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ट्रंप-किम सम्मेलन रद्द होने के लिए कौन दोषी
- Author, संदीप कुमार मिश्रा
- पदनाम, असोसिएट प्रोफ़ेसर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 24 मई 2018 को उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को पत्र भेजकर 12 जून 2018 को सिंगापुर में प्रस्तावित सम्मेलन को रद्द करने की जानकारी दी थी.
यह घटना तब हुई जब दिन में उत्तर कोरिया ने पुंगेरी स्थित अपनी परमाणु परीक्षण सुविधाओं को दुनियाभर के पत्रकारों के आगे नष्ट कर दिया था.
इसने कइयों को चौंकाया लेकिन इसकी प्रक्रिया बीते कुछ सप्ताह से धीरे-धीरे जारी थी.
16 मई 2018 के बाद से उत्तर कोरिया ने कई बार अमरीकी रुख़ पर असंतोष जताया था.
इस दौरान उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के साथ अंतर-कोरिया सैन्य बातचीत को रद्द कर दिया. उत्तर कोरिया ऑपरेशन मैक्स थंडर से असहज था जो दक्षिण कोरिया और अमरीकी वायुसेना के बीच जारी थी.
'कड़वे' बयानों का दौर रहा
साथ ही उत्तर कोरिया ने अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बॉल्टन के बयान पर नाराज़गी जताई थी. बॉल्टन ने कहा था कि वह उत्तर कोरिया को परमाणु मुक्त करने के लिए लीबिया मॉडल अपनाने की सलाह देंगे.
इसमें आगे अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का बयान आया उन्होंने उत्तर कोरिया को चेतावनी दी कि अगर परमाणु हथियार नष्ट नहीं किए गए तो किम जोंग उन का हाल कर्नल गद्दाफ़ी जैसा होगा.
हालांकि, इस दौरान उत्तर कोरिया के अधिकारियों के बयान बेहद तीखे होते गए लेकिन परमाणु परीक्षण स्थल को उसने अपनी योजना अनुसार नष्ट कर दिया.
इसके अलावा ट्रंप और किम के बीच विरोध पाटने के लिए दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन ने 23 मई 2018 को अमरीका की यात्रा की. उस दौरान अमरीकी राष्ट्रपति ने भी कहा कि 'कुछ शर्तें' पूरी नहीं होती तो उनकी किम जोंग उन से मुलाक़ात स्थगित कर दी जाएगी.
अमरीकी उप-राष्ट्रपति माइक पेंस के एक इंटरव्यू के बाद उत्तर कोरिया ने उन्हें 'अज्ञानी और बेवकूफ़' बताया था. दरअसल, इंटरव्यू में पेंस ने कहा था कि अमरीका के साथ अगर खेलने की कोशिश की गई तो यह उत्तर कोरिया की ओर से 'बड़ी ग़लती' होगी और किम जोंग उन अगर सौदा नहीं कर पाते हैं तो उसका हश्र लीबिया जैसा होगा.
उत्तर कोरिया के विदेश मामलों के उप-मंत्री ने कहा था कि उत्तर कोरिया 'न तो अमरीका के साथ बातचीत के लिए विनती करेगा और न ही साथ बैठने के लिए उन्हें राज़ी करने के लिए परेशानी मोल लेगा.'
हाल के महीनों में परमाणु हथियार नष्ट करने में उत्तर कोरिया की अचानक रुचि और इरादे ने शक ज़रूर पैदा किया है लेकिन यह अनुचित है कि उत्तर कोरिया के परमाणु मुक्त करने के मौक़े को आक्रामक बयानों, ढीठपने से बिगाड़ दिया जाए.
असल में अमरीकी नेताओं ने इस तरह के बयान देने शुरू किए थे क्योंकि उनका मानना था कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियार अमरीकी दबाव नीति के कारण नष्ट करने पर राज़ी हुआ है.
प्रतिबंध और दबाव से डरा उत्तर कोरिया?
अमरीकी प्रशासन सोचता है कि ताज़ा प्रतिबंधों के कारण उत्तर कोरिया अभूतपूर्व अलगाव का सामना कर रहा है.
उत्तर कोरिया के कच्चे तेल, कपड़ा उद्योग और विदेशी धन समेत कई पर प्रतिबंध हैं. साथ ही अन्य प्रतिबंध की धमकियों के बाद उत्तर कोरिया घुटनों पर आ गया था और उसके सामने अमरीका से बातचीत के अलावा कोई चारा नहीं था.
