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नवाज़ शरीफ़ के हटने से इमरान ख़ान को कितना फ़ायदा?
- Author, हारुन रशीद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
इमरान ख़ान ने पिछले 4 साल नवाज़ शरीफ़ की सरकार को जकड़े रखा और लगातार दबाव बनाए रखा. नवाज़ के जाने के बाद अब इमरान ख़ान के विरोधियों को लगता है कि उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाए.
इमरान की मुश्किल यह है कि उनके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक फ़ॉरेन फ़ंडिंग का केस चल रहा है. उनके ऊपर अपनी संपत्ति छिपाने का भी आरोप है. इलेक्शन कमीशन में उनकी डिस्क्वॉलीफ़िकेशन का एक केस सुना जा रहा है.
इसके अलावा हाल ही में उनकी पार्टी पीटीआई की ही नेता आएशा गुलालइ वज़ीर ने उनके ऊपर अब तक के सबसे संगीन आरोप लगाए हैं. ये आरोप करप्शन के भी हैं और महिलाओं के प्रति उनके रवैये पर भी सवाल खड़े करते हैं.
इमरान को आराम से नहीं बैठने देंगे विरोधी
लगता है कि इमरान के विरोधी अब उन्हें आराम से बैठने नहीं देंगे, ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने नवाज़ शरीफ़ को नहीं बैठने दिया था. कहते हैं कि राजनीति में सही और ग़लत कुछ नहीं होता. ऐसे में लगता है कि आगे चलकर पर्सनल अटैक ज़्यादा हो सकते हैं.
इमरान ख़ान को लेकर चर्चा यही है कि करप्शन के बजाय उन निजी मामलों को लेकर उन्हें घेरा जा सकता है जिनके बारे में उन्होंने बात नहीं की है.
नवाज़ शरीफ़ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हटाए जाने के बाद इमरान ख़ान का समर्थन बढ़ा है. लोग साथ तो थे मगर उनमें यह शंका पैदा हो रही थी कि इमरान के साथ कब तक चला जाए क्योंकि वह हमेशा करप्शन की ही बात करते थे. अब शायद लोग फिर उनका समर्थन कर सकते हैं.
मुख्य पार्टियों के बीच बढ़ेगी तल्ख़ी
पाकिस्तान में चुनाव अगले साल होंगे और सत्ताधारी पार्टी ने भी साफ़ किया है वह जल्दी चुनाव कराने के हक़ में नहीं हैं. ऐसे में आने वाले 10 महीनों में यह देखना अहम होगा कि दोनों मुख्य पार्टियां क्या करती हैं और एक-दूसरे से कैसे डील करती हैं. दोनों के बीच तल्ख़ी बढ़ेगी.
दोनों पार्टियों की ही पूरी कोशिश होगी कि जितना मुमकिन हो सके, एक-दूसरे के कपड़े भी उतार दें. राजनीति और गंदी होगी.
पाकिस्तान की राजनीति में रोज़ नए धमाके होते रहते हैं. इसलिए यक़ीन के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता कि इमरान ख़ान को अभी जो थोड़ा-बहुत फ़ायदा मिला है, वह चुनाव तक बरकरार रहेगा या नहीं.
चुनाव का मुद्दा होगा अहम
यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि 8-10 महीनों बाद वोटर जब वोट डालने जाएगा तो वह शरीफ़ के ख़िलाफ़ वोट देगा फिर विकास को लेकर. ख़ैबर पख़्तूनख़्वां में तो इमरान की पार्टी की सरकार रही है. वहां उन्होंने क्या काम किया है, जनता उसे देखकर भी वोट देगी.
नवाज़ शरीफ़ द्वारा लाहौर और पंजाब के अन्य इलाकों में चलाए जा रहे प्रोजेक्ट भी तब तक पूरे हो चुके होंगे. वह भी उन्हीं की बुनियाद पर इलेक्शन मज़बूती से जीत पाएंगे. ऐसे में उसी वक़्त कहा जा सकेगा कि इलेक्शन नवाज़ के करप्शन के मुद्दे पर लड़ा जाएगा या फिर विकास को लेकर.
अगर चुनाव करप्शन पर होगा तो इमरान को फ़ायदा हो सकता है. वहीं अगर विकास के मुद्दे पर हुआ तो नवाज़ फ़ायदे में रह सकते हैं क्योंकि वे ऐसे प्रोजेक्ट ज़्यादा कर रहे हैं जो नज़र आते हैं.
इमरान को बनानी होगी आगे की रणनीति
भले ही इमरान की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा हुआ है मगर उन्हें सोचना होगा कि आने वाले 10 महीनों में उन्हें क्या करना है- क्या मुस्लिम लीग (नवाज़) की सरकार पर इसी तरह प्रेशर बनाए रखना है या नहीं.
वह कह रहे हैं कि अंतरिम प्रधानमंत्री शाहिद ख़कान अब्बासी भी करप्शन में शामिल हैं. तो क्या आने वाले 8-10 महीनों में भी इसी करप्शन का राग आलापते हुए वह अपनी लोकप्रियता बरकरार रख पाएंगे?
वैसे यह काम मुश्किल है क्योंकि यह बात अदालतों पर निर्भर करती है. अगर इलेक्शन से एक-दो महीने पहले कोर्ट के किसी फ़ैसले से सरकार को नुकसान होता है तो उसका सीधा फ़ायदा इमरान ख़ान को होगा.
तब बात अलग होगी. वरना नए प्रधानमंत्री अगर कामयाबी से सरकार चलाते हैं, प्रोजेक्ट लाते हैं, नौकरियां देते हैं और इकॉनमी को बेहतर करते हैं तो इमरान के लिए इलेक्शन जीतना मुश्किल होगा.
इमरान के लिए लोकप्रियता बनाए रखना मुश्किल
इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए इमरान ख़ान ने सरकार पर दबाव बनाया था. वह जानते थे कि अगर नवाज़ इलेक्शन करवाते हैं तो उनके लिए जीतना मुश्किल होगा क्योंकि वह सरकार में हैं, उनके पास फ़ंड हैं, डिवेलपमेंट स्कीम्स हैं और पंजाब को भी उन्होंने ख़ुश रखा हुआ है.
इसलिए इमरान के लिए ज़रूरी था कि नवाज़ शरीफ़ को गिराएं. ऐसा हुआ भी मगर शायद वक़्त से पहले हो गया. इमरान को लगता था कि शायद नवाज़ अपनी सरकार गिरने के बाद चुनाव करवाएंगे और उनकी पार्टी आसानी से जीत जाएगी. मगर ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लिया गया.
यही वजह है कि इमरान के लिए अपनी लोकप्रियता बरकरार रखना मुश्किल होगा. मुद्दे बहुत होते हैं, बयान बहुत होते हैं मगर लोग यह देखना चाहते हैं कि ज़मीन पर क्या बदलाव आए हैं. विकास देखकर ही लोग वोट करते हैं.
(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)
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