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2050 तक डूब जाएगा उत्तरी जकार्ता का 95 फ़ीसदी हिस्सा
- Author, मयूरी मे लिन और रफकी हिदायत
- पदनाम, बीबीसी इंडोनेशिया
इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में लगभग एक करोड़ लोग रहते हैं. दुनिया के किसी दूसरे शहर की तरह लोग काम पर जाते हैं, घर आते हैं और वापस काम पर जाते हैं, हवा और पानी जैसी आम समस्याओं से दो चार होते हैं.
लेकिन इस शहर में रहने वालों के पैरों तले ज़मीन खिसक रही है. और वो भी हर साल 25 सेंटीमीटर की दर से.
बीते दस सालों में ये शहर ढाई मीटर ज़मीन में समा गया है लेकिन दलदली ज़मीन पर बसे इस शहर पर निर्माण कार्य लगातार ज़ारी है.
2050 तक डूब जाएगा जकार्ता का बड़ा हिस्सा
दलदली ज़मीन पर बसे इस शहर के नीचे से 13 नदियां निकलती हैं और दूसरी ओर से जावा सागर दिन-रात बिना रुके हुए शहर की ओर पानी फेंकता रहता है. बाढ़ का आलम तो ये है कि शहर का काफ़ी हिस्सा अक्सर पानी में डूबा रहता है. इसके साथ-साथ पानी में शहर के कई हिस्से समाते जा रहे हैं.
इंडोनेशिया के एक प्रतिष्ठित तकनीक संस्थान बैंडंग इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलोजी में 20 सालों से जकार्ता की ज़मीन में होते बदलावों का अध्ययन कर रहे हैरी एंड्रेस इसे एक बेहद गंभीर बात बताते हैं.
वह कहते हैं, "जकार्ता के ज़मीन में डूब जाने का मसला हंसने का विषय नहीं है. अगर हम अपने आंकड़ों को देखें तो 2050 तक उत्तरी जकार्ता का 95 फ़ीसदी हिस्सा डूब जाएगा."
बीते दस सालों में उत्तरी जकार्ता ढाई मीटर तक डूब चुका है और 1.5 सेंटीमीटर की औसत दर लगातार डूब रहा है.
जकार्ता के डूबने की दर दुनिया के तमाम तटीय शहरों के डूबने की दर से दुगने से भी ज़्यादा है.
उत्तरी जकार्ता में इस समस्या का आसानी से देखा जा सकता है.
मुआरा बारू ज़िले में एक पूरी सरकारी इमारत खाली पड़ी हुई है. कभी इस इमारत में एक फिशिंग कंपनी चला करती थी लेकिन अब इस इमारत का केवल ऊपरी हिस्सा इस्तेमाल किया जा सकता है.
इस इमारत का ग्राउंड फ़्लोर बाढ़ के दौरान पानी से भर गया था लेकिन बाढ़ ख़त्म होने के बाद ज़मीन का स्तर ऊपर आ गया जिससे ये पानी ग्राउंड फ़्लोर में ही फंसकर रह गया.
जकार्ता शहर में लोगों ने ऐसी तमाम इमारतों को छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें बार-बार मरम्मत कराने की ज़रूरत पड़ती थी.
इस जगह से पांच मिनट की दूरी पर एक मछली बाज़ार मौजूद है.
मुआरा बारू में रहने वाले रिद्वान बीबीसी को बताते हैं, "फुटपाथ पर चलना लहरों की सवारी करने जैसा है, लहरें आती रहती हैं, लोग गिर सकते हैं."
इस मछली बाज़ार से सामान ख़रीदने आने वालों को तमाम समस्याओं से दो चार होना होता है.
रिद्वान कहते हैं, "साल दर साल, ज़मीन डूबती जा रही है."
उत्तरी जकार्ता ऐतिहासिक रूप से बंदरगाह वाला शहर रहा है और आज भी यहां तेनजंग प्रायक इंडोनेशिया का सबसे व्यस्त बंदरगाह है.
इसी स्थान से किलिवंग नदी जावा सागर में समाती हैं. 17वीं शताब्दी में डच उपनिवेशवादियों ने इसी वजह से जकार्ता को अपना ठिकाना बनाया था.
वर्तमान में उत्तरी जकार्ता में लगभग 18 लाख लोग रहते हैं जिनमें कमज़ोर होता बंदरगाहों का व्यापार, टूटते तटीय क्षेत्रों के समुदाय और समृद्ध चीनी इंडोनेशियाई लोगों की आबादी शामिल है.
घर में घुसता दरिया
फ़ॉर्चून सोफ़िया सी व्यू वाले एक आलीशान बंगले में रहती हैं. पहली नज़र में देखें तो ये नहीं लगता है कि उनका घर डूब रहा है . लेकिन वह बताती हैं कि हर छह महीने में घर की दीवारों पर दरारें नज़र आने लगती हैं.
