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सियाचिन: पाकिस्तान और भारत के लिए मूंछ की लड़ाई
- Author, आबिद हुसैन
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
काराकोरम पर्वत श्रृंखला में लगभग 20 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित सियाचिन का मोर्चा दुनिया का एक अनोखा जंगी मोर्चा माना जाता है.
यहां पिछले 33 साल से पाकिस्तान और भारत की सेना एक दूसरे के आमने-सामने है और ये युद्ध पाकिस्तान और भारत के लिए मूंछ की ऐसी लड़ाई बन चुकी है जिससे निकलना निकट भविष्य में दोनों देशों के लिए मुमकिन नहीं दिखता.
सियाचिन में लगभग तीन से पाँच हज़ार सैनिक और करोड़ों डॉलर गंवाने के बावजूद, दोनों देशों की फौजें इस मोर्चे से वापसी पर राजी नहीं हो सकी हैं.
अप्रैल 2012 में गयारी में पाकिस्तानी सेना की एक बटालियन हिमस्खलन के हादसे का शिकार हो गई थी और बर्फ तले दबने के कारण 140 जवान मारे गए थे.
सियाचिन में सेना
इसके बाद पाकिस्तानी सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल अशफ़ाक परवेज़ कयानी ने सियाचिन से सेना की वापसी और मोर्चा खत्म करने का प्रस्ताव दोनों देशों की एक संयुक्त बैठक में रखा, लेकिन इस पर बात आगे नहीं बढ़ सकी.
पाकिस्तानी सेना के 'सियाचिन 323' ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर नैयर नसीर का कहना है, "जनरल अशफ़ाक कयानी ने भारत में अपने समकक्ष अधिकारियों को सुझाव दिया था कि हम दुनिया के सबसे कठिन मोर्चे पर लड़ रहे हैं और यहां कुदरत और इलाके की परिस्थितियां अगर आप को चोट पहुँचा रही हैं तो इसके बारे में सोचना चाहिए. मेरी जानकारी के अनुसार ये सलाह वहाँ एक हद तक सुनी गई थी, लेकिन शायद सियासी वजहों से इस पर बात आगे नहीं बढ़ी."
करगिल की लड़ाई
ब्रिगेडियर नसीर ने कहा, "शांति के लिए अनिवार्य है कि दोनों देशों की सेना एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर बात करे. जब तक दोनों फ़ौजें सख्ती के साथ अपने स्टैंड पर डटी रहेंगी, समस्या का समाधान नहीं निकलेगा. ये अहम है कि हम साथ बैठकर एक-दूसरे से बात करें, शायद एक-दूसरे को सुनकर कोई मुनासिब रास्ता निकल जाए."
पाकिस्तान और भारत के बीच 1999 में करगिल की लड़ाई के बाद सियाचिन पर भी इसका असर पड़ा, लेकिन 2003 तक पाकिस्तान के नए प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ़ और भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास का माहौल बहाल करने में सकारात्मक प्रगति की.
सैनिकों की वापसी
इसी साल के आखिर तक दोनों देशों के बीच एलओसी और एसओसी के मुद्दे को हल करने की दिशा में भी बात आगे बढ़ी, लेकिन सियाचिन से सैनिकों की वापसी के मुद्दे का हल नहीं निकल सका.
पिछले 14 सालों से सियाचिन में बंदूकों का इस्तेमाल नहीं होने के बावजूद, दोनों पक्ष अपने मूल स्टैंड पर ज़रा सा भी लचीलापन दिखाने में असमर्थ रहे हैं.
भारत इस बात पर अड़ा हुआ है कि सियाचिन के मोर्चे पर उसकी सैन्य श्रेष्ठता और ज़मीन पर उनकी वास्तविक स्थिति (एजीएल) को कानूनी तौर पर बिना किसी शर्त के मान्यता दी जाए.
पाकिस्तान पर भरोसा
दूसरी ओर, पाकिस्तान चाहता है कि शिमला समझौते का सम्मान किया जाए और इसी के तहत सेना की स्थिति तय की जाए.
