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विश्लेषण: जिंदगी सामान्य बनाने के लिए विस्थापित इराक़ी कर रहे फेसबुक का इस्तेमाल
- Author, हसन अबु-हुसैन
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
इराक़ जहां युद्ध और अशांति ने लाखों लोगों को अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर किया, वहां के हज़ारों विस्थापितों ने अपनी परेशानियों से निपटने के लिए फ़ेसबुक का रुख किया है.
ज्यादातर विस्थापित कुर्दिस्तान इलाके में शरण ले रहे हैं जहां अन्य क्षेत्रों से बढ़िया इंटरनेट कनेक्टिविटी है.
इनमें से अधिकांश लोग कथित इस्लामिक स्टेट के जिहादियों से महीनों लड़ने के बाद उनके बर्बाद किए गए शहर मोसुल से यहां आये हैं. इनमें से कुछ लोगों ने अपने साथी विस्थापित इराक़ियों की सहायता करने के लिए उन्होंने फ़ेसबुक पेज और फ़ेसबुक ग्रुप लॉन्च किए.
इन पेजों के ग्रुप एडमिन और यूजर्स ने बीबीसी मॉनिटरिंग को बताया कि यह प्लेटफॉर्म कुर्दिस्तान पहुंचकर अपनी जिंदगी फिर से शुरू करने वाले कई लोगों के जीवन को आसान बनाने में मदद कर रहा है.
विस्थापितों की संख्या
संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय प्रवसन संस्था के अनुसार, जून 2014 से पहले आईएस लड़ाकों के इराक़ के उत्तर और पश्चिम इलाके के बड़े हिस्से पर कब्जा करने के समय आंतरिक विस्थापित वर्ग (आईडीपी) की संख्या साढ़े आठ लाख थी.
लेकिन आईएस लड़ाकों से मोसुल को वापस पाने के लिए जुलाई 2017 तक 10 महीने की लंबी लड़ाई में यह संख्या 33 लाख तक पहुंच गयी.
इनमें से एक तिहाई से अधिक कुर्दिस्तान में रहने लगे. इनमें से साढ़े नौ लाख निनेवे प्रांत के हैं.
फ़ेसबुक समूह
कुर्दिस्तान में विस्थापिथों के लिए बनाये गये इन फ़ेसबुक समूहों से पिछले कुछ सालों में हज़ारों सदस्य जुड़े हैं.
ग्रुप ऑफ़ डिस्प्लेस्ड इन सु (65 हज़ार सदस्य), ग्रुप ऑफ़ डिस्प्लेस्ड इन कुर्दिस्तान दोहुक (27 हज़ार सदस्य) और द डिस्प्लेस्ड इन इराक़ी कुर्दिस्तान ऐंड किर्कुक (46 हज़ार सदस्य) कुछ उदाहरण हैं.
इनके अलावा आईडीपी इन इर्बिल ओन्ली (50 हज़ार सदस्य), डिस्प्लेस्ड स्टूडेंट ऐंड टीचर्स इन कुर्दिस्तान ऐंड किर्कुक (17 हज़ार सदस्य) और इर्बिल ओपन मार्केट (1 लाख चार हज़ार सदस्य) जैसे समूह भी हैं.
उनके लिए फ़ेसबुक खरीदने और बेचने, नौकरी खोजने, सहायता शिपमेंट के आने की घोषणा और स्कूल, प्रशिक्षण एवं पाठ्यक्रमों की जानकारी देने का प्रमुख मंच बन गया है.
कई पेजों पर आईडीपी पेशेवरों के कौशल के विज्ञापन, या ट्रांसपोर्ट की सूचना या घर के बने खाने तक को बेचने में सहायता की जाती है.
एक बहुत ही सक्रिय फ़ेसबुक एडमिन मोहम्मद अल-ओमरानी ने कहा, "इन पेजों ने निश्चित रूप से बड़े स्तर पर विस्थापितों की मदद की है."
आइडिया कैसे आया?
41 वर्षीय सेल्स रिप्रेजेंटेटिव ओमरानी ने कहा कि विस्थापित इराकियों के लिए फ़ेसबुक ग्रुप की शुरुआत उन्होंने ही की थी. अब वो ऐसे छह पेज चला रहे हैं.
यह विचार उन्हें कुर्दिस्तान में आने के दो महीने बाद तब आया जब अन्य आईडीपी लोगों की तरह ही उन्हें यह नहीं पता था कि सहायता या अन्य सेवाओं तक कैसे पहुंचा जाये.
लेकिन समस्या यह थी कि लोगों को इसके विषय में कैसे बताया जाये और उन्हें कैसे इस ग्रुप में शामिल किया जाये.
उन्होंने कहा, "मेरे लिये सबसे मुश्किल काम विस्थापितों में से लोगों को इस फ़ेसबुक पेज की ओर आकर्षित करना था."
फ़ेसबुक पेज से मिली बहुत मदद
तब उन्हें यह विचार आया कि विस्थापन और प्रवासन मंत्रालय के यूजर्स को फ़ेसबुक पेज पर लाया जाये, जिससे कि हज़ारों की संख्या में लोग सहायता, पंजीकरण और अन्य सेवाओं के बारे में जानने पहुंचते हैं.
