You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कितना मुश्किल है एक प्रधानमंत्री के लिए मां बनना
- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क़रीब 30 साल पहले बेनज़ीर भुट्टो ऐसी पहली नेता थीं जो प्रधानमंत्री रहते हुए माँ बनी थीं. उन्होंने अपनी बेटी बख़्तावर को 25 जनवरी 1990 को जन्म दिया था.
अब न्यूज़ीलैंड की 37 साल की प्रधानमंत्री जैसिंडा ऑर्डर्न दुनिया की दूसरी नेता होंगी जो प्रधानमंत्री होते हुए माँ बनेंगी. लेकिन 1990 में ऐसा कर पाना बेनज़ीर के लिए आसान नहीं था. उन्हें ताने सहने पड़े थे कि प्रधानमंत्री को मेटरनिटी लीव का हक़ नहीं होता.
उस समय की न्यूज़ एजेंसियों और अख़बारों में नेशनल एसेंबली के नेता का ये बयान छपा था, "भुट्टो को प्रधानमंत्री रहते हुए दूसरे बच्चे के बारे में नहीं सोचना चाहिए था.''
उन्होंने कहा था, "बड़े रहनुमाओं से लोग क़ुर्बानी की उम्मीद रखते हैं. पर हमारी प्रधानमंत्री को सब कुछ चाहिए- मातृत्व, घर का सुख, ग्लैमर, ज़िम्मेदारियाँ. ऐसे लोगों को लालची कहा जाता है."
'प्रेग्नेंसी एंड पॉलिटिक्स'
1988 में प्रधानमंत्री बनने से ठीक पहले भी जब बेनज़ीर अपने पहले बच्चे के साथ गर्भवती थीं तो उनकी प्रेग्नेंसी एक तरह का राजनीतिक हथियार बन गई थी.
बीबीसी के लिए लिखे एक लेख 'प्रेग्नेंसी एंड पॉलिटिक्स' में उन्होंने लिखा था, "1977 के बाद ज़िया उल हक़ ने पहली बार पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराने की घोषणा की थी क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि उस दौरान मैं गर्भवती हूँ, और उन्हें लगा था कि एक गर्भवती औरत चुनाव अभियान नहीं चला पाएगी."
"पर मैं ऐसा कर सकती थी, मैंने ऐसा किया, मैं जीती और इस धारणा को ग़लत साबित किया." 1988 में चुनाव से कुछ महीने पहले, बिलावल का प्रीमैच्योर जन्म हुआ और बेनज़ीर प्रधानमंत्री बन गईं.
'जानबूझकर बांझ और शासन के लिए अनफ़िट'
बेशक 30 साल बाद चीज़ें कुछ हद तक बदली हैं. फिर भी फ़ासले बरकरार हैं. पुरुष राजनेताओं को अक्सर उनकी राजनीति के लिए परखा जाता है जबकि महिला राजनेताओं को काम के अलावा अक्सर शादी, बच्चों जैसे मुद्दों पर भी परखा जाता है- फिर वो पद पर रहते हुए माँ बनने की बात हो या फिर इच्छा से माँ न बनने का अधिकार.
'जानबूझकर बांझ और शासन करने के लिए अनफ़िट'- यही वो शब्द थे जो ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े नेता ने 2007 में जूलिया गिलार्ड के लिए इस्तेमाल किए थे. जूलिया बाद में देश की प्रधानमंत्री बनीं.
इशारा इस तरफ़ था कि जूलिया गिलार्ड के बच्चे नहीं थे और इसलिए वो शासन करने लायक नहीं.
'नैपी बदलेंगी तो काम कैसे करेंगी'
पिछले साल ब्रिटेन चुनाव कवर करते हुए मुझे भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला था. संसदीय चुनाव से पहले एक गर्भवती महिला उम्मीदवार के बारे में स्थानीय नेता ने ये कहा था,"वो तो नैपी बदलने में मसरूफ़ होंगी, लोगों की आवाज़ क्या ख़ाक बनेंगी. जो औरत गर्भवती हैं वो कुशल सांसद कैसे बन पाएंगी."
जर्मनी की एंगेला मर्केल हों या भारत की मायावती, महिला नेताओं को शादी न करने या बच्चे न पैदा करने के कारण ताने सुनने पड़े हैं.
2005 में चुनाव प्रचार के दौरान, एंगेला मर्केल के बारे में ये कहा गया था, "मर्केल का जो बायोडाटा है वो देश की ज़्यादातर महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता."
इशारा वही था कि चूँकि वो माँ नहीं हैं इसलिए वो देश और परिवार से जुड़े मसले समझ नहीं सकतीं. जब मायावती मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने जेल में बंद वरुण गांधी को मेनका गांधी से मिलने की इजाज़त नहीं दी थी. इस पर भड़की मेनका ने कहा था, "एक माँ ही मेरी भावना को समझ सकती है."
संसद में स्तनपान
राजनीतिक गलियारों से होते हुए, घर गृहस्थी और बच्चों तक को संभालने की ज़िम्मेदारी जब महिला राजनेता की हो तो सामाजिक और पारिवारिक समर्थन की ज़रूरत पड़ती है.
ब्रिटेन में 2012 में डॉक्टर रोज़ी कैंपबेल और प्रोफ़सर सारा के एक अध्ययन के मुताबिक आम नागरिकों के मुक़ाबले महिला सांसदों के बच्चे न होने के आसार दोगुने हैं.
साथ ही ये भी कि ब्रिटेन में जब महिला सांसद पहली बार संसद में आती हैं तो औसतन उनके बड़े बच्चे की उम्र 16 साल होती है जबकि पुरुष सांसदों के पहले बच्चे की उम्र 12 साल.
यानी युवा महिला सांसदों को राजनीति में ऊपर की पायदान पर पहुँचते-पहुँचते देर हो जाती है. वैसे अब कई देशों में महिला सांसदों के लिए नए प्रावधान लागू किए गए हैं जिससे वो बच्चों की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ संसद का काम-काज भी सहजता से कर सकें.
मसलन ऑस्ट्रेलिया में 2016 में संसदीय सदन के चेंबर में महिला सांसदों को अपने बच्चों को स्तनपान कराने की अनुमति दी गई. 2017 में ऐसा करने वाली लैरिसा वाटर्स पहली ऑस्ट्रेलियाई सांसद बनीं.
राजनीति की कसौटी
भारत इस तरह की बहस से कोसों दूर है. यहाँ तो अभी बहस का मुद्दा यही है कि संसद में महिलाओं की संख्या आज भी कम क्यों है.
बहुत से टीकाकार ये सवाल भी उठाते रहे हैं कि क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक है कि ज़्यादातर महिलाएँ जो सत्ता में आईं वो उस समय शादीशुदा नहीं थी या अकेली थीं- इंदिरा गांधी, ममता बनर्जी, जयललिता, मायावती, शीला दीक्षित, उमा भारती, वंसुधरा राजे.
क्या कभी ऐसा होगा कि जब किसी महिला की राजनीतिक महत्वाकांक्षा या सफलता को इस बात पर नहीं परखा जाएगा कि वो शादीशुदा है, माँ बन चुकी है, या बनने वाली है या बनना ही नहीं चाहती है..
फिलहाल तो दुनिया की नज़रें न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री पर हैं. सोशल मीडिया के दौर में जहाँ हर आह-वाह पर भी नज़र रहती है, ऐसे दौर में माँ बनने वाली वो पहली प्रधानमंत्री होंगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)