बीते चार सालों से इस घर में रह रहीं सोफ़िया बताती हैं, "समंदर का पानी घर के अंदर आ जाता है और स्विमिंग पूल डूब जाता है. इसके बाद हमें अपना फ़र्नीचर फ़र्स्ट फ़्लोर पर ले जाना पड़ता है. हमें बस मरम्मत कराते रहना होता है, मरम्मत करने वाला कहता है कि ऐसा ज़मीन खिसकने की वजह से हो रहा है."
लेकिन छोटे घरों में रहने वालों के लिए घर में आते समंदर का मतलब कुछ और ही है. यहां रहने वाले लोगों को कभी अपने घरों से अथाह समंदर दिखाई पड़ता था. लेकिन अब उन्हें बस पानी रोकने के लिए बनाई गई दीवारें ही दिखाई पड़ती हैं.
पेशे से मछुआरे माहर्दी बताते हैं, "हर साल ज्वार तकरीबन पांच सेंटीमीटर बढ़ जाता है."
लेकिन नहीं मानते बिल्डर
लेकिन इस सबके बावजूद हर साल उत्तरी जकार्ता में गगन चुंबी इमारतों का निर्माण बंद नहीं हुआ है.
इंडोनेशिया की हाउसिंग डेवलेपमेंट एसोशिएसन की सलाहकार समिति के प्रमुख एडी जेनेफ़ो कहते हैं कि उन्होंने सरकार से विकास कार्य रोकने को मना किया है.
लेकिन वो कहते हैं, "जब तक हम फ्लैट बेच सकते हैं तब तक विकास जारी रहेगा."
जकार्ता का दूसरा हिस्सा भी डूब रहा है लेकिन डूबने की स्पीड थोड़ी कम है.
पश्चिमी जकार्ता में 15 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष, पूर्वी जकार्ता में 10 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष, केंद्रीय जकार्ता में 2 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष और दक्षिणी जकार्ता में 1 सेंटीमीर प्रतिवर्ष की दर से ज़मीन ख़िसक रही है.
जलवायु परिवर्तन का कितना असर
जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया के तमाम तटीय शहर डूब रहे हैं.
ध्रुवों पर स्थित ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से समुद्र में पानी बढ़ता जा रहा है.
विशेषज्ञों की मानें तो जकार्ता जिस तेजी से डूब रहा है वो काफ़ी ख़तरनाक है.
अगर जकार्ता में रहने वाले किसी व्यक्ति से बात करें तो आपको इस मुद्दे पर कुछ शिकायतें ही मिलेंगी.
क्योंकि यहां रहने वाले लोग कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं और शहर के डूबने की वजह इन्हीं चुनौतियों में छुपी हुई है.
ज़मीन से पानी निकालना बनी 'समस्या की जड़'
जकार्ता में रहने वाले लोगों के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या है. सप्लाई वाले पानी से लोगों का गुज़ारा नहीं चलता है. ऐसे में लोगों को भूमिगत जल के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है.
लेकिन जैसे जैसे लोग भूमिगत जल को निकालते जा रहे हैं वैसे वैसे जमीन धंसती जा रही है.
ये कुछ ऐसा है कि जैसे जकार्ता पानी के गुब्बारे पर टिका हुआ शहर हो और जैसे-जैसे गुब्बारा खाली हो रहा है, जकार्ता की ज़मीन नीचे जा रही है.
हैरी एंड्रेस कहते हैं, "स्थानीय लोगों से लेकर उद्योगों को भी ज़मीन से पानी निकालने का अधिकार है लेकिन इसके नियमन की ज़रूरत है.
लेकिन समस्या ये है कि लोग नियम से ज़्यादा पानी निकाल लेते हैं.
वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें पानी निकालना पड़ेगा क्योंकि सरकार से उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है.
जल प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं, "सरकार जकार्ता में पानी की ज़रूरत का सिर्फ 40 फ़ीसदी हिस्से की पूर्ती कर सकती है."
केंद्रीय जकार्ता में एक डॉर्मेट्री, जिसे कॉस-कोसन कहा जाता है, चलाने वाले एक मकान मालिक हेंड्री बीते दस सालों से ज़मीन से पानी निकाल रहे हैं.
वह कहते हैं, "सरकारी एजेंसियों पर निर्भर रहने की जगह अपने ग्राउंडवॉटर पर निर्भर रहना ज़्यादा बेहतर है. इस कॉस-कोसन जैसी चीज़ को बहुत ज़्यादा मात्रा में पानी की ज़रूरत होती है."
स्थानीय सरकार ने हाल ही में ये बात स्वीकार की है कि ग्राउंड वॉटर को निकाला जाना एक समस्या है.
