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ब्लॉगः जब सरकारें इतिहास के साथ 'ऐतिहासिक बलात्कार' की कोशिश करती हैं
- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मुझे याद है कि प्राइमरी स्कूल में जो पुस्तक पढ़ाई जाती थी उसमें प्राचीन हिंदुस्तान भी था जिसमें गौतम बुद्ध, अशोका, चंद्रगुप्त मौर्य और तक्षशिला बसते थे. मोहम्मद बिन क़ासिम भी था और लॉर्ड क्लाइव भी.
मगर आज इस प्राइमरी स्कूल में जो पुस्तक पढ़ाई जाती है वो मोहम्मद बिन क़ासिम से शुरू होती है और दिल्ली की तुर्क सल्तनत, मुग़ल पीरियड, 1857 की जंगे आज़ादी, सर सैयद, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और इक़बाल से होती मोहम्मद अली ज़िन्नाह पर ख़त्म हो जाती है.
मैं पिछले साल मोहनजोदड़ो गया और म्यूज़ियम डायरेक्यर से कहा- मुझे वो बर्तन और मूर्तियां दिखाइए जो खुदाई के बाद निकले हैं.
कहने लगा आपको हिंदू पीरियड की चीज़ें देखनी हैं या बुद्धिस्ट पीरियड की?
मेरे हाथ से चाय का कप छूट गया. भाई, मोहनजोदड़ो का हिंदू या बुद्धिस्ट पीरियड से क्या लेना-देना. कहने लगा हम तो जी उन्हें भी हिंदू ही समझते हैं.
यानी जब सरकारें इतिहास के साथ ऐतिहासिक बलात्कार की कोशिश करती हैं तो फिर वैसी नस्ल परवान चढ़ती है जिसका एक नमूना मोहनजोदड़ो म्यूज़ियम के ये डायरेक्टर भी हैं.
मगर ये देख कर खुशी होती है कि हमारे यहां ही नहीं बल्कि पड़ोस में भी इतिहास के साथ रिवर्स इंजीनियरिंग हो रही है.
मई 2014 में हिंदुस्तान के मुसलमान और ईसाई और उनकी बिल्डिंगें वगैरह सब विदेशी हो गए.
जब मोदी जी प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे तब आर्य और बाद में तुर्क और मुग़ल मध्य एशिया के मैदानों से भारत आए. मगर तीन वर्ष पहले पता चला कि आर्य जाति के लोग दक्कन, तक्षशिला और मगध में तब से आबाद हैं जब से भारत जन्मा है और स्वास्तिका का निशान मध्य एशिया से नहीं बल्कि भारत से मध्य एशिया गया और वहां से जर्मनी पहुंच गया.
मध्यएशिया से बस मुसलमान आए और अंग्रेज़ समंदर पार से आए.
लिहाज़ा जो भारतवासी मुसलमान या ईसाई हुए, वो भी विदेशी ठहरे और उनकी संस्कृति और इमारतें भी विदेशी ठहरीं.
इसीलिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने अयोध्या, मथुरा और बनारस की प्राचीन संस्कृति की तरक्की और रक्षा के लिए बजट 20 अरब रुपये से अधिक का रखा है. मगर ताजमहल और फतेहपुर सीकरी टाइप विदेशी बिल्डिंगों के लिए यूपी के नए बजट में कद्दू भी नहीं.
ये बजट योगी जी ने लखनऊ के कालीदास मार्ग पर अंग्रेज़ों के बनाए चीफ़ मिनिस्टर हाऊस में मंज़ूर किया और फिर उसे चर्चा के लिए 1928 में गवर्नर यूपी सर हार्डकोड बटलर के हाथों बनी विधानसभा बिल्डिंग में यूपी असेंबली के सामने रख दिया. और वहां से बजट का ये बिल 200 वर्ष पुराने राजभवन में बैठे गवर्नर के हस्ताक्षर के लिए भेज दिया गया.
ये राजभवन कोठी इलाही बख़्श के नाम से नवाब आसिफ़-उद-दौला के ख़र्चे से अंग्रेज़ रेज़िडेंट मेजर जनरल क्लाड मार्टिन के लिए बनवाया गया था.
मुझे इंतज़ार रहेगा जब अगले महीने भारत की 70वीं सालगिरह पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी मुग़लों के लाल किले पर से पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति की माला में पिरोए रंगारंग मोती दर्शाएंगे.
क्या योगी जी भी उस समय वहां बैठेंगे कि नहीं?
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