विवेचनाः इसराइल की गोल्डा मेयर ने 1971 के युद्ध में की थी भारत की मदद

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गोल्डा मेयर के बारे में कहा जाता था कि वो पूरे इसराइल की दादी अम्मा हैं. वो पुराने ज़माने का स्कर्ट और कोट पहनती थीं.

उनके जूते हमेशा काले होते थे और वो जहाँ भी जाती थीं, उनके हाथ में उनका पुराना हैंड बैग होता था. वो 'चेन स्मोकर' थीं और उनकी सिगरेट में कोई 'फ़िल्टर' नहीं होता था.

वो अक्सर लोगों से अपनी रसोई में चाय पीते हुए मिलती थीं, जिसे उन्होंने ख़ुद बनाया होता था. वो लेडीज़ घड़ी न पहन कर पुरुषों की घड़ी पहनती थीं.

वो अपने हाथ से सेब काट कर अपने मेहमानों को खिलाती थीं.

उनके बारे में इसराइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियों ने कहा था कि 'गोल्डा मेरे मंत्रिमंडल की अकेली पुरुष थीं.'

और किसी संदर्भ में ये बात किसी भी महिला को अच्छी लगती, लेकिन इसे सुनते ही गोल्डा मेयर अपने दांत पीसने लगती थीं.

उनका मानना था कि किसी भी काम को किसी शख़्स के लिंग से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए.

निक्सन थे गोल्डा मेयर के मुरीद

गोल्डा मेयर का जन्म 3 मई, 1898 को यूक्रेन की राजधानी किएव में हुआ था.

वो उन लोगों में शामिल थीं जिन्होंने 1948 में इसराइल की आज़ादी को घोषणा पत्र पर दस्तख़त किए थे. 1956 में वो इसराइल की विदेश मंत्री बनी थीं.

1965 में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम करने के बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था.

1969 में जब इसराइल के तीसरे प्रधानमंत्री लेवाई एशकॉल की मौत हुई तो उन्हें संन्यास से वापस बुला कर इसराइल का प्रधानमंत्री बनाया गया.

1971 में वो प्रधानमंत्री की तौर पर पहली बार अमरीका गईं, जहाँ राष्ट्रपति निक्सन उनके बातचीत करने के अंदाज़ से बहुत प्रभावित हुए थे.

बाद में उन्होंने अपनी आत्मकथा 'आर एन : द मेमोरीज़ ऑफ़ रिचर्ड निक्सन' में लिखा था, "मुझे अच्छी तरह से याद है जब हम दोनों ओवल ऑफ़िस की कुर्सियों पर बैठे और फ़ोटोग्राफ़र हमारी तस्वीरें लेने आए तो गोल्डा मुस्करा रही थीं और दोस्ती भरी बातें कर रही थीं. जैसे ही फ़ोटोग्राफ़र कमरे से विदा हुए, उन्होंने अपने बांए पैर के ऊपर अपना दाहिना पैर रखा, अपनी सिगरेट सुलगाई और बोलीं, 'मिस्टर प्रेसिडेंट, अब बताइए आप उन विमानों के बारे में क्या कर रहे हैं, जिनकी हमें बहुत सख़्त ज़रूरत है? गोल्डा मेयर का व्यवहार एक पुरुष की तरह होता था और वो ये चाहती थीं कि उनके साथ भी एक पुरुष की तरह ही व्यवहार किया जाए."

भारत की गुप्त रूप से मदद

1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान गोल्डा मेयर ने गुप्त रूप से भारत को सैनिक सहायता पहुंचाई थी जबकि दोनों देशों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं थे और इसराइल का सबसे नज़दीकी दोस्त अमरीका पाकिस्तान का साथ दे रहा था.

अमरीकी पत्रकार गैरी जे बास ने नेहरू लाइब्रेरी में रखे हुए 'हक्सर पेपर्स' का हवाला देते हुए अपनी किताब 'ब्लड टेलिग्राम' में लिखा है, "इसराइल की प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने गुप्त रूप से इसराइली शस्त्र विक्रेता श्लोमो ज़बलुदोविक्ज़ के ज़रिए भारत को कुछ 'मोर्टार्स 'और हथियार भिजवाए. उन हथियारों के साथ कुछ इसराइली प्रशिक्षक भी भारत आए. जब इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पी एन हक्सर ने और हथियारों के लिए अनुरोध किया तो गोल्डा मेयर ने उन्हें आश्वस्त किया कि हम आपकी मदद करना जारी रखेंगे."

