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इतनी जल्दी फ़्रांस में ही चमक क्यों खोने लगे राष्ट्रपति मैक्रों
- Author, ह्यू स्कोफ़ील्ड
- पदनाम, बीबीसी संवादाता, पेरिस से
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पहचान दुनिया भर में जितनी तेजी से बनी क्या अब वो मद्धम पड़ रही है? क्या फ़्रांस में ही मैक्रों जनता का विश्वास दोबारा हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
16 महीने के कार्यकाल पूरे होने के बावजूद राष्ट्रपति मैक्रों आर्थिक वृद्धि और रोज़गार के वादे को पूरा नहीं कर सके हैं. मैक्रों अपने ही मुल्क में लोकप्रियता खो रहे हैं.
कौन सा डर मैक्रों को सता रहा है?
पोल एजेंसियों का कहना है कि इमैनुएल मैक्रों की लोकप्रियता सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है. ओपिनियनवे के मुताबिक मौजूदा वक़्त में फ़्रांस के केवल 28 फ़ीसदी मतदाता ही उनके कामकाज से संतुष्ट हैं.
जुलाई में यह 35 फ़ीसदी था. इन आंकड़ों के मुताबिक अपने कार्यकाल के इस समान अवधि में मैक्रों की लोकप्रियता पूर्व राष्ट्रपति फ़्रास्वां ओलांद और निकोलस सरकोज़ी से भी कम है.
इन आंकड़ों पर साइंसेज़ पो यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर क्रिसटोफी दे फॉक्ड ने कहते हैं, ''इस बात का ख़्याल रखना होगा कि मैक्रों की चुनावी जीत बहुत बड़ी नहीं थी. ज़्यादातर लोगों ने मैक्रों को इसलिए चुना क्योंकि उनकी छवि अति दक्षिणपंथी नहीं थी. इसलिए उनके ठोस मतदाताओं की संख्या कम है.''
वो आगे कहते हैं, ''एक बात का हमें ख़्याल रखना होगा कि फ़्रांस एक आसान देश नहीं है. यहां राजनैतिक असंतोष का इतिहास रहा है. ऐसे में यहां नेताओं की नकरात्मक रेटिंग लाजिमी है.''
आख़िर मैक्रों से ग़लती कहां हुई?
प्रोफ़ेसर दे फ़ॉक्ड इसके तीन बिंदु बताते हैं.
- मैक्रों जब सत्ता में आए थे तो उन्होंने राजनीति में बड़े बदलाव का वादा किया था. उन्होंने पिछड़े और निचले तबके के लोगों की राजनीति की बात की थी.
- मैक्रों ने राजनीति की दिशा को बदलने का वादा किया था जो कि अब भी केवल वादा ही है.
- मैक्रों की सरकार का टैक्नोक्रेटिक बने रहना. टैक्नोक्रेटिक यानी एक ऐसी सरकार जो देश के कुलीन लोगों के हितों की ओर ज़्यादा झुकाव रखती हो. मैक्रों ख़ुद काफ़ी टेक्नोक्रेट हैं. ये भी याद रखना होगा कि मैक्रों ने नेशनल एडमिनिस्ट्रेशन स्कूल से पढ़ाई की है. दूसरे शब्दों में कहें तो मैक्रों के दौर में भी वही राजनीति का तरीक़ा है जो फ़्रांस में पहले हुआ करता था.
मैक्रों के बड़े-बड़े वादे
फ़्रांस के मतदाताओं ने आर्थिक वृद्धि में सकारात्मक पहल की उम्मीद की थी, लेकिन ये हुआ नहीं. प्रोफ़ेसर दे फ़ॉक्ड कहते हैं, ''जब आपसे बहुत ज़्यादा उम्मीद हो और आप धरातल पर कुछ ना कर सकें तो जनता की ऐसी निराशा का सामना आपको करना पड़ता है.''
