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ब्लॉग: जाने कब भारत में कोई वाजपेयी आए
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
मुझे नहीं मालूम कि अटल बिहारी वाजपेयी के देहांत की ख़बर को पाकिस्तान में जिस तरह के दुख से सुना गया उस पर भारतीय मीडिया ने कितना ध्यान दिया. मगर इमरान ख़ान, शहबाज़ शरीफ़ और बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने अपने जज़्बात जैसे ज़ाहिर किए, उनका ख़ुलासा ये है कि उप महाद्वीप का एक बड़ा आदमी दुनिया से चला गया.
पाकिस्तान-भारत सम्बन्धों को नॉर्मल सतह पर लाने में भले वाजपेयी जी के इरादे सफल न हो पाए मगर दोनों देशों में कोई ये नहीं कह सकता कि उन्होंने कोशिश नहीं की या जो कोशिश की वो मन से नहीं की.
कम से कम वाजपेयी जी को ये क्रेडिट ज़रूर जाता है कि उन्होंने पहले नवाज़ शरीफ़ और फिर परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ बैठकर आपसी झगड़ों को तय करने के लिए एक ऐसा दायरा ज़रूर खींच दिया जो इस्लामाबाद या दिल्ली की हर उस सरकार के काम आएगा जो वाक़ई इस इलाके में अमन के कार्य को आगे बढ़ाना चाहे.
ये सच है कि कभी-कभी एक आदमी भी इतिहास की धारा मोड़ सकता है मगर जब पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के सम्बन्धों का मामला हो तो उनमें बिगाड़ तो कोई एक बौना भी पैदा कर सकता है. पर अच्छा सोचने और करने के लिए दोनों तरफ़ बराबर के क़द की शख़्सियत होना ज़रूरी है.
1972 और 1973 वो दो वर्ष हैं जिनमें भुट्टो और इंदिरा गांधी अपनी-अपनी जनता में इतने पॉपुलर थे कि वो जो भी बड़ा फ़ैसला करते, उस फ़ैसले को दोनों मुल्कों के अवाम हज़म कर सकते थे.
एक बार ऐसा लम्हा ज़रूर आएगा...
वही शिमला समझौता जो जंगी क़ैदियों की रिहाई और कश्मीर की सीज़फ़ायर लाइन को लाइन ऑफ़ कंट्रोल का नाम देने तक सीमित रहा, उसी शिमला समझौते को आने वाली नस्लों का भविष्य महफ़ूज करने के लिए 'लार्जर दैन लाइफ़' फ़ेम में भी बदला जा सकता था.
दूसरा मौका आगरा में आया जब राष्ट्रपति और सेनापति मुशर्रफ़ ने आदरणीय वाजपेयी के साथ मिलकर लाहौर समझौते का दायरा बढ़ाने की कोशिश की मगर दोनों नेताओं को दोनों तरफ़ के अफ़लातूनों ने कौम-ए-फ़ुलस्टॉप की जंजीरों से आख़िरी लम्हों में ऐसा बांध दिया कि दोनों शायद अपने-अपने साये से भी डर गए.
अब जाने कौन सा पाकिस्तानी सेनापति इतना बड़ा क़दम ले और जाने भारत में कब कोई वाजपेयी आए और इन दोनों के साथ कब कोई और इन दोनों के साथ कब कोई ऐसा लम्हा चिपक जाए जो वो ज़िंदगी जी ले जो ये लम्हा 72 साल से जीना चाह रहा है.
इस वक़्त तो कोई अमरीश पुरी भी नहीं जो ये कह सके कि जा सिमरन जा. पर मुझे यक़ीन है कि एक बार ऐसा लम्हा ज़रूर आएगा जिसकी पकड़ में वो ज़िंदगी आ जाए जो मैं और आप जैसे करोड़ों लोग जीना चाहते हैं, भले टीवी स्क्रीनें कितनी ही आग उगल लें.
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