'लोग मुझे एक अजीब जानवर की तरह देखते हैं'

पेरू के रहने वाले अलेकांद्रो रामोस अपने घर से बाहर नहीं निकलते क्योंकि लोग उन्हें अजीब तरह से देखते हैं. पिछले चार सालों से उनके शरीर के ऊपरी हिस्से में सूजन है और वह असामान्य तरीके से फूले हुए हैं.

उन्हें रोजाना के कामों में दिक्कतों के अलावा कपड़ों को लेकर भी परेशानी होती है. उनके साइज के कपड़े मिल पाना मुश्किल होता है.

रामोस का इलाज नेवी मेडिकल सेंटर में चल रहा है. पेरू की नेवी के डॉक्टर्स उनकी बीमारी का अध्ययन कर रहे हैं.

लंबे समय तक रामोस अपने घर से बाहर निकलने से भी कतराते थे. उन्हें इस बीमारी को लेकर शर्म महसूस होती थी.

रामोस ने बताया, "मैं शर्म के कारण बाहर नहीं निकलता क्योंकि लोग रुक-रुककर मुझे एक अजीब जानवर की तरह देखते हैं."

रामोस पैसों की कमी के कारण लंबे समय तक अपना इलाज नहीं करा पाए थे. लेकिन, एक टेलिविजन प्रोग्राम में उन्हें देखने के बाद नेवी ने उनके इलाज का जिम्मा लिया.

दोनों बाजुओं में बनी गांठ

उनके दोनों बाजुओं का आकार 62 और 72 सेंटीमीटर हो गया है जबकि एक पुरुष के बाजुओं का औसत आकार 33 से 35 सेंटीमीटर तक हो सकता है.

हर बाजू में गांठ बन गई है जो इतनी बड़ी है कि वह कंधे से मिल गई है. इस कारण शरीर का आकार बहुत बड़ा लगता है. रामोस का सीना सामान्य से ज्यादा फूल गया है.

रामोस एक गोताखोर हैं और उनका मानना है कि उन्हें ये बीमारी साल 2013 में गोताखोरी के दौरान हुई. तब वह पेरू में पाये जाने वाले एक सीफूड शोरोज को इकट्ठा करने समुद्र में 30 मीटर की गहराई में गए थे.

डॉक्टरों का कहना है कि अगर ऐसा है तो यह गोताखोरी के इतिहास में एक अनोखा और असाधारण मामला होगा.

कैसे हुई बीमारी?

शोरोज और शैलफिश इकट्ठा करने के लिए गोताखोरों को समुद्र में काफी गहरे उतरना पड़ता है. इस दौरान उन्हें मल-मूत्र भी रोकना पड़ता है क्योंकि वह ट्रक के टायर के रबड़ से बनी ड्रेस में होते हैं और उनके साथ मौजूद उपकरणों में पानी जाने का भी डर होता है.

गोताखोरों के साथ समुद्र की सतह पर नाव पर क्रू के और सदस्य भी होते हैं जो उनकी मदद करते हैं.

रामोस भी उस दिन इसी तरह की ड्रेस में पानी के अंदर थे. तब उन्हें महसूस हुआ कि उनके मुंह में ऑक्सीजन देने के लिए लगी नली से हवा आने की बजाय ऊपर की तरफ खिंच रही है.

इस दौरान किसी कारण से नाव और रामोस से जुड़ी नली कट गई और रामोस को 36 मीटर से अचानक तेजी से ऊपर आने के लिए कहा गया.

समुद्र की सतह तक आने के इन कुछ मिनटों ने रामोस की पूरी ज़िंदगी बदल दी.

नाइट्रोजन का असर

नेवल मेडिकल सेंटर में अंडरवॉटर फिजिशियन रॉल अलेकांद्रो एगुवादो ने बताया कि जब हम डुबकी लगाते हैं तो हम ज्यादा दबाव में होते हैं और इस कारण ऑक्सीजन और हवा में कई बदलाव होते हैं.

हवा में नाइट्रोजन की मात्रा 78 प्रतिशत होती है. हमारा शरीर इस गैस का इस्तेमाल नहीं करता है. लेकिन, सतह पर वापस आने के दौरान नाइट्रोजन खून के अंदर चली जाती है.

ऐसे में गोताखोरों को धीरे-धीरे ऊपर आना होता है जिससे नाइट्रोजन को रक्त वाहिकाओं से होते हुए फेफड़ों तक पहुंचने का काफी समय मिल जाता है और फिर गैस शरीर से बाहर चली जाती है.

लेकिन, तेजी से ऊपर आने पर नाइट्रोजन से बुलबुले बन जाते हैं और ये इतने बड़े होते हैं कि इससे रक्त प्रवाह रुक जाता है. इसे डिकंप्रेशन सिंड्रोम ​कहते हैं.

समुद्र के अंदर से सतह पर आने के लिए समय भी निर्धारित किया गया है. अगर यह काम तय प्रक्रिया के तहत नहीं किया गया तो नाइट्रोजन हड्डियों तक पहुंच जाती है. इससे बोन टिशू भी मर जाते हैं.

इसके कारण सूजन, सिरदर्द, चक्कर आने से लेकर लकवा और मौत भी हो सकती है.

रामोस एक पैर से अपाहिज थे लेकिन उन्होंने अपने पिता की तरह ही गोताखोरी का काम करने का फैसला किया.

वह पहले ज्यादा गहराई तक नहीं जा पाते थे लेकिन रामोस के बेटे को अस्थमा होने के कारण उन्हें इलाज के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत थी.

इसके लिए रामोस ने समुद्र में ज्यादा गहराई में जाना शुरू किया ताकि और सीफूड मिल सके.

हालांकि, डॉक्टरों को अभी तक यह साफ नहीं है कि रामोस को ये बीमारी गोताखोरी के कारण हुई है. इसकी वजह ट्यूमर भी हो सकता है. इसकी जांच की जा रही है.

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