वो आगे लिखते हैं, "उस समय इसराइल ने ये संकेत भी दिया था कि इस मदद के बदले भारत को इसराइल से कूटनीतिक संबंध स्थापित करने चाहिए, जिसे उस समय भारत ने ये कहते हुए विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था कि इसे सोवियत संघ पसंद नहीं करेगा."

बीस साल बाद नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार ने इसराइल के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित किए थे.

'रैथ ऑफ़ गॉड'

1972 में जब म्यूनिख़ ओलंपिक में अरब चरमपंथियों ने ओलंपिक गांव में घुस कर 11 इसराइली खिलाड़ियों को मार डाला तो गोल्डा ने मोसाद के एजेंटों को आदेश दिया कि इस अपराध करने वाले हर व्यक्ति को, चाहे वो दुनिया के किसा भी कोने में क्यों न हो, चुन चुन कर मारा जाए. इस ऑप्रेशन को 'रैथ ऑफ गॉड' का नाम दिया गया था.

इस प्रकरण पर एक किताब 'वन डे इन सेपटेंबर' लिखने वाले साइमन रीव्स कहते हैं, "गोल्डा मेयर ने जनरल अहारोन यारीव और ज़्वी ज़मीर को अपने घर बुलवाया. उन्होंने पहले यहूदी लोगों की त्रासदी और फिर जर्मनी में उनके साथ किए गए सलूक का ज़िक्र किया. फिर उन्होंने म्यूनिख का ज़िक्र किया जहाँ 11 इसराइली खिलाड़ियों को मौत के घाट उतार दिया गया था. अचानक उन्होंने एक आह भरी, अपना सिर उठा कर यारीव और ज़मीर की आँखों में देखा और मज़बूत और साफ़ आवाज़ में कहा, 'सेंड फ़ोर्थ द ब्वाएज़."

जॉर्डन के शाह हुसैन की गोल्डा से गुप्त मुलाकात

1973 में मिस्र और सीरिया ने इसराइल के सबसे पवित्र यौम किप्पूर के दिन इसराइल पर हमला बोल दिया. इस हमले का थोड़ा बहुत आभास गोल्डा मेयर को था.

25 सितंबर, 1973 की सुबह तेल अवीव के उत्तर में हर्ज़लिया में मोसाद के एक सेफ़ हाउज़ पर एक बेल 206 हेलीकॉप्टर ने लैंड किया. लैंड करते ही इसराइल के शीर्ष नेतृत्व में हड़कंप सा मच गया. आख़िर रोज़-रोज़ तो जॉर्डन के शाह हुसेन सीमा पार कर इसराइल की प्रधानमंत्री से आपात बैठक करने नहीं आते. वो एक बड़ी ख़बर ले कर गोल्डा मेयर के पास आए थे.

उन्हें सीरिया के एक संवेदनशील सूत्र ने' टिप ऑफ़' किया था कि सीरिया इसराइल पर हमला करने की योजना बना रहा है.

गोल्डा मेयर की जीवनी लिखने वाली एलीनोर बर्केट लिखती हैं, "गोल्डा का शाह हुसैन से पहला सवाल था, क्या सीरिया, ऐसा मिस्र के बिना करेगा? हुसैन ने जवाब दिया था, 'मेरा आकलन है कि मिस्र सीरिया के साथ सहयोग करेगा.' जब रक्षा मंत्री मोशे दायान को इसके बारे में बताया गया तो उन्होंने इसको कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी. उन्होंने कहा कि जॉर्डन के मिस्र के साथ इस तरह के संबंध नहीं हैं कि उन्हें इसके बारे में जानकारी होगी. उन्होंने गोल्डा से कहा, हम सीरिया पर नज़र रखेंगे. चिंता की कोई बात नहीं है."

