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उत्तर कोरिया-अमरीका के तनातनी में रूस क्या करेगा?
- Author, सारा रेन्सफोर्ड
- पदनाम, बीबीसी संवाददादाता, मॉस्को
रूसी टेलीविज़न कैमरा के सामने उद्घोषिका ने मुस्कुराते हुए कहा, "इसकी ख़ुशबू तरो ताज़ा करने वाली है और हमारे दिलों में हमारे नेता के लिए बहुत इज़्ज़त है."
उत्तर कोरियाई मूल वाली इस उद्घोषिका ने लाल रंग का एक बड़ा फूल सूंघा था जिसका नाम उत्तर कोरिया के पूर्व सुप्रीम लीडर किम जोंग इल के नाम पर दिया गया है.
रूसी सरकारी टेलीविज़न पर सुबह के वक्त उत्तर कोरिया पर एक ख़ास कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है. ये कार्यक्रम एक विशेष सिरीज़ का हिस्सा हैं जिनमें कथित तौर पर बातों को गुप्त रखने वाले इस देश के खानपान और फ़ैशन की जानकारी दी जाती है.
इस कार्यक्रम का इशारा यही है कि उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल परीक्षणों पर रूस का पक्ष अलग है.
प्रसारण से दो सप्ताह पहले 11 अगस्त को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ट्वीट किया था कि "अगर उत्तर कोरिया कोई गड़बड़ी करता है तो अमरीकी सेना अपने गोलाबारूद के साथ पूरी तरह तैयार है. मुझे उम्मीद है कि किम जोंग उन कोई दूसरा रास्ता खोज लेंगे."
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कोरिया को लेकर दोनों देशों के बीच अलग रवैये को कई बार ज़ाहिर किया है. हाल में उन्होंने कहा था कि उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाना व्यर्थ है.
उन्होंने कहा था, "उत्तर कोरिया घास खाकर गुज़ारा कर लेगा लेकिन अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ेगा."
हालांकि पुतिन ने उत्तर कोरिया के हाल में किए मिसाइल परीक्षण की आलोचना जरूर की और इसे "भड़काने वाला" बताया लेकिन उन्होंने इसे सही बताने की कोशिश भी की.
पुतिन ने कहा था कि उत्तर कोरिया के लोग ईराक़ में सद्दाम हुसैन के कथित हथियार बढ़ाने के कार्यक्रम को लेकर उस पर हुए अमरीकी हमले को नहीं भूले हैं और इसीलिए उसे लगता है कि अपनी सुरक्षा के लिए उसे परमाणु हथियारों का ज़खीरा बढ़ाना होगा.
मॉस्को कार्नीगी सेंटर के एलेक्ज़ेंडर गाबूइव कहते हैं, "रूस को लगता है कि उत्तर कोरिया सभी पर बम गिराना नहीं चाहता, लेकिन उसका कार्यक्रम दक्षिण कोरिया और अमरीका के हितों के ख़िलाफ़ है."
वो कहते हैं "रूस समझता है कि वो भी अमरीका की 'गणतंत्र को बढ़ावा देने' के दावों से उतना ही चिंतत है जितना कि उत्तर कोरिया."
अमरीका से साथ अपने निजी अनुभव के कारण भी शायद रूस उत्तर कोरिया पर अधिक प्रतिबंध लगाने के समर्थन में नहीं है, क्योंकि रूस ख़ुद अमरीकी प्रतंबंधों को झेल चुका है.
अमरीका चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उत्तर कोरिया को होने वाली तेल उत्पादों की सप्लाई, उसके टेक्सटाइल निर्यात की ख़रीद और उत्तर कोरिया के श्रमिकों को विदेशों में भर्ती करने पर प्रतिबंध लगाए.
वो उत्तर कोरिया के सुप्रीम नेता किम जोंग उन की निजी संपत्ति को ज़ब्त करने के साथ-साथ उनकी यात्राओं को भी प्रतिबंधित करना चाहता है.
उत्तर कोरिया में कई साल बिता चुके रूसी राजदूत जॉर्जी टोलोराया पूछते हैं, "हम क्या करने वाले हैं? तेल की सप्लाई बंद कर दें ताकि वहां मरीज़ों को अस्पताल पहुंचाने वाले एंबुलेंस काम न कर सकें?"
वो कहते हैं कि रूस व्यापार में नुकसान की चिंता करने की बजाय अपने सिद्धांतों से प्रेरित हो कर काम करता है.
राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है कि उत्तर कोरिया को होने वाला निर्यात "लगभग शून्य" है, हालांकि रूस के सूदूर पूर्व में तीस हज़ार उत्तर कोरियाई कामग़ार काम कर रहे हैं. इन कामगारों को सरकार के ख़र्चे पर काम दिया गया है.
