You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: 'सू ची ने समस्याएँ गिनाईं, समाधान नहीं दिया'
- Author, राजीव भाटिया
- पदनाम, पूर्व राजदूत, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
म्यांमार की नेता आंग सांग सू ची ने मंगलवार को रोहिंग्या संकट पर अपनी चुप्पी तोड़ी.
पहली पर इस मुद्दे पर देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वो रोहिंग्या मुसलमानों से बात करना चाहती हैं.
लेकिन साथ ही कहा कि रख़ाइन में हिंसा के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं, उन पर कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी.
सू ची के मुताबिक जो लोग म्यांमार लौटना चाहते हैं, उनके लिए शरणार्थी पहचान प्रक्रिया शुरू की जाएगी.
रोहिंग्या संकट के बीच आंग सांग सू ची के इस भाषण का क्या मतलब है, ख़ासकर तब जब संयुक्त राष्ट्र महासभा पर इस पर चर्चा होने वाली है, ये जानने के लिए बीबीसी ने बात की भारत के म्यांमार में पूर्व राजदूत राजीव भाटिया से.
पढ़िए राजीव भाटिया का नज़रिया
आंग सांग सू ची ने बहुत सी सकारात्मक बातें कहीं है, लेकिन कुछ बाते ऐंसी है जो उनके आलोचकों को पसंद नहीं आएंगी. सू ची ने रोहिंग्या मुसलमानों से बात करने की मंशा तो जताई, लेकिन ये प्लान नहीं बताया कि वो रोहिंग्या मुसलमानों को कैसे वापस बुलाना चाहती हैं.
इतना ही नहीं सू ची ने अपने भाषण में कहा कि वो मानवाधिकारों के हनन की निंदा करती हैं, लेकिन अपनी सेना के अधिकारियों के ख़िलाफ एक भी बात नहीं कही.
म्यांमार के उत्तरी रख़ाइन प्रांत में 25 अगस्त को रोहिंग्या संकट की शुरूआत हुई. उसके बाद से जारी हिंसा में तकरीबन चार लाख से ज्यादा मुसलमान पड़ोसी देश बांग्लादेश में पलायन कर चुके हैं.
सू ची का भाषण संयुक्त राष्ट्र में रोहिंग्या संकट को लेकर होने वाली बैठक के मद्देनज़र ही दिया गया है. पहले वो वहां जाने वाली थीं, और ऐसा ही कोई भाषण वहां देतीं, लेकिन वहां सीधे आलोचना झेलनी पड़ सकती थी. इसलिए उन्होंने इस सकंट को देश में रह कर सभांलने का हवाला दिया और वहां नहीं गई.
अलग है रोहिंग्या संकट
जहाँ तक रोहिंग्या पर भारत और म्यांमार दोनों का रुख़ एक होने की बात कही जा रही है, तो ये मानना होगा कि दोंनों देशों की समस्या अलग है.
और दोनों देशों के पक्ष को अलग-अलग ही देखने की कोशिश करनी चाहिए. भारत में सवाल 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों का है, जबकि म्यांमार में सवाल 4 लाख रोहिंग्या मुसलमानों का है.
भारत सरकार इस संकट के आंतकवादी पहलू को गंभीर मानती है, वो एक बात है जो मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. पर भारत सरकार इसके मानवीय पहलू को भी मानती है.
इसलिए बांग्लादेश में शरणार्थियों को मदद भी भारत सरकार ने भेजी है. लेकिन म्यांमार की सरकार ने ये कभी नहीं सोचा कि रोहिंग्या संकट से बांग्लादेश का क्या हाल हो रहा है. इस मुद्दे पर दोनों देशों की सोच अलग है.
संकट का मानवीय हल
किसी देश के चार लाख लोगों को दूसरे देश में जाकर शरण लेनी पड़े, इससे गंभीर बात और कुछ नहीं हो सकती.
इसके लिए न सिर्फ आंग सांग सू ची जिम्मेदार है, बल्कि म्यांमार की सेना और पॉलिटिकल क्लास सब जिम्मेदार है.
म्यांमार की सत्ता पर काबिज़ नेताओं को ये सोचना होगा कि इस सकंट का मानवीय हल कैसा निकाला जाए.
ताकि समस्या का समाधान भी हो जाए और पड़ोसी देश के लिए बोझ भी न पैदा हो.
क्यों जटिल है म्यांमार की समस्या?
अपने भाषण में म्यांमार की नेता आंग सांग सू ची ने कहा कि हमारा देश एक जटिल देश है.
इसलिए रोहिंग्या संकट से निपटने में थोड़ा वक्त लग रहा है. म्यांमार में बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है.
लेकिन वहां रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों के साथ आज भी उनका सामांजस्य नहीं बन पाया है.
प्रजातांत्रिक पार्टी सत्ता में है, लेकिन प्रजातंत्र पूरी तरह देश में आया नहीं है, सत्ता में सेना का दखल आज भी बरकरार है. इसलिए सू ची के इन बातों में दम तो है.
अच्छा होता कि समस्या के साथ समाधान भी इस भाषण में गिनाती.
(बीबीसी संवाददाता सरोज सिंह के साथ बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)