'गुप्त बातें' कैसे करते हैं उत्तर कोरिया-अमरीका?

    • Author, जी अब्बे ली
    • पदनाम, वाशिंगटन से, बीबीसी कोरियाई सेवा

उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच तनाव कायम है. दोनों मुल्कों के बीच आधिकारिक बातचीत नहीं हो रही है.

हालांकि अमरीका और उत्तर कोरिया अनौपचारिक बातचीत अब भी कर रहे हैं. ऐसे में सवाल ये है कि जब खुले मंचों से ये दोनों मुल्क एक-दूसरे के लिए तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. तब पर्दे के पीछे दोनों मुल्कों की अनौपचारिक बातचीत कैसे होती है?

इसे जानने के लिए कुछ साल पीछे चलते हैं. साल 2013 के सितंबर की 25 तारीख़, जगह जर्मनी की राजधानी बर्लिन.

उत्तर कोरिया और अमरीका के उच्च स्तरीय अधिकारियों के बीच एक बड़े होटल के रेस्त्रां में मुलाकात होती है. ये बातचीत काफ़ी छोटी होती है, जिसमें ये अधिकारी एक-दूसरे से परिवार के हालचाल भी लेते हैं.

बैठक में कौन हु शामिल?

इस बैठक में शामिल होने वाले दोनों तरफ़ के अधिकारी जानी-मानी हस्तियां थे. होटल के बाहर तगड़ी सुरक्षा थी. जिस रेस्त्रां में ये बैठक हुई, वो ऐसी जगह पर था जहां ये बिल्डिंग के बाहर से नज़र नहीं आता था.

इस बातचीत की शुरुआत लजीज़ डिनर से होती है. जिसके बाद दिन में दोनों तरफ़ के लोगों के बीच बातचीत होती है. इस बैठक में उत्तर कोरिया के प्रतिनिधि अपनी सरकार के नज़रिए को समझाने पर अड़े हुए थे. वहीं अमरीकी प्रतिनिधि इस बातचीत से उत्तर कोरिया को लेकर अपनी उलझनों को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे.

राजनयिक गठबंधन न होने के चलते अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच सूचना के प्रवाह को लेकर कई अड़चनें हैं. ये समस्या इतनी बड़ी है कि उत्तर कोरिया अमरीका के लिए चुनौती बन गया है.

दशकों से हो रही हैं ये मुलाकातें

बर्लिन में हुई बैठक अनौपचारिक बातचीत का सिर्फ एक उदाहरण है. दशकों से दोनों मुल्कों के बीच ऐसी ही मुलाकातें हो रही हैं.

जेनेवा, लंदन और कुआला लंपूर में बीते वक्त में दोनों मुल्कों के बीच ऐसी कई मुलाकातें हो चुकी हैं. इन बैठकों को ट्रैक 1.5 कहा जा सकता है.

इसे यूं समझिए कि इसमें उत्तर कोरियाई सरकार के अधिकारी शामिल होते हैं तो प्योंगयांग के नज़रिए से कहें तो ये ट्रैक 1 हुआ. लेकिन अमरीका बातचीत के लिए शिक्षाविदों और पूर्व अधिकारियों का भी इस्तेमाल कर रहा है, जिससे ये ट्रैक 2 बन जाता है. ट्रैक 1 और ट्रैक 2 के बीच दोनों मुल्क ट्रैक 1.5 पर बात करते हैं.

बीते कुछ महीनों में अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच दुश्मनी बढ़ी है. कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव बढ़ने के चलते दोनों मुल्कों के बीच अनौपचारिक बातचीत की फिर से होने की ज़रूरत बढ़ी है.

अब उत्तर कोरिया, अमरीका की बातचीत कब?

जानकारों का मानना है कि पर्दे के पीछे से की ये बातचीतें संकट को ख़त्म करने की तरफ अच्छी कोशिश हो सकती है. सभी निगाहें अगले दौर की अनौपचारिक बातचीत पर है. ये बैठक इस हफ्ते मॉस्को में एक जगह पर होनी है.

इस बातचीत में उत्तर कोरिया की तरफ से मौजूदा अधिकारी और अमरीका की तरफ से अकेडमिक एक्सपर्ट और पूर्व अधिकारी शामिल होंगे.

अमरीका की तरफ से बैठक में पूर्व सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फोर पॉलिटिकल अफेयर्स वेंडी शेरमान, परमाणु वैज्ञानिक सिगफ्राइड हेकर और उत्तरी अमरीका मामलों के लिए उत्तर कोरिया के डायरेक्टर जनरल चोई सुन ही शामिल हो सकते हैं.

परमाणु संकट बातचीत के ज़रिए कैसे होगा कम?

इस वक्त एक सवाल ये भी है कि क्या इस साल संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में बातचीत के ज़रिए दोनों मुल्कों के बीच विरोधी भावना कम होगी?

लंबे वक्त से ऐसे बातचीतों का हिस्सा रहे अमरीकी प्रतिनिधियों ने बीबीसी को बताया कि इस मुद्दे पर वो अलग तरह से सोचते हैं. सच तो ये है कि प्योंग्यांग वॉशिंगटन एक्सपर्ट्स के सामने नरम नज़र आते हैं.