गढ़ी गई इस कहानी ने बिना किसी पर्याप्त तथ्यों या आंकड़ों के बार-बार माहौल बनाया.
इसके बाद अमरीकी प्रशासन ने माना की यह कहानी सही है, ट्रंप इस क्षेत्र में सम्मेलन को लेकर एक इंच भी पीछे नहीं हटे बल्कि वह कठोर ही बने रहे.
उन्होंने रेक्स टिलरसन और एच.आर. मैकमास्टर को हटा दिया और उनकी जगह माइक पोम्पेओ और जॉन बॉल्टन को ले आए जो उनकी विदेशी नीति टीम के मुख्य खिलाड़ी हैं.
ट्रंप प्रशासन एकतरफ़ा तरीक़े से ईरान समझौते से बाहर निकल आया और उसके उत्तर कोरिया के साथ संबंधों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
अमरीका का दावा है कि अधिक दबाव उत्तर कोरियाई शासन पर काम कर रहा है. साथ ही उस पर अलगाव और प्रतिबंध भी कम होता नहीं दिख रहा है.
उत्तर कोरिया पहले से ही एक अलग-थलग पड़ चुका देश है और अगर उसे और अलग-थलग किया जाता है तो उस पर ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.
यहां तक की ज़मीन पर चीन उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाता दिखता है लेकिन बीजिंग और प्योंगयांग के बीच आदान-प्रदान जारी है क्योंकि उत्तर कोरिया का समर्थन करने की चीन की अपनी वजहें हैं.
भले ही उत्तर कोरिया पर कितने भी कड़े प्रतिबंध लगा दिए जाएं लेकिन इस देश के शासक वर्ग पर अधिक असर नहीं पड़ेगा. इन कारणों के अलावा पिछले चार दशकों में उत्तर कोरिया के विनाश के बारे में सैकड़ों भविष्यवाणियां ग़लत साबित हुई हैं.
उत्तर कोरिया ने बनाई बढ़त
अमरीकी दृष्टिकोण में बुनियादी त्रुटियों के कारण उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ प्रस्तावित सम्मेलन रद्द हुआ है.
यहां तक कि हालिया बयानों और गतिविधियों के बाद भी उत्तर कोरिया ने राज़ी करने की कोशिश की थी लेकिन अमरीका इसे गंभीरता से नहीं ले रहा था. उत्तर कोरिया के विदेश नीति के उप-मंत्री चॉय सन ही ने 24 मई को ट्रंप प्रशासन को बैठक रद्द करने को लेकर चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि यह समय-समय की बात है कि कौन-सी पार्टी कब बैठक रद्द करती है.
इस बदली हुई तस्वीर में ऐसा लगता है कि उत्तर कोरिया को झटका लगा है. वह अब अमरीका से बातचीत करने में समर्थ नहीं होगा. पिछले कुछ हफ़्तों में उच्चस्तरीय बैठक कर प्योंगयाग चीन और दक्षिण कोरिया से फिर से जुड़ने में समर्थ है.
वास्तव में अमरीका के साथ यह मेल-मिलाप का कार्यक्रम दक्षिण कोरिया का था क्योंकि उत्तर कोरिया और अमरीकी नेतृत्व को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं रहा है.
अमरीकी राष्ट्रपति की हालिया घोषणा उत्तर कोरिया को ग्राउंड ज़ीरो पर ले गई है जो उसके लिए कठिन परिदृश्य होगा लेकिन अभूतपूर्व बिलकुल नहीं होगा.
ट्रंप की इस घोषणा ने दक्षिण कोरिया की विदेश नीति को ज़रूर दुविधा में डाल दिया है जिसे अपने सबसे क़रीबी दोस्त अमरीका और पड़ोसी उत्तर कोरिया में से किसी एक को चुनना होगा.
जहां तक दक्षिण कोरिया का सवाल है वह किसी एक को चुनने की जगह दोनों से सामंजस्य बिठाने की कोशिश करेगा.
अमरीका के सम्मेलन रद्द करने के बाद वह उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ कड़ा रवैया अपनाएगा और सेना की कार्रवाई जैसी नीति भी अपनाई जा सकती है. दक्षिण कोरिया का अमरीका के साथ समझौते में रहना मुश्किल होगा.
अगर इस पूरे घटनाक्रम का शुरुआती निष्कर्ष निकाला जाए तो यह कहा जा सकता है इस पूरी प्रक्रिया में उत्तर कोरिया ने काफ़ी अंक हासिल किए हैं.
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