गोल्डा मेयर की नाकामी

इसराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद को ये भी पता चल गया था कि मिस्र की सेना की एक डिवीजन स्वेज़ नहर की तरफ़ बढ़ रही है और उसके एक लाख, 20 हज़ार रिज़र्व सैनिकों को बुला लिया गया है.

इसको सुन कर भी मोशे दायान ने कहा था कि मिस्र अपना 'रूटीन' सैनिक अभ्यास कर रहा है. बाद में कई लोगों ने कहा कि इस हमले को न रोक पाना गोल्डा मेयर की एक बहुत बड़ी असफलता थी.

'किंग्स कालेज,' लंदन के युद्ध अध्ययन विभाग के डाक्टर एरिक ब्रैगमेन, जो कि इसराइली सेना में भी काम कर चुके हैं, बताते हैं, "गोल्डा को विश्वास था कि समय इसराइल के साथ है. अगर इसराइल धीरज रखे तो थोड़े दिनों में अरब इस बात के आदि हो जाएंगे कि साइनाई इसराइल का हिस्सा है और गोलान हाइट्स और पश्चिमी किनारा भी इसराइल का ही एक भाग है."

वो आगे कहते हैं, "मेरा ख़्याल है कि गोल्डा की ये सोच ग़लत थी. मैं एक नेता से उम्मीद करता हूँ कि उसकी नज़र उन चीज़ों पर जाए, जिनकी तरफ़ हम जैसे साधारण लोगों का ध्यान नहीं जाता. मेरे विचार से अगर उन्होंने 1971 में अरबों के दिए गए प्रस्ताव को मान लिया होता तो यौम किप्पूर की लड़ाई नहीं होती जिसमें इसराइल के करीब 3000 सैनिक मारे गए. हमारे लिए वो एक दिल दहला देने वाली घटना थी."

गोल्डा ने मिस्र पर पहले हवाई हमला रोका

इसराइल को युद्ध शुरू होने के छह घंटे पहले ही मिस्र से अपने एक उच्च सूत्र से पता चल गया कि मिस्र इसराइल पर हमला करने जा रहा है. लेकिन इसका जवाब किस तरह से दिया जाए, इस बारे में इसराइली सेना के शीर्ष नेतृत्व में मतभेद थे.

गोल्डा मेयर अपनी आत्मकथा 'माई लाइफ़' में लिखती हैं, "इसराइल के सेनाध्यक्ष डाडो पहले मिस्र पर हवाई हमला करने के पक्ष में थे, क्योंकि ये तो साफ़ हो चला था कि लड़ाई तो होनी ही है. उन्होंने मुझसे कहा कि हमारी वायु लेना दोपहर तक हमला करने की स्थिति में होगी, बशर्ते आप इसी समय हमले का आदेश दे. लेकिन मैंने पहले से ही अपना मन बना लिया था. मैंने कहा डाडो मैं इसके ख़िलाफ़ हूँ. हमें भविष्य के बारे में कुछ पता नहीं. हो सकता है कि हमें बाहरी मदद की ज़रूरत हो. लेकिन अगर हम पहले हमला करते हैं, तो हमें बाहर से कोई मदद नहीं मिलेगी. मैं इस प्रस्ताव को दिल से हाँ कहना चाहती हूँ, लेकिन मुझे तुम्हें न कहना पड़ रहा है."

उन्हीं दिनों का एक और चित्रण एलीनोर बर्केट ने गोल्डा मेयर पर लिखी जीवनी में भी किया है.

बर्केट लिखती हैं, "मोशे दायान दौड़ते हुए गोल्डा के दफ़्तर में घुसे और बोले, गोल्डा मैं ग़लत था. हम बरबादी की तरफ़ बढ़ रहे हैं. आप चाहें तो मेरा इस्तीफ़ा ले लीजिए. गोल्डा ने इनकार कर दिया. जैसे ही दायान बाहर गए, गोल्डा एक हॉल में चली गईं. उनके सहयोगी लू काडर ने देखा कि वो रो रही थीं."

