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न्यूज़ीलैंड में युवा इतनी आत्महत्या क्यों करते हैं?
अगर आप सोचते हैं कि न्यूज़ीलैंड पहाड़, नदी और हरियाली से भरा-पूरा एक ख़ूबसूरत देश है तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.
न्यूज़ीलैंड का एक दूसरा पक्ष है जो लोगों को हैरान करता है. सालों से यह देश अवसाद और ख़ुदकुशी से जूझ रहा है. यूनिसेफ की नई रिपोर्ट न्यूज़ीलैंड को फिर से परेशान करने वाली है.
विकसित दुनिया में न्यूज़ीलैंड के किशोर सबसे ज़्यादा ख़ुदकुशी कर रहे हैं.
हालांकि बाक़ी दुनिया के लिए यह हैरान करने वाली बात नहीं है. यह कोई पहली बार नहीं है जब न्यूज़ीलैंड इस रैंकिंग में आगे है. यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक 41 यूरोपीय देशों में से न्यूज़ीलैंड में 15 से 19 साल की उम्र के लोग सबसे ज़्यादा ख़ुदकुशी कर रहे हैं.
प्रति एक लाख लोगों में से 15.6 आत्महत्या की दर अमरीका से दोगुना ज़्यादा है वहीं ब्रिटेन से लगभग पांच गुना ज़्यादा.
आख़िर न्यूज़ीलैंड में ही ऐसा क्यों हो रहा?
इसके कई कारण हैं. यूनिसेफ न्यूज़ीलैंड के डॉ प्रुडेंस स्टोन ने कहा कि मामला केवल आंकड़े का नहीं है. उन्होंने कहा कि ख़ुदकुशी के इस डरावने आंकड़े का संबंध दूसरे तथ्यों से सीधा है. स्टोन ने कहा कि यहां बच्चों में ग़रीबी की उच्च दर, किशोरियों में गर्भधारण के बढ़ते मामले और उन परिवारों की बड़ी तादाद जिसमें मां-बाप काम नहीं करते के कारण यहां ख़ुदकुशी ज़्यादा होती है.
न्यूज़ीलैंड में मेंटल हेल्थ फाउंडेशन के शॉन रॉबिन्सन ने कहा, ''स्कूलो में डराने-धमकाने के मामले में न्यूज़ीलैंड की बहुत बुरी स्थिति है. परिवारों के बीच हिंसा भी बहुत ज़्यादा है. यहां बच्चों को काफ़ी प्रताड़ना सहनी पड़ती है. इसके साथ ही बच्चों में ग़रीबी की दर भी ज़्यादा है जिसे सुलझाने की ज़रूरत है.
न्यूज़ीलैंड के इस आंकड़े से यह भी पता चलता है कि वहां के मावरी समुदाय और पैसिफिक द्वीप वासी में ख़ुदकुशी की दर ज़्यादा है.
स्टोन ने कहा, ''इसे पता चलता है कि यह सांस्कृतिक पहचान और औपनिवेशीकरण के प्रभाव का भी मसला है. इससे संकेत मिलता है कि हमारे समाज में सांस्थानिक और सांस्कृतिक नस्लभेद किस स्तर पर है.''
स्टोन ने कहा कि इस मामले में कोई जांच भी नहीं होती जिससे समस्या को ख़त्म किया जा सके जबकि इसे लेकर बार-बार आगाह किया जाता है.
अन्य पश्चिमी देशों के मुक़ाबले न्यूज़ीलैंड की स्वास्थ सेवा भी बदतर है. स्टोन ने कहा कि यहां पुरुषों में सख्त छवि की संस्कृति है. उन्होंने कहा कि इस कारण कई मामलों में वे एक किस्म के दबाव में रहते हैं. ऐसे में ज़्यादातर मर्द जमकर बीयर पीने लगते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि हाल के सालों में कुछ बदलाव हुए हैं. यहां के संगीतकार और फ़िल्मकार पुरुषों की इस छवि को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
रॉबिन्सन का कहना है कि न्यूज़ीलैंड किशोरों को दबाव से जूझने में मदद करने के लिए कुछ नहीं कर रहा है. यहां के किशोर जिन दबावों और मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं उनमें न्यूज़ीलैंड ठीक से काम नहीं कर रहा है.
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