बीबीसी से बात करते हुए भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कहते हैं, "भारत ने पाकिस्तान पर अपना भरोसा खो दिया है. सियाचिन का मामला कश्मीर से अलग नहीं हो सकता है और दोनों पक्षों को दिलेरी से कोई फैसला लेना होगा."
सियाचिन पर 'हाइट्स ऑफ़ मैडनेस' नाम से किताब लिख चुकीं पत्रकार मायरा मैकडोनल्ड भी लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन से इत्तेफाक रखती हैं.
मायरा कहती हैं, "अप्रैल 1984 में युद्ध शुरू होने के बाद से लड़ाई इतनी फैल गई है कि दोनों सेनाएं अब नियंत्रण रेखा के पूर्वी छोर पर पहुंच गई हैं और अब वे एलओसी की समस्या को हल किए बिना वहां से लौट आएं, ये हो नहीं सकता."
सियाचिन की समस्या
उन्होंने यह भी कहा कि करगिल के युद्ध के बाद से पाकिस्तान के वादों पर भारत का भरोसा टूट गया है. उसे ये भी डर है कि अगर वो अपने सैनिकों को वापस बुला ले तो पाकिस्तान करिगल की तरह इन चौकियों पर फिर से कब्ज़ा करने की कोशिश करेगा.
मायरा मैकडोनल्ड के अनुसार, "सियाचिन की समस्या का कोई हल निकालने के लिए पहले दोनों सेनाओं को एक-दूसरे पर भरोसा बढ़ाना होगा. भरोसा बढ़ाने का एक तरीका ये है कि दोनों देशों की सियाचिन ग्लेशियर पर सैनिकों की मौजूदगी से पर्यावरण को हुए नुकसान की जांच करने के लिए अनुसंधान मिशन भेजना चाहिए ताकि ये पता लगाया जा सके कि क्लाइमेट चेंज और सैनिकों की मौजूदगी ने इस पर क्या असर डाला."
जलवायु परिवर्तन
सियाचिन ब्रिगेड के डिप्टी कमांडर कर्नल आमिर इस्लाम ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा कि दुनिया में बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग का असर सियाचिन ग्लेशियर में भी देखा जा सकता है.
वे कहते हैं, 'सियाचिन ग्लेशियर पर जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से बढ़ रहा है. जब हमारे सैनिक अपने चेकपोस्ट पर जाते हैं तो वे पहले से तयशुदा रास्तों पर चलते हैं. पिछले साल की तुलना में इन रास्तों पर खुलने वाली दरारों में इज़ाफ़ा देखने में आया है. जहां पहले पांच से छह दरारें दिखती थीं, वहाँ अब नौ से दस दरारें मिलने लगी हैं. इससे जान जाने का ख़तरा बढ़ गया है."
कर्नल आमीर-इस्लाम ने आगे कहा कि दरारों के साथ-साथ, बर्फीली तूफानों और हिमस्खलनों की घटनाएं भी बढ़ गई हैं.
पाकिस्तान और भारत
भारतीय सेना के साथ पिछले साल भी उसी तरह की घटना हुई जब नौ सैनिक बर्फ़ के तूफ़ान में दफ्न हो गए, लेकिन भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने अपने बयान में सियाचिन से सैनिकों की वापसी के सवाल को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया.
सियाचिन के सवाल पर पाकिस्तान और भारत के बीच अब तक तक़रीबन 13 संयुक्त बैठकें हुई हैं, लेकिन इस मामले के समाधान के बावजूद, मंज़िल तक पहुंचना संभव नहीं हो सका है.
फिर भी, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच अन्य लंबित मुद्दों में सियाचिन की समस्या हल के ज्यादा क़रीब है.
अमरीका में जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर अहसान बट ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा, "सियासी तौर पर देखा जाए तो सियाचिन का मामला सुलझाया जा सकता है. बहुत से लोग कहते हैं कि सियाचिन का इलाका फ़ौजी तौर पर बेहद अहम हैं, लेकिन मेरा उनसे सवाल है कि देश बनने के 40 सालों के बाद उन्हें इसकी अहमियत क्यों याद आई?"
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