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भारतीय डिश बनी चाओ जो भारत में नहीं मिलती
- Author, ताउराय माडुना
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
दक्षिण अफ्रीका में डरबन की कोस्टल सिटी में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं. यहां पर 'बनी चाओ' नाम से एक अनूठी डिश भी मिलती है.
भारत के बाहर दक्षिण अफ्रीका में सबसे ज्यादा संख्या में भारतीय समुदाय के लोग रहते हैं. भारतीय प्रवासी पहली बार दक्षिण अफ्रीका में चीनी मिलों में काम करने के लिए गिरमिटिया मजदूर के तौर पर आए थे.
शेफ़ शनल रामरूप कहती हैं, ''बनी चाओ ब्रेड का एक टुकड़ा है जिसमें तरी डाली जाती है. यहां तक कि भारत में भी आपको 'बनी चाओ' कहीं नहीं मिलेगा. यह हमारा है.''
शनल बताती हैं कि लोग इसे 'बनी चाओ' कहते हैं लेकिन इसका खरगोश से कोई लेना-देना नहीं है. ये मटन है, ये शीप है. मुझे इसके ऊपर का हिस्सा सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है. इसे भारत के पारंपरिक सलाद गाजर के साथ परोसा जाता है.
कैसे पड़ा नाम
इसमें ब्रेड के ऊपर के कुछ हिस्से को निकालकर उसमें तरी डाली जाती है. मिलों में काम करने वाले मजदूरों के लिए ब्रेड बाउल ले जाना काफ़ी आसान होता है. इसलिए यह डरबन में स्ट्रीट फूड के तौर पर लोकप्रिय हुआ है.
लेखक ज़ुलेखा मायत कहती हैं, ''जब मैं 1947 में डरबन आई थी, 'बनी चाओ' यहां पहले से मिलता था. भारत के करोबारी समुदाय को बनिया कहा जाता है. पूरे यकीन के साथ तो नहीं पर मुझे लगता है कि 'बनी चाओ' शब्द बनिया से बना है. इसकी कुछ और वजह भी बताई जाती हैं. हो सकता है कि वो लोग सही हों और मैं ग़लत.''
शनल ने बताया कि असल में 'बनी चाओ' एक शाकाहारी डिश है क्योंकि बनिया आम तौर शाकाहारी होते हैं. इसलिए 'बनी चाओ' में शाकाहारी तरी के साथ बनाया जाता था.
कैसे खाया जाता है बनी चाओ
प्रेगी नायडू कहते हैं कि वह हाथ से 'बनी चाओ' खाते हैं. शनल कहती हैं कि हाथ से खाने की वजह यह है कि 'बनी चाओ' का ब्रेड उसमें तरी को सोख लेता है. अगर आप कांटे या चाकू से इसे खाते हैं तो आप पूरी तरह से तरी नहीं खा पाते.
वहीं, कुछ लोग कहते हैं कि यह किसी की मर्जी है कि वो 'बनी चाओ' कैसे खाता है. इसे कांटे और चम्मच से भी खाया जा सकता है.
जिस बनी चाओ को भारतीय बहुत चाव से खाते हैं वो भारत में नहीं मिलती. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)