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बाढ़ पीड़ितों के लिए काल बना भारत-चीन विवाद
- Author, नवीन सिंह खड़का
- पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी
"नदी ने मुझे पांच बार अपना घर छोड़ने पर मजबूर किया है," बिमती हजारिका कहती हैं. ये कहते हुए भारत के उत्तर पूर्वी राज्य असम की रहने वाली वो ब्रह्मपुत्र नदी की ओर इशारा करती हैं.
60 साल की बिमती कहती हैं, "ये पानी देख रहे हैं. इसके नीचे वो वहां मेरे पहले के चार गांव हैं."
चार बार बाढ़ के कारण अपने चार घर छोड़ चुकीं बिमती अब एक तंबु के जैसे घर में रहती हैं जिसे बांस के सहारे खड़ा किया गया है. लेकिन एक बार फिर उन्हें चिंता है क्योंकि उनका ये घर अब ख़तरे में है.
वो कहती हैं, "अगर फिर बार आई तो मुझे नहीं पती कि मैं कहां जाऊंगी."
बीबीसी ने इस इलाके में कई गांवों का दौरा किया जहां लगभग सभी गांवों में ऐसी ही कहानियां देखने को मिलीं. गांव के बड़े बूढ़े नदी की तरफ इशारा कर के वो जगह दिखाने लगे जहां कभी उनका गांव हुआ करता था. अब वो कई बाढ़ के कारण कई बार विस्थापित हो चुके हैं.
असम में बाढ़ का डर बढ़ रहा है. आरोप लगाए जा रहे हैं कि चीन से असम की ओर बहती ब्रह्मपुत्र से जुड़ी ज़रूरी जानकारी छिपा रहा है जिस कारण बाढ़ के बारे में चेतावनी जारी करने में मुश्किलें पेश आ रही हैं.
ये जानकारी नदी के बहने, उसकी दिशा, पानी की क्वॉलिटी और नदी में पानी के लेवल से जुड़ी है जो बाढ़ की स्थिति में नदी के निचले इलाकों में चेतावनी जारी करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
धनसिरीमुख गांव के रहने वाले संजीव डोले कहते हैं, "हमें मीडिया से चीन के इस फ़ैसले के बारे में पता चला और तब से हमारी चिंता और बढ़ गई है."
वो कहते हैं कि अब तक हम लोग हमेशा बाढ़ की तैयारी करते थे और गांव खाली करने की सूरत में भी पहले से ही तैयार होते थे. वो कहते हैं, "सोचिए अब जब चीन से हमें जानकारी नहीं मिलेगी तो हम इसके लिए खुद कैसे तैयार हो पाएंगे. हमारे कोई भी गांव अब सुरक्षित नहीं रहंगे."
एशिया में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलती है जो चीन का स्वायत्त क्षेत्र है. ये नदी यहां से निकल कर भारत की और बहती और आगे बांग्लादेश से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है.
ब्रह्मपुत्र नदी में आने वाली बाढ़ हर साल असम में तबाही मचाती है और हज़ारों लोगों को उनके घरों से बेघर करती है. इस साल आई बाढ़ के कारण रज्य में करीब 300 जानें गई हैं.
भारत और चीन के बीच हुए एक द्वीपक्षीय समझौते के तहत मॉनसून के दौरान यानी 15 मई से ले कर 15 अक्तूबर तक चीन को ब्रह्मपुत्र नदी के संबंध में ज़रूरी जानकारी भारत के साथ साझा करनी होती है.
लेकिन इसी साल अगस्त में भारतीय अधिकरियों ने बताया था कि उन्हें इस साल के लिए चीन की तरफ से कोई जानकारी नहीं मिली है.
इससे पहले हाल में भारत और चीन की सेना एक हिमालयी पठार डोकलाम में संगीन चढ़ाए आमने-सामने खड़ी थीं. ये तनाव दो महीने से भी अधिक वक्त तक जारी रहा.
इसके बाद सितंबर में चीनी अधिकारियों ने कहा था कि उनके पास उस समय साझा करने के लिए कोई डेटा नहीं था क्योंकि उनके डेटा रिकॉर्ड करने वाले उनके जल विज्ञान स्टेशनों में अपडेशन का काम चल रहा है. इस मुद्दे पर चीन की तरफ से जो आख़िरी बयान आया था वो यही था.
