ईरान में टक्कर नरमपंथ और कट्टरपंथ के बीच

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- Author, राकेश भट्ट
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
ईरान में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव हमेशा की तरह न सिर्फ पश्चिमी देशों के लिए बल्कि ख़ुद ईरानी समाज के लिए भी अनिश्चितता भरी दिलचस्पी का विषय है.
ईरानी राज्य सत्ता अपनी व्याख्या धार्मिक लोकतंत्र के नाम से करती है जिसकी धुरी सर्वोच्च इस्लामी धर्मगुरु के इर्द-गिर्द घूमती है.
शुक्रवार, 19 मई को होने वाले इस चुनाव में कुल मिलाकर 1600 से ज़्यादा प्रत्याशियों ने अपने नामांकन भरे लेकिन 6 प्रत्याशियों के अलावा, सबके नामांकन नामंज़ूर हो गए.
उम्मीदवारों की पुनिरीक्षण प्रक्रिया का ज़िम्मा इस्लामी राज्यतंत्र की गार्डियन कौंसिल नाम की संस्था के पास है जिसके सदस्य सर्वोच्च धार्मिक नेता द्वारा मनोनीत होते हैं.
मुख्य भिड़ंत रूहानी और रईसी के बीच

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योग्य घोषित दो उम्मीदवारों ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है. बचे चार उम्मीदवारों में मुख्य मुक़ाबला नरमपंथी मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी और अत्यंत कट्टर माने जाने वाले उनके प्रतिद्वंदी इब्राहिम रईसी के बीच माना जा रहा है.
इन चुनावों को भी हमेशा की तरह कट्टरपंथी और नरमपंथी विचारधारा का चुनाव माना जा रहा है.
ईरान में राष्ट्रपति चुनाव फ़्रांसीसी चुनावी प्रणाली की तर्ज़ पर होते हैं. पहले दौर के मतदान में यदि किसी भी एक उम्मीदवार को 50 फीसद से अधिक वोट नहीं मिलते हैं तो दोबारा 26 मई को पहले दौर में सबसे ज़्यादा वोट पाने वाले दो उम्मीदवारों के लिए वोट डाले जाएंगे.
नरमपंथी हसन रूहानी

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मौजूदा राष्ट्रपति 68 साला हसन रूहानी 2013 में ईरान के 11वें राष्ट्रपति बने और चार साल के पहले दौर के बाद दूसरी बार चुनावी मैदान में हैं.
ग्लासगो कैलेडोनियन यूनिवर्सिटी से पीएचडी डिग्री प्राप्त रूहानी को शब्दशिल्पी कहा जाता है. कहते हैं कि रूहानी कड़वे फैसलों को मीठी चाशनी में डुबोकर लिया करते हैं.
रूहानी सुधार और परिवर्तन का वादा लेकर पहली बार 2013 में सत्तासीन हुए.
उनके चार साल के शासनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि ईरान का पश्चिमी देशों के साथ परमाणु समझौता रहा जिसके तहत यूरोप और अमरीका समेत संयुक्त राष्ट्र संघ ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया.
2015 में पश्चिमी देशों के साथ हुए समझौते से ईरानी समाज की जितनी अपेक्षाएं बढ़ी उतना सकारात्मक असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ा.
समाज की इसी नाराज़गी को उनके विरोधियों ने अपना असली हथियार बनाया है.
रूहानी की राह मुश्किल क्यों?

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उनके मुख्य प्रतिद्वंदी इब्राहिम रईसी का आरोप है कि रूहानी अपनी नकारा नीतियां के चलते इस सुनहरे अवसर का लाभ नहीं ले पाए.
हालांकि उनके विरोधी इस तथ्य को जानते हुए भी छिपाते हैं कि परमाणु कार्यक्रम की ज़िद और प्रतिबंधों के चलते ईरान पर युद्ध के जो बादल मंडरा रहे थे उसे रूहानी की व्यवहारिक नरमी ने छांट दिया.
अपनी चुनावी जनसभाओं में रूहानी भी इस बात को जनता के बीच रख रहे हैं कि तेल के बाज़ार में मौजूदा मंदी के बावजूद चार साल में देश की जीडीपी को 9 फ़ीसदी तक पहुंचा दिया जिसकी सराहना आईएमएफ़ ने भी की है और कुछ हद तक ईरानी जनता भी इस तथ्य को स्वीकारती प्रतीत होती है.
लेकिन देश में व्याप्त 12 फ़ीसदी की बेरोज़गारी दर को लेकर रूहानी खामोश तो नहीं परन्तु स्वाभाविक तौर पर असहज दिखते हैं.
शायद रूहानी जानते हैं कि जनता राजनैतिक असहजता को तो बर्दाश्त कर लेती है लेकिन खामोशी को कतई नहीं.
ईरानी राजनैतिक विश्लेषक सादिक ज़ीबाकलाम का मानना है, "रूहानी ने अपने पहले दौर के शासनकाल में ईरान को गंभीर प्रतिबंधों से निजात दिलाई और दूसरे दौर में वो व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सुधारों को क्रियान्वित करेंगे."
कट्टरपंथी इब्राहीम रईसी