बीते मई महीने में सरकारी एजेंसियों ने गगन चुंबी इमारतों वाले केंद्रीय जकार्ता में 80 इमारतों का निरीक्षण किया था.
इस जांच में सामने आया है कि 56 इमारतों में पानी निकालने का पंप है और 33 इमारतों में अवैध तरीके से पानी निकाला जा रहा है.
जकार्ता के गवर्नर एनीज़ बासवेदन कहते हैं कि सभी के पास लाइसेंस होना चाहिए जिससे सरकारी एजेंसियों को ये पता चलेगा कि कितना ग्राउंडवॉटर निकाला जा रहा है.
बिना लाइसेंस वाली इमारतों का सर्टिफ़िकेट रद्द कर देना चाहिए और ऐसी इमारतों में काम करने वाले दूसरे व्यापारिक प्रतिष्ठानों का लाइसेंस भी कैंसल कर देना चाहिए.
सरकारी एजेंसियों को उम्मीद है कि 40 बिलियन डॉलर के ख़र्च पर समुद्र के सामने खड़ी की जा रही 32 किलोमीटर लंबी दीवार जकार्ता को डूबने से बचाएगी.
इस दीवार को बनाने में डच और दक्षिण कोरियाई सरकार मदद कर रही है. इसके तहत एक कृत्रिम द्वीप बनाने की तैयारी की जा रही है जिससे शहर का पानी निकल सकते. इससे बारिश के मौसम में आने वाली बाढ़ से मदद मिल सकती है.
लेकिन तीन डच नॉन-प्रॉफ़िट संस्थाओं ने 2017 में रिपोर्ट जारी की थी जो कि कृत्रिम द्वीप और समुद्र रोकने की दीवार की क्षमता पर संदेह खड़ा करते हैं.
डच वॉटर रिसर्च इंस्टीट्यूट डेल्टारेस से जुड़े हाइड्रोलॉजिस्ट जन जाप ब्रिकमेन इसे सिर्फ शुरुआती उपाय मानते हैं.
वह कहते हैं जकार्ता को ज़मीन धंसने की दीर्घकालिक प्रक्रिया को रोकने में 20 से 30 सालों का समय लग सकता है और इसका सिर्फ एक समाधान है तथा सभी लोग समाधान जानते हैं.
ये समाधान होगा कि भूमिगत जल के दोहन को पूरी तरह रोका जाए और पानी हासिल करने के दूसरे तरीकों बारिश, सप्लाई के पानी और मानव-निर्मित जलाशयों पर निर्भर रहना चाहिए.
वह कहते हैं कि जकार्ता को 2050 तक अपने एक बड़े हिस्से को डूबने से बचाने के लिए ये ज़रूर करना चाहिए. लेकिन इस संदेश पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.
जकार्ता के गवर्नर एनीज़ बासवेडन कहते हैं कि इससे कम कड़े क़दम उठाने से भी समाधान निकल सकता है.
वह कहते हैं लोग क़ानूनी रूप से भूमिगत जल के दोहन करने में सक्षम रहने चाहिए जब तक वे इसे बायो प्रक्रिया से बदल न दें.
इस प्रक्रिया में दस सेंटीमीटर डायमीटर और 100 सेंटीमीटर के गढ्ढे खोदे जाना शामिल है जिससे बारिश का पानी वापस ज़मीन में जा सके.
इस समाधान की आलोचना करने वाले कहते हैं कि इससे सिर्फ़ सतह पर पानी को रिचार्ज किया जा सकता है. क्योंकि जकार्ता में कई जगह सैकड़ों मीटर नीचे से पानी निकाला जा रहा है.
भूमिगत जल के स्त्रोतों तक पानी पहुंचाने की तकनीक मौजूद है लेकिन ये बहुत ही महंगी तकनीक है.
टोक्यो ने 50 साल पहले ज़मीन धंसने की समस्या से जूझते हुए आर्टिफ़िशियल रिचार्ज नाम की इस तकनीक का इस्तेमाल किया है.
जापान सरकार ने भूमिगत जल निकालने पर रोक लगा दी थी जिसके बाद ये समस्या रुक गई.
लेकिन इस उपाय को अपनाने के लिए भी जकार्ता को पानी के दूसरे स्त्रोतों की ज़रूरत होगी.
हैरी एंड्रेस बताते हैं, नदियों और बाँधों को साफ़ करने और लोगों के घरों तक पानी पहुंचाने में 10 सालों का समय लग सकता है.
जकार्ता में रहने वाले इस समस्या को लेकर एक भाग्यवादी रवैया अपनाए हुए हैं.
सोफिया कहती हैं, "यहां रहना अपने आप में एक जोख़िम है और यहां रहने वाले लोगों ने ये जोख़िम स्वीकार कर लिया है."
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