मैक्रों की साख़ को एलेक्ज़ेंड्रे बैनेला मामले में सबसे ज़्यादा नुकसान होगा. इस साल जुलाई में मैक्रों के सुरक्षाकर्मी 26 वर्षीय एलेक्ज़ेंड्रे बैनेला का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वो एक प्रदर्शनकारी को मारते नज़र आ रहे थे.
मीडिया की तमाम आलोचनाओं के बाद एलेक्ज़ेंड्रे को फ़्रांस सरकार ने पद से हटाया. इसके बाद से ही सरकार पर सवाल उठने लगे कि आख़िर सब कुछ जानते हुए भी मैक्रों ने क्यों एलेक्ज़ेंड्रे बैनेला को बचाने की कोशिश की?
प्रोफ़ेसर दे फॉक्ड बताते हैं, ''अगर ये घटना ब्रिटेन में हुई होती तो इस मामले में गृह सचिव का इस्तीफ़ा हो चुका होता. लेकिन फ़्रांस में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इस घटना के बाद फ़्रांस के लोगों को ये लगा कि कुछ कुलीन लोगों के लिए सरकार के अलग नियम हैं और बाक़ी देश के लिए अलग नियम लागू किया जा रहा है.''
मैक्रों पर क्या कहते हैं लोग?
मतदाताओं के किसी भी समूह से अगर मैक्रों के लिए एक विशेषण का इस्तेमाल करने को कहा जाए तो वे 'घमंडी' शब्द का इस्तेमाल करते हैं. कई बार कैमरे पर मैक्रों अपने देश के नागरिकों के लिए असंवेदनशील और अपमानजनक टिप्पणी कर चुके हैं.
इसका सबसे ताज़ातरीन उदाहरण है एलिसी में हालिया आयोजित हुआ 'ओपेन डे'. वहां उन्होंने बाग़ान के मालियों के लिए कहा था, 'जो माली जो काम ना मिलने की शिकायत करते हैं उन्हें अन्य व्यवसाय की ओर रुख़ करना चाहिए. वे खाना परोसने का काम सीख सकते हैं.'
हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि ये एक कठोर सच है, जिसे राष्ट्रपति ने कहा. लेकिन फ़्रांस के ज़्यादातर लोगों का मानना है कि ये असंवेदनशील बयान है.
इप्सोस पोल एजेंसी की विशेषज्ञ क्लो मॉरिन कहती हैं, ''मैक्रों अक़्सर इस तरह के बयान देते रहते हैं जो लोगों को उनके धमंडी होने का संदेश देता है. ये बयान उनकी नकारात्मक छवि बना रहे हैं.''
बदलनी होगी आर्थिक स्थिति
इमैनुएल मैक्रों के कार्यकाल के अभी साढ़े तीन साल बचे हुए हैं. ये पर्याप्त समय है जिसमें वो देश की आर्थिक स्थिति को पलट सकते हैं.
ये जानना बेहद अहम है कि फ़्रांस की राजनीति में राष्ट्रपति बेहद शक्तिशाली पद है. वह जो चाहे वो करने का अधिकार रखता है. देश में मैक्रों की नीतियों से लोग नाराज़ हैं, लेकिन दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैक्रों ने जिस तरह फ़्रांस की तस्वीर बदली है इसकी लोग तारीफ़ करते हैं. फ्रांस के कमज़ोर विपक्ष का भी फ़ायदा मैक्रों उठा सकते हैं.
मैक्रों के बारे में कहा जाता है कि वो अपनी आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए फ़ैसले लेते हैं. हाल ही में लोगों का समर्थन पाने के लिए नए टैक्स मानकों का ऐलान ऐसा ही एक क़दम माना जाता है.
मैक्रों की नज़र यूरोपीय संघ के चुनाव पर भी होगी. पिछले हफ्ते सामने आए एक पोल के मुताबिक मैक्रों और मैरिन इस टक्कर में काफ़ी क़रीब हैं. अगर ये चुनाव मैरिन जीत जाती हैं तो ये मैक्रों के लिए बड़ा झटका होगा.
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