BBC SPECIAL: चीन का वो गाँव जिसकी इकोनॉमी सिंगापुर जितनी बड़ी हो गई

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, शेनज़ेन (चीन) से लौटकर
दक्षिणी चीन में शेनज़ेन 40 साल पहले मछुआरों का एक गाँव था, जहाँ से लोग तैरकर और जान जोख़िम में डालकर काम की तलाश में पड़ोसी हॉन्गकॉन्ग जाते थे.
साल 1980 में चीन के नेता डेंग श्याओपिंग ने शेनज़ेन में चीन के पहले स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (एसईज़ेड) की स्थापना की और इस तरह शेनज़ेन का स्वरूप बदलना शुरू हुआ.
शेनज़ेन म्यूज़ियम में उन दिनों की तस्वीरें हैं जहाँ शेनज़ेन में चारों ओर ख़ाली ज़मीन नज़र आ रही है और फ़ैक्ट्रियों में लोग काम करते दिख रहे हैं.

इमेज स्रोत, Shenzhen Museum
म्यूज़िमय में डेंग श्याओपिंग की तस्वीरों के अलावा उनकी वैन, बिस्तर सहित कई निजी चीज़ें भी रखी हैं.
80 और 90 के दशक में शेनज़ेन की फ़ैक्ट्रियों में चीन के दूर गाँवों या ग़रीब इलाक़ों में रहने वाले लोग सस्ती पगारों पर मेहनत किया करते थे. टैक्स और श्रम क़ानूनों से छूट के कारण कंपनियों के लिए यहाँ उत्पादन करना सस्ता था और जल्द ही इसे दुनिया की फैक्ट्री कहा जाने लगा.

इमेज स्रोत, Shenzhen Museum
युवा और आधुनिक शहर
आज शेनज़ेन को कभी 'चीन की सिलिकॉन वैली' तो कभी 'दुनिया का हार्डवेयर का केंद्र' कहा जाता है.
दुनिया के सबसे युवा शहरों में से एक शेनज़ेन आज दुनिया में इनोवेशन, टेक्नॉलजी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, स्टार्ट अप्स और बायोटेक का केंद्र बन गया है.
एक आंकड़े के मुताबिक़, शेनज़ेन की अर्थव्यवस्था हॉन्गकॉन्ग और सिंगापुर के बराबर है. यहाँ का पोर्ट दुनिया के सबसे व्यस्त कंटेनर पोर्ट में से एक है.
स्काइस्क्रैपर सेंटर की एक सूची के मुताबिक़, दुनिया की 100 सबसे ऊँची इमारतों में से 6 शेनज़ेन में हैं.
शेनज़ेन की स्काइलाइन, हवा की बेहतर क्वॉलिटी, चौड़ी सड़कों पर दौड़ती इलेक्ट्रिक बसें और कारें, सभी शेनज़ेन को चीन और पूरे एशिया में सबसे अलग बनाती हैं.
शेनज़ेन से निकली कई कंपनियों जैसे टेंसेंट, ज़ेडटीई और वॉवे ने दुनिया में पहचान बनाई है.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक़, पिछले साल वॉवे ने शोध पर 14 अरब डॉलर ख़र्च किये.


तराशा जाता है हुनर
शेनज़ेन में टेक्नोलॉजी स्टार्ट-अप शुरू करने वाले बताते हैं कि जिस रफ़्तार में आप शेनज़ेन में उपकरण ख़रीदकर प्रोटोटाइप बना सकते हैं, उन्हें टेस्ट कर सकते हैं और फिर बाज़ार में उतार सकते हैं, वो दुनिया में कहीं भी संभव नहीं है.
उसका कारण है यहाँ मौजूद हर तरह का हुनर और सस्ते दामों में आसानी से मिलने वाली मशीनें, चिप्स या कंपोनेंट.
यूरोप से आये मिलान ग्लामोचिक ने 4 साल पहले बच्चों को रोबोटिक्स सिखाने के लिए यहाँ स्कूल खोला.
स्कूल में पाँच से 12 साल के बच्चों को साइंस, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, रोबोटिक्स की शिक्षा दी जाती है.
यहाँ हर घंटे पढ़ाई की फ़ीस कुछ हज़ार रुपये है, इसलिए यहाँ सिर्फ़ अमीर परिवारों के बच्चे ही आते हैं.

मिलान ने कहा, "इन बच्चों को छूट है कि वो अपने डिज़ाइन ख़ुद बनाएं. अगर वो फ़ेल होते हैं तो दोबारा कोशिश करते हैं ताकि ख़ुद परेशानियों का हल ढूंढें."
स्कूल की क्लास में एक मेज़ के चारों ओर छोटे-छोटे और बेहद जटिल से दिखने वाले उपकरण बिखरे हुए थे.
मिलान ने अमरीका के सिलिकॉन वैली सहित दुनिया के कई देशों में काम किया है और उनकी मानें तो शेनज़ेन में तकनीक की रफ़्तार इतनी तेज़ है कि उसके साथ बने रहना आसान नहीं.
वो बताते हैं, "हम तकनीक के विकास के केंद्र में हैं. हमारे पास प्रोग्राम के विकास के लिए सभी सुविधाएं हैं.
हम जिन प्रोग्राम का विकास करते हैं कल वो दुनिया में फैल जाएंगे. चाहे हार्डवेयर हों या सॉफ़्टवेयर, शेनज़ेन में हर वो चीज़ मौजूद है जिसकी हमें ज़रूरत है."

