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रोहिंग्या संकटः सू ची के हाथों में कितनी ताक़त?
- Author, जोनाथन हेड
- पदनाम, दक्षिण पूर्व एशिया के बीबीसी संवाददाता
म्यांमार के रखाइन प्रांत में जारी हिंसा और रोहिंग्या मुसलमानों के पलायन के मुद्दे पर कई अंतरराष्ट्रीय नेता और नोबल पुरस्कार विजेता अपनी चिंता ज़ाहिर कर चुके हैं.
म्यांमार की नेता आंग सान सू ची ने रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों को चरमपंथ के ख़िलाफ़ कार्रवाई बताकर उसका बचाव किया था. इस बीच सू ची के अगले हफ्ते होने वाली संयुक्त राष्ट्र की महासभा में हिस्सा नहीं लेने की ख़बरें भी सामने आ रही हैं.
एक सवाल जो सभी के सामने उठ रहा है वह यह कि 'आंग सान सू ची अपने देश के अंदर कितनी ताकतवर हैं ?'
स्टेट काउंसलर हैं सू ची
वर्तमान समय में आंग सान सू ची म्यांमार में स्टेट काउंसलर के पद पर नियुक्त हैं. यह पद उन्होंने संविधान में संशोधन कर खुद ही निर्मित किया था. इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को राष्ट्रपति के पद तक पहुंचने से रोकना था जिसकी शादी किसी विदेशी से हुई हो या फिर उसके बच्चे विदेशी नागरिक हों.
सू ची म्यांमार की सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता हैं. उनकी पार्टी का नाम नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी है(एनएलडी) . साल 2015 में हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी ने जबरदस्त जीत दर्ज की थी.
पार्टी व कैबिनेट के बड़े फैसले सू ची द्वारा ही लिए जाते हैं, वे विदेश मंत्री का पद भी संभाल रही हैं.
सू ची की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि म्यांमार के राष्ट्रपति तिन चो अपने काम के लिए सू ची के प्रति जवाबदेह हैं.
सेना के पास कितनी ताकत?
म्यांमार का संविधान वहां की सैन्य सरकार द्वारा बनाया गया है जो 1962 से किसी न किसी रूप में सत्ता पर काबिज़ रही. इस संविधान को साल 2008 में एक जनमत संग्रह द्वारा स्वीकृत किया गया. उस समय एनएलडी या सू ची ने इस संविधान पर अपनी सहमति दर्ज नहीं कराई थी.
सैन्य सरकार द्वारा पारित कराए गए इस संविधान में संसद की एक चौथाई सीटें सेना के लिए ही आरक्षित बताई गईं. इसके साथ-साथ तीन महत्वपूर्ण मंत्रालय- गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और सीमा संबंधी मामलों से जुड़ा मंत्रालय सेना ने अपने पास ही रखा.
राष्ट्रीय सुरक्षा और सुरक्षा परिषद की 11 सबसे महत्वपूर्ण सीटों में से छह सीटें सेना के पास हैं, इनके पास लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को हटाने की ताकत है.
राज्य के बजट में से 14% हिस्सा रक्षा पर खर्च होता है, यह स्वास्थ्य और शिक्षा को मिलाकर भी होने वाले बजट से भी ज्यादा है.
आंग सान सू ची और सेना के बीच पिछले 20 साल से भी ज्यादा वक्त से संघर्ष चल रहा है. सू ची को लगभग 15 सालों तक घर में नजरबंद रखा गया था.
चुनावों के बाद सू ची और सेना मिलकर देश चला रहे हैं, सू ची के पास जनमत है जबकि सेना के पास असल ताकत.
दोनों की बीच अभी भी कई मुद्दों पर असहमतियां हैं. सू ची संविधान में संशोधन करवाना चाहती हैं जबकि सेना इसके पक्ष में नहीं है.
सू ची का सबसे पसंदीदा मंत्र है 'कानून का शासन (Rule of Law)'. सेना और सू ची जिस एक बात पर सहमत होते हैं वह है राज्य में स्थिरता कायम रखना और अर्थव्यवस्था को बेहतर करना.
रोहिंग्या के प्रति नज़रिया ?
रोहिंग्या मुद्दे पर सू ची को बहुत ही संभल कर चलना पड़ रहा है क्योंकि म्यांमार की जनता रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति संवेदनशील नहीं है.
बर्मा की अधिकतर आबादी का मानना है कि रोहिंग्या समुदाय के लोग म्यांमार के नागरिक नहीं है और वे बांग्लादेश से आए गैरक़ानूनी प्रवासी हैं.
रखाइन प्रांत में तो हालात और भी खराब हैं. वहां की बौद्ध जनता और रोहंग्या समुदाय के बीच दशकों से लड़ाई चल रही है. रखाइन में रहने वाले बौद्ध यह मानने लगे हैं कि वे जल्दी ही अपने इलाके में अल्पसंख्यक बन जाएंगे.
रखाइन की राष्ट्रवादी पार्टी एएनपी वहां की स्थानीय विधानसभा में बहुमत में है, लेकिन इस पार्टी पर सू ची की पार्टी एनएलडी का नियंत्रण नहीं है.
रखाइन की जनता में वहां की पुलिस के के प्रति सहानुभूति है. पुलिस में आधे से ज्यादा अधिकारी बौद्ध हैं. उत्तरी रखाइन का ज़्यादातर इलाका सेना के कब्जे में ही है.
यहां तक की सेना के कमांडर जनरल मिन आंग हेंग ने भी कहा है कि रोहिंग्या समुदाय के प्रति उनकी सहानुभूति बहुत ही कम है.
मीडिया पर नियंत्रण
म्यांमार के हालात में मीडिया कवरेज की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही है. पिछले पांच साल में इंटरनेट, मोबाइल की पहुंच तेजी से बढ़ी है. लेकिन मीडिया का बहुत ही कम हिस्सा रोहिंग्या समस्या को कवर कर रहा है.
अधिकतर मीडिया चैनलों पर रखाइन प्रांत से बौद्धों व हिंदुओं द्वारा पलायन की ख़बरें ही चलाई जाती हैं जिनकी संख्या वास्तव में बहुत कम है.
सोशल मीडिया की वजह से ग़लत जानकारी व सूचनाएं बहुत तेज़ी से जनता के बीच फैल रही हैं.
सू ची की सोच
इस तरहरखाइन प्रांत में आंग सान सू ची के हाथ काफी हद तक बंधे हुए नज़र आते हैं. यदि वे रोहिंग्या समुदाय के समर्थन में खड़ी होती हैं तो बहुसंख्यक बौद्ध जनता उनसे नाराज़ हो जाएगी.
सू ची भी इस खतरे को समझती हैं और इसीलिए वे रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन करने का जआं नहीं खेलना चाहतीं. और सू ची एक बार जब मन बना लेती हैं तो उसे बदलना बहुत ही मुश्किल होता है.
अगर सू ची रखाइन प्रांत में सेना की कार्रवाई का विरोध करती हैं तो क्या सेना राज्य में कार्रवाई कर देगी? यह सवाल सू ची के दिमाग में भी कौंध रहा होगा. वर्तमान हालात में तो जनता भी सेना का समर्थन करती नज़र आ सकती है.
2015 के चुनाव में भले ही सू ची की पार्टी को बड़ी सफलता मिली हो, लेकिन राज्य की असली ताकत सेना के हाथों में ही है और इस बार तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा हो रही आलोचना के लिए सेना सू ची को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रही है.
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