लेकिन बीबीसी ने यह पाया कि इस बयान के बावजूद, ब्रह्मपुत्र बेसिन में सबसे कम बहाव वाले देश बांग्लादेश के साथ चीन नदी से संबंधित डेटा साझा कर रहा था.
बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री अनिसुल इस्लाम मोहम्मद ने सितंबर में बीबीसी को बताया था कि उनके देश को चीन से नदी से संबंध में ज़रूरी जानकरी मिल रही है.
इस मुद्दे पर ताज़ा जानकारी के लिए बीबीसी ने चीनी अधिकारियों से संपर्क किया लेकिन उनकी तरफ से अब तक कोई टिप्पणी नहीं मिली है. अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि चीन भारत के साथ ये जानकारी साझा करना जारी रखेगा भी या नहीं.
असम में स्थानीय लोगों ने बीबीसी को बताया कि जब चीन भारत के साथ जानकारी साझा कर रहा था तब भी बाढ़ ही विनाशकरी और भयानक थी, लेकिन अब जब उन्हें इस बात की जानकारी है कि भारतीय अधिकारियों के पास नदी के बारे में कोई जानकारी नहीं है, तो इस कारण उनका डर उन्हें पहले से ही बाढ़ के लिए तैयार रहने में मदद करेगा.
'सेव ब्रह्मपुत्र' अभियान का नेतृत्व कर रहे और असम विधानसभा के सदस्य अशोक सिंघल कहते हैं, "चीन ने कभी इस बारे में खुल कर नहीं बताया कि को ब्रह्मपुत्र नदी पर क्या कर रहा है."
वो कहते हैं, "मैंने कई बार तिब्बत में जा कर नदी के मुहाने पर जाने की परमिशन की गुज़रिश की लेकिन चीन ने कभी भी मुझे इसकी इजाज़त नहीं दी."
चीनी सरकार ने ब्रह्मपुत्र नदी पर कई हाइड्रोापवर डैम बनाए हैं जिन्हें तिब्बत में यारलुंग ज़ांगबो कहा जाता है.
लेकिन चीन का कहना है कि ना तो ब्रह्मपुत्र नदी का रास्ता रोकता है ना ही उसका रास्ता कहीं पर मोड़ता है. चीन का दावा है कि वो ऐसा कुछ नहीं करेगा जिसके नदी के निचले हिस्से में बसने वाले भारत या बंग्लादेश को किसी तरह का नुक़सान पहुंचे.
लेकिन असम में अधिकारियों का कहना है कि उनके पास चिंता करने की काफी वजहें हैं. उनके अनुसार इस साल मई के बाद से बाढ़ बार-बार आ रही है. इसी महीने के बाद से चीन ने नदी के बारे में जानकारी नहीं दी है.
राज्य के वित्त और स्वास्थ्य मंत्री हेमंत शर्मा ने बीबीसी को बताया, "पहले मॉनसून के दौरान दो या तीन बार ही बाढ़ आती थी लेकिन इस बार तो मामला ही अलग है. इस बार तीन-चीर बार बाढ़ आई जबकि नदी के ऊपरी इलाके में बारिश हुई ही नहीं थी."
वो कहते हैं, "इन सब बातों को आपको डोकलाम विवाद से हट कर नहीं देख सकते."
इसी साल अगस्त में भारत और चीन के बीच कई महीनों से डोकलाम में चल रहे विवाद को हल करने की दिशा में अहम सहमति बनी थी. सीमा विवाद के कारण दोनों देश 1962 में युद्ध के मैदान में भी आमने-सामने खड़े हो चुके हैं, लेकिन अभी भी सीमा पर मौजूद कुछ इलाकों को लेकर विवाद है जो कभी-कभी तनाव की वजह बनता है.
गुवाहाटी विश्वविद्यालय में भूगर्भ विशेषज्ञ प्रोफेसर बीपी बोहरा कहते हैं, "वैज्ञानिकों, राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई है."
नदी के निचले इलाके में स्थित बांग्लादेश भारत पर आरोप लगाता रहा है कि वो उसकी चिंताओं को दरकिनार करता रहा है.
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