कार्नेगी एंडॉमेंट फोर इंटरनेशनल पीस के साथ फिलहाल जुड़े डगलस पाल बतौर नागरिक उत्तर कोरिया के अधिकारियों से अपनी बातचीत को याद करते हैं.

'कई बार उत्तर कोरिया का रवैया धमकाने जैसा'

पाल 1994 में उत्तर कोरिया के अधिकारियों से वॉशिंगटन में मिले थे. वो तब नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के डायरेक्टर पद से रिटायर हुए ही थे. पाल तब प्योंगयांग के किए धमकाने भरे रवैये को गलत ठहराते हैं.

वो कहते हैं, ''जब उन्होंने मुझे अपने देश आने के लिए दबाव डाला. मैंने कहा कि मैं यहां बैठकर आपको मुझे और मेरे मुल्क को धमकाने का मौका नहीं दूंगा. और ये कहकर मैं उस बैठक से चला गया. मेरा मानना है कि हाल के दिनों में उत्तर कोरिया का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम काफी तेजी से बढ़ा है. ऐसे में उत्तर कोरिया से बातचीत अब एक नए स्तर पर होगी.''

कुछ वक्त पहले तक ये माना जाता था कि उत्तर कोरिया के पास मिसाइल के ज़रिए परमाणु हमला करने की क्षमता नहीं है. लेकिन अमरीकी खुफिया अधिकारियों के हवाले से ताजा मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उत्तर कोरिया ने 2017 में ये क्षमता विकसित कर ली है.

पाल की ही तरह अमरीका के कई पूर्व अधिकारी उत्तर कोरिया संग की गई अनौपचारिक बैठकों का हिस्सा रहे हैं. लंबे वक्त तक ऐसे ही एक प्रतिनिधि जॉल विट कहते हैं, ''मैं पहली बार जब उत्तर कोरिया के साथ ऐसी बैठकों में शामिल हुआ था, मुझे वो वक्त याद नहीं है.''

गुप्त मुलाकातें:कब, कब और कैसे?

इस साल उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच ऐसी तीन मुलाकातें हो चुकी हैं. पहली मुलाकात जनवरी में तब हुई थी, जब ट्रंप प्रशासन की शुरुआत हुई थी.

पाल कहते हैं, ''मुझे लगता है कि उत्तर कोरियाई डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुनाव से पहले प्रचार में कही गई बातों से चिंतित थे. जिसमें ट्रंप ने उत्तर कोरिया के परमाणु मसले को सुलझाने को लेकर कई बातें कही थीं.''

दूसरी मुलाकात मई महीने में हुई. ये बैठक अमरीका और दक्षिण कोरियाई सैनिकों की जॉइंट एक्सरसाइज के बाद हुई थी. प्योंगयांग ने इस एक्सरसाइज को अपने देश में आक्रमण की तैयारी माना.

अगली बैठक अगस्त महीने में हुई. इससे पहले भी एक मिलिट्री ने साथ में प्रैक्टिस की थी.

बातचीत से मिलेगी सफलता?

ऐसी बातचीतों के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ये बेहद ज़रूरी है कि ऐसी बातचीतें होती रहें ताकि अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच कोई और देश न आ सके. उनका मानना है कि ऐसी बैठकों से एक ऐसा माहौल बनेगा, जिससे अलग-अलग विचारों पर बात की जा सकेगी.

विट कहते हैं, ये ज़रूरी है क्योंकि लोगों को लगता है कि वो जो सोच रहे हैं, उसे कह सकते हैं. उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच ऐसी गुप्त मुलाकातें होती रहेंगी.

हालांकि इस महीने दक्षिण कोरिया की कंर्जेंवेटिव बरेयूं पार्टी के सांसद चोंग ब्योंग गुग ने कहा था, उत्तर कोरिया के छठे परमाणु परीक्षण के बाद अमरीका ने ऐसी अनौपचारिक बैठकें ख़त्म करने का फ़ैसला किया है.

ये बयान चोंग के इस महीने की शुरुआत में अमरीकी समकक्षों से मिलने के बाद आया.

अमरीका का ताज़ा रुख क्या है?

लेकिन अब तक दोनों मुल्कों की तरफ से ऐसी बातचीतों का हिस्सा रहे जानकार इससे इंकार करते हैं.

अमरीका के गृह मंत्रालय की प्रवक्ता हेथर नौरेट ने बीबीसी को ईमेल के ज़रिए बताया, ''अमरीकी राजनयिकों के पास ऐसे कई रास्ते हैं, जिनकी मदद से हम उत्तर कोरियाई सरकार से बात कर सकते हैं.

वो लिखती हैं, ''उत्तर कोरियाई अधिकारियों की तरफ से ऐसी कोई रुचि नहीं जान पड़ती है, जिससे लगे कि वो लोग परमाणु मुक्त होने के संदर्भ में बातचीत करना चाहते हैं.''

कई अमरीकी एक्सपर्ट मानते हैं कि वॉशिंगटन और प्योंगयांग कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत कुछ वक्त लेगी.

अमरीका जहां उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगाए जाने का इंतज़ार कर रहा है. वहीं उत्तर कोरिया अपनी परमाणु शक्ति को विकसित करने पर ध्यान दे रहा है.

ऐसे वक्त में दुनिया के सबसे ताकतवर इन मुल्कों के बीच गुप्त बातचीत ही समस्या सुलझाने का सबसे सही रास्ता है.

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