टोलोराया पूछते हैं, "बात ये नहीं कि रूस को अपनी स्थिति का फ़ायदा लेना चाहिए या नहीं. सवाल ये है कि हमें ऐसा क्यों करना चाहिए?"
वो कहते हैं, "हमारा सिद्धांत उत्तर कोरिया को अलग-थलग करना और उसे कमज़ोर करना नहीं है."
चीन की तरह रूस की सीमा भी उत्तर कोरिया के साथ सटी हुई है और वो दक्षिण कोरिया को लेकर अंतर्विरोध की स्थिति में है जो कि अमरीकी का मित्र और सैन्य सहभागी भी है.
उत्तर कोरिया को ले कर चीन और रूस प्रतिबंधों से हट कर कूटनीतिक रास्ते तलाशने की बात कर चुके हैं.
पहले कदम के तौर पर उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण पर रोक और साथ ही साथ अमरीका और दश्क्षिण कोरिया के साझा सैन्य अभ्यास को बंद करने की बात की गई है, जबकि दूसरे क़दम में सभी पक्षों के बीच बातचीत बढ़ाने की कोशिश करने की सलाह दी गई है.
कुछ लोगों का का मानना है कि रूस इस मामले में तनाव को कम करने की बजाय अपनी स्थिति दुरूस्त कर रहा है और एक वैश्विक संकट में हस्तक्षेप कर रहा है.
एलेक्ज़ेंडर गाबूइव कहते हैं, "रूस को पता है कि वो जो कह रहे हैं उसको अमली जामा नहीं पहनाया जा सकता लेकिन ऐसा कर के वो अमरीका को बुरा दिखाने में समर्थ हो रहा है. कम से कम चीन और रूस शांति की बात तो कर रहे हैं जबकि अमरीकी राष्ट्रपति केवल सैन्य कार्रवाई और आग बरसाने की बात करने वाले ट्वीट कर रहे हैं."
वो मानते हैं दशकों तक सोवियत संघ ने उत्तर कोरिया को सहयोग दिया है लेकिन इसके बावजूद आज रूस और उत्तर कोरिया के बीच संबंध कम ही है.
लेकिन इस सप्ताह चीन के दौरे के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने जापान और दक्षिण कोरियाई नेताओं से मुलाक़ात की. उत्तर कोरिया का एक प्रतिनिधि मंडल भी पूर्वी रूस में हुई इस बैठक में शामिल हुआ.
पुराने रिश्ते
कुछ साल पहले दोस्ताना पहल करते हुए पुतिन ने उत्तर कोरिया पर सोवियत काल के समय से चले आ रहे अधिकांश कर्ज को माफ़ कर दिया था.
हाल के वक्त में दोनों देशों में संबंधों में सुधार के प्रयासों के मद्देनज़र प्रायद्वीप के लिए फैरी सेवा (नाव) शुरू की गई है. यहां तक कि मॉस्को में एक उत्तर कोरियाई पर्यटन एजेंसी भी खुली है और ये एजेंसी संभवत: अपने नेताओं के नाम पर रखे गए फूलों को सूंघने के इच्छुक आगंतुकों की भीड़ जमा करने में लगी हैं.
लोगों की कमी के कारण फैरी सेवा को फ़िलहाल रोक दिया गया है.
एक तरफ़ जब ये हो रहा है उसी वक्त रूस के साथ अमरीका के संबंधों में तनाव बढ़ रहा है. रूस पर अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में हस्तक्षेप करने का आरोप है और दोनों देश एक दूसरे के राजनयिकों को निकालने पर लगे हैं.
और ये भी रूस को अमरीका के ख़िलाफ़ जाकर उत्तर कोरिया का समर्थन करने का एक कारण देता है.
युद्ध की तरफ बढ़ते क़दम
इस बीच रूस और चीन के संबंधों में भी एक दूसरे के लिए महत्व बढ़ता जा रहा है, इसलिए दोनों देश कोरियाई प्रयद्वीप में संघंर्ष टालने के लिए बातचीत को एक बेहतर रास्ता बता रहे हैं.
टोलोराया कहते हैं, "अमरीकियों को उत्तर कोरिया के साथ संपर्क साधने और संबंध सुधारने की ज़रूरत है. अगर ज़रूरी हुआ तो हम इस बारे में जानकारी आगे बढ़ा सकते हैं."
वो कहते हैं, "ज़रूरी हो तो बातचीत 10 या 20 साल तक भी चल सकती है. लेकिन तब तक के लिए हमारे पास स्थिरता होनी चाहिए और युद्ध का संकट नहीं."
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