रॉबर्ट मुगाबे के 'तख़्तापलट' से पहले चीन क्यों गए ज़िम्बाब्वे के सेना प्रमुख चिवेंगा?

General Li Zuocheng, of China, and General Constantine Guveya Chiwenga, of Zimbabwe
इमेज कैप्शन, चीन के दौरे पर जनरल चिवेंगा
    • Author, डॉक्टर एलेक्स वाइन्स
    • पदनाम, बीबीसी के लिए

ज़िम्बाब्वे के सेनाध्यक्ष कोंस्टेनटिनो चिवेंगा 'तख़्तापलट' से कुछ ही दिन पहले चीन गए थे. इसके महज़ संयोग होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं. ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि दोनों देशों के बीच कैसे और कितने गहरे रिश्ते हैं.

बीजिंग ने सेनाध्यक्ष चिवेंगा के दौरे को सामान्य सैन्य दौरा बताया है, लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इसे तख़्तापलट से जोड़कर देख रहे हैं.

इन ख़बरों को तब और बल मिला जब चीन ने तख़्तापलट की निंदा नहीं की.

तख़्तापलट की ख़बर अख़बारों में

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गहरे व्यापारिक रिश्ते

चीन और ज़िम्बाब्वे के बीच मज़बूत दोतरफ़ा व्यापारिक संबंध हैं.

एक तरफ़ चीन ने ज़िम्बाब्वे में कृषि से लेकर निर्माण कार्यों तक बहुत से कामों में अरबों का निवेश कर रखा है तो दूसरी तरफ़ ज़िम्बाब्वे में बनने वाले सामानों के लिए चीन बड़ा बाज़ार है.

दोनों देशों के रिश्ते रोडेशियन बुश युद्ध के समय से चले आ रहे हैं.

शी जिनपिंग

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चीन ने दिए लड़ाके, हथियार और ट्रेनिंग

1979 में जब रॉबर्ट मुगाबे को सोवियत का साथ नहीं मिला तो उन्होंने चीन का रुख किया जिसने गुरिल्ला लड़ाके, हथियार और ट्रेनिंग देकर मुगाबे की मदद की.

1980 में ज़िम्बाब्वे के आज़ाद होने के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की शुरुआत हुई और मुगाबे ने अगले साल बतौर प्रधानमंत्री बीजिंग का दौरा किया.

तब से मुगाबे ऐसे बहुत से दौरे कर चुके हैं.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ रॉबर्ट मुगाबे (फ़ाइल फोटो)

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पूर्व की तरफ़ मुंह और पश्चिम की तरफ़ पीठ

ज़िम्बाब्वे अर्से से चीन की पूर्व से जुड़ी नीति का समर्थन करता रहा है.

एक दशक पहले हरारे में एक खचाखच भरी रैली में बोलते हुए मुगाबे ने कहा था, ''हमने अपना मुंह पूरब की तरफ़ कर लिया है जहां से सूरज निकलता है और पीठ पश्चिम की तरफ़ कर ली है जहां सूरज छिपता है.''

इस दौरान दोनों देशों के सैन्य संबंध मज़बूत हुए. होंगडू जेएल-8 जेट एयरक्राफ़्ट, जेएफ़-17 थंडर फ़ाइटर एयरक्राफ़्ट, वाहन, रडार और हथियारों की ख़रीद-फ़रोख़्त की गई.

हालांकि 2008 में हथियारों के एक सौदे पर हुए विवाद के बाद बीजिंग ने ज़िम्बाब्वे का रक्षा सौदों के लिए स्तर 'सीमित' कर दिया.

ज़िम्बाब्वे टैंक

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वापस पश्चिम से मांगी मदद

ज़िम्बाब्वे को उम्मीद थी कि चीन की नीति का समर्थन करके वह बाक़ी देशों को ज़िम्बाब्वे में निवेश के लिए लुभा सकेगा, लेकिन भरपूर कोशिश के बावजूद उसे उम्मीद के मुताबिक़ निवेश नहीं मिला.