बर्केट आगे लिखती हैं, "वो बोली, दायान हथियार डालने के बारे में सोच रहे हैं. तुम मेरे एक दोस्त के घर जाओ. वो डॉक्टर हैं. मैं उससे कहूंगी कि वो तुम्हें कुछ गोलियाँ दे दे, जिनसे मैं अपने आप को मार सकूं, ताकि मैं ज़िदा अरबों के हाथ न पड़ सकूं."

नस्लवाद के आरोप

यौम किप्पूर युद्ध में भले ही आख़िरी जीत इसराइल की हुई हो, लेकिन उसके 3000 सैनिक इस लड़ाई में खेत रहे और ये परिकल्पना हमेशा के लिए जाती रही कि इसराइल को कभी नहीं हराया जा सकता.

गोल्डा मेयर को समय से पहले अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. मैंने इसराइल में रह रहे भारतीय पत्रकार हरेंद्र मिश्रा से पूछा कि गोल्डा मेयर की मौत के 40 साल बाद इसराइल के लोग उन्हें किस तरह से देखते हैं?

हरेंद्र ने बताया, "गोल्डा को ले कर इसराइल में दो खेमे हैं. एक खेमा तो ये मानता है कि वो बहुत ताक़तवार नेता थी. उन्होंने इसराइल देश बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वो अपनी बात बेबाकी से कहती थीं और अपने फ़ैसलों पर अडिग रहती थीं. लेकिन दूसरा खेमा मानता था कि 'एशियाई और अफ्रीकी यहूदियों के लिए उनके दिल में कोई ख़ास जगह नहीं थी. वो उन पर नस्लवाद का भी आरोप लगाते थे. लेकिन कुल मिला कर उन्हें इसराइल के बड़े नेताओं में शुमार किया जाता है."

दिन में 18 घंटे काम

75 साल की उम्र में भी वो 25 साल की युवती की तरह काम करती थीं और उनका दिन सुबह चार बजे समाप्त होता था.

गोल्डा मेयर अपनी आत्मकथा माई लाइफ़ में लिखती है, "कभी कभी मेरे निवास के बाहर तैनात अंगरक्षक देखते थे कि सुबह 4 बजे भी मेरी रसोई की लाइट जली हुई है. उनमें से एक ये देखने के लिए अंदर आता था कि मैं ठीकठाक तो हूं ना. मैं हम दोनों के लिए चाय बनाती थी और हम तब तक अलग अलग विषयों पर बातें करते थे जब तक मुझे नहीं लगता था कि अब मुझे सोने जाना चाहिए."

एक बार गोल्डा मेयर ने एक इंटरव्यू में कहा था, "जब कभी शांति आएगी तो हम शायद अरबों को माफ़ कर भी दें कि उन्होंने हमारे बेटों को मारा है, लेकिन हम उन्हें इस बात के लिए कभी माफ़ नहीं करेंगे कि उन्होंने हमें उनके बेटे मारने के लिए मजबूर किया है."

कमियों के साथ बहुत सी अच्छाइयाँ

गोल्डा मेयर का सबसे अच्छा आकलन एडविना करे ने किया है जिनका मानना है कि गोल्डा एक इंसान थीं जिनमें कुछ ख़ामियों के साथ साथ बहुत सारी अच्छाइयाँ भी थीं.

एडविना कहती हैं, "इस तरह के लोग दुनिया में हैं जो एक महान नेता को ईजाद करना चाहते हैं - इस तरह का नेता जिसमें कोई खोट न हो. लेकिन वो असली लोगों का नेता नहीं होता, क्योंकि लोगों में अच्छाइयों के साथ साथ कुछ कमियाँ भी होती हैं. लेकिन इसके बावजूद अगर हम उनकी तारीफ़ कर रहे हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि हम उन्हें बेहतर ढ़ंग से समझ पा रहे हैं."

वो कहती हैं, "गोल्डा भावपूर्ण थीं, अपने देश के लिए प्रतिबद्ध थीं ,कठोर थीं, हालात से समझौता करना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं था. हाँ उनसे भी कुछ ग़लतियां हुईं. लेकिन वो एक असली इंसान थीं. वो वह महिला नहीं थीं जिसका रोल किसी 'स्क्रिप्ट राइटर' ने लिखा था."

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