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यहां से आता है उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के लिए पैसा
उत्तर कोरिया के पास एक के बाद एक मिसाइल बनाने के लिए पैसा कहां से आता है?
तक़रीबन दो साल से कई देशों में चल रही एक जांच की मानें तो क़रीब डेढ़ लाख उत्तर कोरियाई लोग दूसरे देशों में रहकर पैसा कमाते हैं और यही पैसा किम जोंग-उन के परमाणु कार्यक्रम में इस्तेमाल होता है.
खुफ़िया तरीके से की गई यह जांच अलग-अलग देशों के कुछ पत्रकारों ने एक अंतरराष्ट्रीय समूह बनाकर की जिसमें रूस, चीन और पोलेंड में काम कर रहे उत्तर कोरियाई लोगों से बात की गई.
इस जांच के मुताबिक़ ये लोग जो कर रहे हैं उसे 21वीं सदी में होने वाली ग़ुलामी माना जा सकता है.
उत्तर कोरिया के इन लोगों को हर साल एक बिलियन पाउंड यानी क़रीब 9,335 करोड़ रुपये कमाने के लिए विदेश भेजा गया है.
लंदन में उत्तर कोरिया के उप-राजदूत रहे थे योंग-हो के मुताबिक़ इसमें से ज़्यादातर पैसा किम जोंग-उन के परमाणु कार्यक्रम में लगाया जाता है.
थे योंग-हो कहते हैं, "अगर ये पैसा शांति से देश की तरक्की के लिए खर्च होता तो अर्थव्यवस्था बेहतर हालत में होती. तो फिर सारा पैसा कहां गया? इसे किम और उनके परिवार के ऐशोआराम, परमाणु कार्यक्रम और सेना पर खर्च किया गया. ये एक तथ्य है."
इस जांच के दौरान पत्रकारों की एक अंडरकवर टीम रूस के व्लादिवोस्तोक शहर में फ़्लैट ढूंढ रहे लोगों की तरह गई और वहां काम करने वाले उत्तर कोरियाई लोगों से मिली.
रिपोर्टर: आपको यहां पर काम करने के कितने रुपये मिलते हैं?
उत्तर कोरियाई व्यक्ति: अभी सब कुछ हमारे कप्तान को मिलता है.
रिपोर्टर: कप्तान? जो इस समय इंचार्ज है? कोई रूसी व्यक्ति?
उत्तर कोरियाई व्यक्ति: नहीं, एक उत्तर कोरियाई शख़्स.
ये लोग अजनबियों के साथ खुलकर बात करने में हिचक रहे थे लेकिन एक मज़दूर नाम छुपाने की शर्त पर कोरियाई पत्रकार से बात करने के लिए तैयार हो गया.
उत्तर कोरियाई मज़दूर: "यहां पर आपके साथ कुत्तों जैसा व्यवहार होता है और ढंग से खाने को भी नहीं मिलता. यहां रहते हुए आप ख़ुद को इंसान मानना बंद कर देते हैं."
इस मज़दूर ने भी बताया कि उन्हें अपनी ज़्यादातर कमाई किसी और को सौंपनी होती है.
उत्तर कोरियाई मज़दूर: "कुछ लोग इसे पार्टी के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी बताते हैं तो कुछ इसे क्रांति के प्रति फ़र्ज़ कहते हैं. जो ऐसा नहीं कर सकते, वे यहां नहीं रह सकते."
बताया जाता है कि पोलैंड के शिपयार्ड में 800 उत्तर कोरियाई काम करते हैं जिनमें से ज़्यादातर वेल्डर और मज़दूर हैं.
जांच कर रही अंडरकवर टीम ने पोलैंड के स्तेचिन शहर में नौकरी देने वाली एक कंपनी के प्रतिनिधि के तौर पर वहां के एक गार्ड से मुलाक़ात की.
गार्ड: "उत्तर कोरियाई लोग स्तेचिन में सब जगह हैं. वे यहां और दूसरी कंपनियों में भी काम करते हैं. उनकी हालत ऐसी ही है जैसी हमारी साम्यवाद के दौर में थी. आपको पता है कि उन्हें बात करने की इजाज़त क्यों नहीं है? कहीं पश्चिम उन्हें लुभा न ले."
गार्ड ने पत्रकारों की टीम को उत्तर कोरियाई मज़दूरों के फ़ोरमैन यानी मुखिया से भी मिलाया.
फ़ोरमैन: "हमारे लोग पोलैंड काम करने आए हैं. वे सिर्फ़ बग़ैर वेतन वाली छुट्टियां लेते हैं. जब कम समय में काफ़ी काम करना होता है तो हम बिना रुके काम करते हैं. हम पोलैंड के लोगों की तरह नहीं हैं जो एक दिन में आठ घंटे काम करें और घर चले जाएं. हम ऐसा नहीं करते, हम जब तक ज़रूरत होती है तब तक काम करते हैं."
वारसॉ में मौजूद उत्तर कोरियाई दूतावास कहता है कि उसके नागरिक पोलैंड के क़ानून और यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक़ काम कर रहे हैं.
पोलैंड की सरकार के मुताबिक़ वह लगातार पड़ताल करती रही है और ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि कमाई को उत्तर कोरिया भेजा जा रहा हो.
साथ ही सरकार का कहना है कि पोलैंड ने उत्तर कोरियाई नागरिकों को नए वर्क परमिट जारी करना बंद कर दिया है.
यूएन के प्रतिबंध जारी लेकिन
पूर्व उप-राजदूत थे योंग-हो कहते हैं कि "इसमें कोई शक़ नहीं है कि विदेशों में काम करने वाले कामगारों की कमाई से उत्तर कोरिया में रह रहे उनके परिवारों का गुज़ारा चलता है लेकिन क्या हमें इसके लिए प्रतिबंधों को हटा देना चाहिए? इसके अलावा हम किस तरह उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलों को रोक सकते हैं?"
एक कंपनी जेएमए ने अपने बयान में कहा है कि उसने उत्तर कोरियाई लोगों को नौकरी पर नहीं रखा है और उसकी जानकारी के मुताबिक़ उनके सभी कर्मचारी कानूनी रूप से काम कर रहे हैं.
सयुंक्त राष्ट्र संघ ने दिसंबर में उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगाए थे जिसके बाद उत्तर कोरियाई नागरिकों के विदेशों में काम करने पर रोक लगा दी गई है लेकिन ऐसे देश जहां उत्तर कोरियाई लोग काम कर रहे हैं, उन्हें इस आदेश को मानने के लिए दो साल का समय दिया गया है.
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