इलेक्ट्रॉनिक्स के बाज़ार
शेनज़ेन के मशहूर ह्वा छियांग पेई बाज़ार ऐसी ही जगह है जहाँ हर तरह का इलेक्ट्रॉनिक सामान उपलब्ध है.
बाहर सड़क पर जहाँ सामान को चढ़ाया या उतारा जा रहा था, इस बहुमंज़िला एयरकंडीशंड बाज़ार के अंदर इलेक्ट्रॉनिक सामान भरा हुआ था.
मोबाइल, ड्रोन, चिप्स, कंपोनेंट. यहाँ हर चीज़ मिलती है. बस आप में मोलभाव का हुनर होना चाहिए. शेनज़ेन में ऐसे कई बाज़ार हैं.

आंकड़ों के मुताबिक, शहर की अर्थव्यवस्था जहाँ 1979 में करीब 30 मिलियन डॉलर थी, वहीं साल 2016 में ये 256 अरब डॉलर तक पहुँच गई.
भारतीय कंपनी लावा ने भी इन्हीं कारणों से साल 2009 में अपने मोबाइल, टैबलेट, फ़ीचर फ़ोन के डिज़ाइन, मैन्युफ़ैक्चरिंग आदि के लिए यहाँ रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर खोला था.
शेनज़ेन को बेस बनाकर लावा कंपनी बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मध्य-पूर्व, मेक्सिको, मिस्र और अफ़्रीका जैसे बाज़ारों में अपने प्रोडट्स बेचती है.
दोपहर में जब हम नानशान ज़िले में लावा के दफ़्तर के एक कमरे में पहुँचे तो वहाँ चारपाई लगाकर कर्मचारी सो रहे थे.

शेनज़ेन में काम करने का यही दस्तूर है. यहाँ आपको दोपहर एक घंटे आराम करने के लिए दफ़्तरों में चारपाइयाँ मिलेंगी.
शेनज़ेन में पाँच सालों से रह रहे कंपनी के डीजीएम फ़ाइनेंस रति राम कहते हैं, "शेनज़ेन में ऑप्शन ज़्यादा हैं. अगर आप बाज़ार में मशीनरी या पार्ट्स ख़रीदने जाते हैं तो यहाँ आपको वाजिब दाम में सभी चीज़ें मिल जाती हैं. यहाँ लोगों से बात करना आसान है, ढेर सारे कंपोनेंट के सप्लायर हैं. भारत में ये संभव नहीं. यहाँ सस्ते से सस्ता और अच्छे से अच्छा हर सामान मिल जाता है."
दिल्ली के रहने वाले रति राम ने चीन में ही शादी की है.
रतिराम कहते हैं कि उनके भारतीय इंजीनियर शेनज़ेन आकर डिज़ाइन, रिसर्च, मैन्युफ़ैक्चरिंग में यहाँ कई बातें सीखने आते हैं.

निवेश मिलने में आसानी
शेनज़ेन की आर्थिक संपन्नता का एक महत्वपूर्ण कारण है सरकारी सब्सिडी या कंपनियों में निवेश करने वाले वेंचर कैपिटलिस्ट.
स्मार्ट हेडलाइट, बिल्ट-इन स्पीकर जैसी सुविधाओं से लैस हेल्मेट बनाने वाली कंपनी लिवॉल के संस्थापक 46 साल के ब्रायन झंग ने 4 साल पहले कंपनी शुरू करने के लिए शेनज़ेन को चुना. वो सबसे पहले 1994 में शेनज़ेन आए थे.
झंग बताते हैं, "उस वक्त ये एक छोटा सा, साफ़-सुथरा शहर हुआ करता था जहाँ एक या दो महीने में कार धोने की ज़रूरत पड़ती थी. तब मुझे महीने के लिए 600 युआन (क़रीब 6,000 रुपये) मिलते थे."

आज 600 युआन में शेनज़ेन में आपको रहने का घर भी न मिले.
लिवॉल को रिसर्च, पेटेंट और ट्रेडमार्क के लिए सरकार से 25 मिलियन युआन मिले जिसकी मदद से कंपनी ने दुनिया के कई देशों में बिज़नेस फैलाया.
झंग कहते हैं, "शेनज़ेन में कुछ नया अविष्कार करने वाले स्टार्ट अप्स को प्रोत्साहन देने की नीति है. सरकार से ये पैसा इसलिए दिया जाता है ताकि कंपनी तेज़ी से आगे बढ़े. हमने चीन और दुनिया भर में 170 पेटेंट के लिए आवेदन दिए और किसी स्टार्टअप के लिए इतना धन ख़र्च करना आसान नहीं था."
गुज़रे 40 सालों में गाँव से इस पावर-हाउस शहर में तब्दील शेनज़ेन में मौक़ों की कोई कमी नहीं है.

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