उन्होंने इन्विटेशन भेजना शुरू किया. छह महीने में ही कुछ हज़ार लोगों ने ज्वाइन कर लिया. एक साल बाद, यह संख्या 25 हज़ार हो गयी. अब वो ऐसे छह फ़ेसबुक पेज चला रहे हैं.
कुर्दिस्तान के एक शोधकर्ता ज़हरा अल-कोबानी कहते हैं कि जब वो कुर्दिस्तान पहुंचे तो उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था, लेकिन फ़ेसबुक ग्रुप ने वास्तव में हमें कई लाभ पहुंचाए, खासकर सेवाओं की खोज के संबंध में.
36 वर्षीय टैक्सी चालक अहमद ज़ोहैरी इस ग्रुप का इस्तेमाल इर्बिल और दोहुक के बीच यात्रियों को लाने ले जाने की अपनी सेवा के विज्ञापन के लिए करते हैं. वो कहते हैं, "जो लोग इस ग्रुप को बनाने के लिए ज़िम्मेदार हैं, मैं उनका बहुत आभारी हूं."
जोहरी कहते हैं, "दोनों शहरों के बीच यात्रा में दो घंटे का वक्त लगता है, इसलिए कीमतों पर पहले ही सहमति पा लेना ज़रूरी है."
घर का पका खाना
इन ग्रुप्स में प्रमुख रूप से घर के पके खाने को बेचने की पहल की गयी.
चार बच्चों की मां 45 वर्षीय राइक़ा अल मयदीदी ने बीबीसी मॉनिटरिंग को बताया कि इस तरह के फ़ेसबुक पेज से उन्हें कैसे मदद मिली, खासकर तब जब उनके आर्किटेक्ट पति बीमार और बेरोज़गार थे.
उन्होंने कहा, "हमारी स्थिति बहुत ख़राब थी. हम एक निर्माणाधीन इमारत में 4 लाख दीनार (करीब 22750 रुपये) प्रति माह के किराये पर रहते थे, ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मुझे अपने गहने बेचने पड़े."
लेकिन फ़ेसबुक ने उन्हें काम ढूंढने में मदद की, आज हम घर का खाना ऑनलाइन बेचते हैं जिसे मेरे पड़ोस का ड्राइवर ग्राहकों तक पहुंचाता है.
राइक़ा कहती हैं, "इस नयी नौकरी से परिवार को अच्छी आय हो रही है. भगवान का शुक्र है, हमारी जिंदगी में काफी बदलाव हो गया."
ओम इवान के संघर्ष की कहानी
आईएस संकट के दौरान केवल मोसुल से विस्थापित हुए लोगों को फ़ेसबुक से मदद नहीं मिली है.
एक युवा ईसाई महिला ओम इवान (इवान की मां) ने बीबीसी मॉनिटरिंग को बताया कि उन्हें और उनके परिवार को अज्ञात चरमपंथियों से मिली धमकी के बाद कैसे 2007 में वो मोसुल से कुर्दिस्तान के लिए निकली थीं.
वो माध्यमिक विद्यालय के अंतिम वर्ष में थीं, जब उनके माता-पिता और तीन बच्चों को इरबिल जाना पड़ा.
शुरुआत में, हम महंगे किराये वाले एक कमरे के मकान में रहे. उसका किराया करीब 19,500 रुपये (300 अमरीकी डॉलर) प्रति माह था.
लेकिन जीव विज्ञान में कुर्दिश विश्वविद्यालय से स्नातक के बाद भी ओम इवान को नौकरी नहीं मिली.
मोसुल लौटना नहीं चाहते
अब वो शादी कर चुकी हैं और उनका दो साल का बेटा है, लेकिन अब भी पति की मदद करने के लिए उन्हें नौकरी नहीं मिली. पति की कमाई उनकी जरूरतों के लिए नाकाफी हैं.
"मैंने पाया कि बहुत से लोग फ़ेसबुक समूहों के जरिये अपने सामान बेचने, खरीदने और उसका प्रचार करने का काम करते हैं. मुझे लगा कि क्यूं न मैं भी एक कोशिश करूं फ़ेसबुक पर खाना बेचने की? मुझे पेस्ट्री और डेजर्ट बनाना पसंद है. इसलिए मैंने ऐसा किया और लोगों को मेरे भोजन पसंद भी आये. भगवान का शुक्र है!"
वो इसके नतीजे से खुश हैं, भले ही मुश्किल आर्थिक माहौल की वजह से हमेशा बहुत मांग नहीं रहती, लेकिन उन्हें ऐसा तो लगता ही है कि वो अपने पति की मदद कर रही हैं.
मोसुल के लगभग 70 फ़ीसदी बुनियादी ढांचे आईएस के ख़िलाफ़ लड़ाई में नष्ट हो गये और जिन चार लोगों से फ़ेसबुक के जरिये बीबीसी ने संपर्क किया वो वहां वापस लौटने के इच्छुक नहीं है, कम से कम अभी तो बिल्कुल भी नहीं.
(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की ख़बरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.)