख़रीदता है. इसके लिए भारत ईरान को 100 अरब डॉलर से कुछ ज़्यादा का भुगतान करता है.

मसलन, चीन के बाद भारत ईरान के कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार है.

अमरीका और ईरान के बीच अंतरराष्ट्रीय परमाणु संधि टूटने के बाद भारत ने ईरान से होने वाले तेल आयात में कटौती की थी.

हालांकि भारत उन मुट्ठीभर देशों में शामिल था जिन्होंने पहले चरण के अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान से व्यापारिक रिश्ते कायम रखे थे.

भारत ने उस वक़्त कहा था कि वो अमरीका के 'एकतरफ़ा प्रतिबंधों' को नहीं मानता और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर वो सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के हिसाब से ही चलता है.

भारत ने इसी साल ईरान से तेल आयात बढ़ाने का फ़ैसला किया था. ये फ़ैसला तब लिया गया था जब ईरान ने भारत को क़रीब-क़रीब मुफ़्त ढुलाई और उधारी की मियाद बढ़ाने का ऑफ़र दिया था.

माना जाता है कि जब नवंबर महीने में ईरान के तेल सेक्टर पर और प्रतिबंध लागू हो जाएंगे, तो भारत के लिए ईरान से तेल का आयात करना आसान नहीं होगा.

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अमरीका और ईरान का विवाद

जुलाई, 2015 में ईरान और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्यों के बीच परमाणु समझौता हुआ था.

अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बदले में प्रतिबंधों से राहत दी थी.

लेकिन मई, 2018 में ईरान पर ज़्यादा दबाव बनाने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने ये समझौता तोड़ दिया.

ईरान के साथ परमाणु करार करने वालों में शामिल यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप को इस मुद्दे पर समझाने की भी कोशिशें की थी.

लेकिन ट्रंप ने अपने चुनावी वादे को पूरा किया और ईरान के साथ ओबामा प्रशासन का किया करार ख़त्म करने का ऐलान कर दिया.

इसके बाद ही ट्रंप प्रशासन ने नया फ़रमान जारी करते हुए कहा था कि भारत, चीन और पाकिस्तान समेत एशिया के देश ईरान से तेल आयात बंद कर दें.

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भारत खुलकर ईरान के साथ क्यों नहीं आता?

भारत और ईरान के बीच दोस्ती के मुख्य रूप से दो आधार रहे हैं. एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा है ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुस्लिम भारत में होना.

ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के इराक़ के ज़्यादा क़रीब है. इसलिए भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही.

हालांकि जानकार इसका मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध को मानते हैं.

वहीं भारत भी ईरान से दोस्ती को मुक़ाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. भारत के अमरीका से संबंध स्थापित हुए तो उसने भी भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.

अमरीका किसी सूरत में नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बने और मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़े. ऐसे में अमरीका ने इस बात के लिए ज़ोर लगाया कि ईरान के बाक़ी दुनिया से संबंध सामान्य न होने पाएं.

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भारत ईरान में चाबाहार बंदरगाह को लंबे समय से विकसित करना चाह रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ये लटकता रहा है. चाबाहार ट्रांसपोर्ट और ट्रांज़िट कॉरिडोर समझौते में भारत और ईरान के साथ अफ़ग़ानिस्तान भी शामिल है.

2016 में एक नवंबर को इंडियन बैंक ईरान में ब्रांच खोलने वाला तीसरा विदेशी बैंक बना था. इसके साथ ही एयर इंडिया ने नई दिल्ली से सीधे तेहरान के लिए उड़ान की घोषणा की थी.

हालांकि, 2009 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर ईरान के ख़िलाफ़ वोट किया था और कहा जाता है कि भारत ने ऐसा अमरीकी दबाव में किया था.

इसी साल भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में ईरान से जुड़े एक सवाल पर कहा था कि भारत ईरान पर संयुक्त राष्ट्र को मानेगा न कि अमरीका के प्रतिबंधों को.

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