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रूहानी के मुख्य प्रतिद्वंदी 56 साल के इब्राहीम रईसी कट्टर न्यायविद के रूप में जाने जाते हैं.
सर्वोच्च धार्मिक नेता सैय्यद अली ख़ामेनेई से उनकी निजी निकटता और ईरानी रेवोलुशनरी गार्ड्स का समर्थन उन्हें समाज के एक ख़ास वर्ग का प्रतिनिधि बनाता है.
उनका राजनीतिक अनुभव भले ही कम हो लेकिन उनका आर्थिक रसूख़ निश्चित तौर पर तमाम उम्मीदवारों पर भारी पड़ता है.
रईसी ईरान के सबसे बड़े और सबसे धनी धार्मिक संस्थान इमाम रज़ा बारगाह के संरक्षक हैं. इस धार्मिक संस्थान की वार्षिक आमदनी करोड़ों डॉलर आंकी जाती है.
उनका राजनैतिक तजुर्बा न्यायपालिका तक ही सीमित है. वे लंबे अरसे तक ईरान के उपमुख्य न्यायाधीश रहे और पिछले चार साल से अटॉर्नी जनरल का पदभार संभाला.
उनके न्यायिक फैसलों में उनका कठोरपन और इस्लामी शासन तंत्र के प्रति घोर निष्ठा साफ़ झलकती है.
रईसीकी 'कलम लिखती है फांसी'

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1988 में रईसी के फैसलों से हज़ारों की संख्या में विरोधी राजनीतिक कर्मियों को फांसी दी गई.
उनके बारे में उस वक़्त कहा जाता था कि रईसी की कलम एक शब्द लिखना जानती है और वो है फांसी!
रईसी स्त्री अधिकारों को इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िश और मानवाधिकारों को पश्चिमी देशों का चोंचला मानते हैं.
वो रूहानी को अवसरवादी क्रांतिकारी कहते हैं और खुद को इस्लामी इंक़लाब का बेटा.
रईसी के कट्टरपन से जहां उन्हें शहरी युवावर्ग का समर्थन प्राप्त ना हो लेकिन ग्रामीण इलाकों में उनकी पैठ रूहानी के लिए मुश्किल का सबब बन सकता है.
और दो अन्य उम्मीदवार जो मैदान में हैं

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ईरान के 12वें राष्ट्रपति चुनाव में दो अन्य उम्मीदवार भी हैं जिनमें एक मुस्तफ़ा मीर सलीम हैं जो अपने हार्डलाइनर विचारों के लिए जाने जाते हैं लेकिन उनका राजनैतिक रसूख लगभग ना के बराबर है.
उनका कहना है कि मैं भी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हूँ लेकिन अपना वोट इब्राहिम रईसी को ही दूंगा.
चौथे उम्मीदवार के रूप में मुस्तफ़ा हाशमी-तबा का ताल्लुक सुधारवादी दलों से जोड़ा जाता है. उनके बारे में ईरानी सोशल मीडिया में कई तरह के तंज़ किए जाते रहे हैं.

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19 मई को साढ़े पांच करोड़ मतदाता आमने-सामने के मुक़ाबले में हसन रूहानी और इब्राहिम रईसी में से किसको चुनते हैं यह तो नतीजे जल्द ही बता देंगे. लेकिन रूहानी की चुनावी रैलियों में युवा वर्ग और स्त्रियों की मौजूदगी इब्राहिम रईसी के समर्थकों को ज़रूर खल रही होगी.
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