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स्पेन ने कैटेलोनिया को दिया पांच दिनों का वक़्त
स्पेन के प्रधानमंत्री मारियानो रखोई ने कैटेलोनिया प्रशासन के नेताओं को पांच दिनों का वक़्त दिया है कि वे आधिकारिक रूप से बताएं कि क्या कैटेलोनिया को स्पेन से अलग स्वतंत्र देश घोषित कर दिया गया है.
अगर जवाब में स्वतंत्र देश घोषित करने की पुष्टि की जाती है या फिर कोई जवाब नहीं दिया जाता है तो अगले गुरुवार को स्पेन की तरफ़ से घोषणा रद्द करने के लिए एक अल्टीमेटम दिया जाएगा.
अगर कैटेलोनिया के नेता ऐसा करने में नाकाम रहते हैं तो स्पेन संविधान में कैटेलोनिया पर सीधे शासन के प्रावधान को बहाल कर सकता है.
कैटलन संसद में आज़ादी समर्थक स्पीकर करमा फोरकदेल ने स्पेन को ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी है. उन्होंने कहा कि स्पेन अगर ऐसा करता है तो बड़ी संख्या में लोग अपनी सरकार का बचाव करने सड़क पर उतरेंगे.
कैटेलोनिया के नेताओं ने मंगलवार को अपनी आज़ादी की घोषणा को टाल दिया था. कैटेलोनिया के राष्ट्रपति कार्लस पुजिमोंट ने स्थानीय संसद को संबोधित कर कहा था कि वो आज़ाद कैटेलोनिया के पक्ष में मिले जनमत संग्रह का पालन करेंगे लेकिन समस्या के समाधान के लिए पहले स्पेन से बातचीत की ज़रूरत है.
'भ्रांति फैला रहे हैं कैटेलोनिया के नेता'
मारियानो ने कैटेलोनिया के राष्ट्रपति कार्लस पुजिमोंट पर जानबूझकर भ्रांति फैलाने का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा, ''सरकार वो सभी ज़रूरी क़दम उठाएगी जो संविधान के अनुच्छेद 155 के अंतर्गत उठा सकती है- जिससे देश के नागरिकों के बीच उनकी सुरक्षा और स्पष्ट रूप से जुड़े सभी सवालों का जवाब दिया जा सके.''
मारियानो बुधवार को हुई कैबिनेट की आपातकालीन बैठक के बाद बोल रहे थे, इस बैठक में सरकार के आगामी कदमों के संबंध में चर्चा हुई.
इससे पहले मारियानो ने संसद में कहा था कि स्पेन अपने 40 साल पुराने लोकतंत्र में पहली बार इतनी गंभीर समस्या का सामना कर रहा है.
कैटेलोनिया में हुआ था जनमत संग्रह
एक अक्टूबर को कैटेलोनिया को अलग राष्ट्र बनाने के लिए जनमत संग्रह करवाया गया था जिसे स्पेन की संवैधानिक अदालत ने अवैध घोषित कर दिया था.
कैटेलोनिया के अधिकारियों के अनुसार इस जनमत संग्रह में 43 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था, जिसमें से 90 प्रतिशत मत कैटेलोनिया की स्वतंत्रता के पक्ष में पड़े थे.
इस दौरान वोट देने जा रहे लोगों के साथ पुलिस की झड़प होने की ख़बरें भी आई थीं. मारियानो रखोई ने कहा कि कैटेलोनिया प्रशासन का व्यवहार विश्वासघात की तरह है और यह देश के संविधान पर बहुत ख़तरनाक हमला है.
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