हारकर एक दशक बाद अगस्त 2015 में मुगाबे ने पश्चिमी देशों को दोबारा ज़िम्बाब्वे में दिलचस्पी लेने की सलाह दी.

रॉबर्ट मुगाबे

चीन और ब्रिटेन की बढ़ती पैठ

अब हालात ये हैं कि चीन और पश्चिमी देश जैसे ब्रिटेन कई मसलों पर एक जैसी राय रखने लगे हैं.

हरारे के बाहरी इलाक़े में आस-पास बने ब्रिटिश और चीनी दूतावास ज़िम्बाब्वे के दो बड़े दूतावास माने जाते हैं.

ज़िम्बाब्वे में इस दौरान बहुत से देशों के दूतावास छोटे हुए या बंद हो गए, लेकिन चीनी दूतावास का हमेशा विस्तार होता रहा.

ब्रिटिश राजनयिक और अधिकारी ज़िम्बाब्वे के व्यापार, समाज और विपक्ष में अच्छी पैठ रखते हैं तो चीन का मुगाबे की पार्टी ज़ानू-पीएफ़, रक्षा मामलों और राष्ट्रपति से जुड़े तकनीकी मामलों में ख़ासा दखल है.

मुगाबे और सेनाध्यक्ष

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कर्ज़ चाहिए तो हालात सुधारो

ज़िम्बाब्वे में मौजूद चीनी अधिकारी देश के बारे में अच्छी समझ रखते हैं और राजनीतिक स्थिरता, निवेश के बेहतर माहौल और क़ानून व्यवस्था को लेकर चिंता जता चुके हैं. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2015 में ज़िम्बाब्वे का दौरा किया, वहीं राष्ट्रपति मुगाबे इसी साल जनवरी में बीजिंग गए.

राष्ट्रपति जिनपिंग ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उनका देश अच्छी कंपनियों को ज़िम्बाब्वे में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहता है.

लेकिन जिनपिंग ने निजी बैठक में ज़िम्बाब्वे को ताकीद की कि उसे तब तक और कर्ज़ नहीं दिया जाएगा जब तक वह अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर नहीं ले आता.

शी जिनपिंग

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निवेश से क्यों कतरा रही हैं कंपनियां

चीन अब तक ज़िम्बाब्वे से आने वाले तंबाकू का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, लेकिन चीन की कंपनियों को ज़िम्बाब्वे में निवेश करना एक बड़ी चुनौती लगता है. मिसाल के तौर पर, हीरे के कारोबार को ज़िम्बाब्वे में भारी नुकसान उठाना पड़ा, जिसके बाद चीनी कंपनियां नए बाज़ारों में ज़्यादा दिलचस्पी ले रही हैं.

कुछ हफ़्ते पहले मैं एक बैठक के सिलसिले में चीन गया. चीन और अफ़्रीका के रिश्तों पर हुई इस बैठक में एक बार भी ज़िम्बाब्वे का ज़िक्र नहीं हुआ.

ज़िम्बाब्वे के बजाय बीजिंग को अब इथियोपिया, सूडान, अंगोला, नाइजीरिया, केन्या और दक्षिण अफ़्रीका के बाज़ारों में ज़्यादा दिलचस्पी है.

सभी को ज़िम्बाब्वे में राजनीतिक स्थिरता का इंतज़ार है जिससे निवेश का माहौल बनाया जा सके.

'देश में बातचीत के ज़रिए सत्ता परिवर्तन हो और फिर चुनाव के ज़रिए एक वैध सरकार बनाई जाए तभी एशिया, अमरीका और यूरोप की कंपनियां ज़िम्बाब्वे में निवेश करने के बारे में सोचेंगी.'

यह वह संदेश है जो जनवरी में बीजिंग यात्रा के दौरान रॉबर्ट मुगाबे को और कुछ दिन पहले सेनाध्यक्ष को दिया गया था.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

(डॉक्टर एलेक्स वाइन्स OBE लंदन के चैथम हाउस के अफ़्रीका कार्यक्रम के अध्यक्ष और कॉवेन्ट्री विश्वविद्यालय में लेक्चरर हैं.)

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