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कहीं बीफ़ पर पाबंदी है, कहीं लोग ख़ुद छोड़ रहे हैं..
उत्तर प्रदेश में 'अवैध' बूचड़खानों के ख़िलाफ़ योगी सरकार की सख़्ती ने कई इलाकों में 'मीटबंदी' जैसे हालात पैदा कर दिए हैं. लोग इसके विरोध और समर्थन में अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं.
यूपी में गाय, बैल और सांड काटने की क़ानूनी मनाही है. साथ ही बीफ़ खाने और रखने पर भी पाबंदी है.
लेकिन भैंस के मीट पर ऐसी कोई रोक नहीं है. हालांकि, ताज़ा घटनाक्रम ने प्रदेश के कई हिस्सों में असर दिखाना शुरू कर दिया है.
यहां के लोग क्यों छोड़ रहे हैं बीफ़?
इस बीच अमरीका से आई एक ख़बर हैरान करने वाली है. वहां के लोग दस साल पहले की तुलना में कम बीफ़ खा रहे हैं.
नेचुरल रिर्सोसेज़ डिफ़ेंस काउंसिल (NRDC) की एक स्टडी के मुताबिक साल 2005 से 2014 के बीच अमरीका में बीफ़ का उपभोग 19 फ़ीसदी घटा है.
इस दौरान अमरीका में लोगों ने पोर्क, चिकन, शेलफ़िश भी खाना कम किया है, हालांकि इनके उपभोग में दर्ज गिरावट बीफ़ की तुलना में कम है.
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक़ काउंसिल बीफ़ की लोकप्रियता में कमी को जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ जीत के तौर पर देख रही है, क्योंकि पशुओं के पालन-पोषण से ग्रीनहाउस गैस पैदा होती हैं.
बीफ़ कम खाने से घटा प्रदूषण?
इस समूह का मानना है कि इससे प्रदूषण में इतनी कमी आएगी जितनी 3.9 करोड़ कारों के उत्सर्जन से होता है.
एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से मिले आंकड़ों पर आधारित इस रिसर्च में कहा गया है कि आबादी में 9 फ़ीसदी इज़ाफ़ा होने के बावजूद अमरीकी लोगों की डाइट में जो बदलाव आया है उससे 5.7 करोड़ गाड़ियों से पैदा होने वाले प्रदूषण जितनी कमी आई है.
काउंसिल की पॉलिसी स्पेशयलिस्ट सुजाता बर्गेन ने कहा, ''भले ही हमें इस बात का अहसास हो या ना हो, लेकिन अमरीकी लोग अपने छुरी-कांटों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जंग लड़ रहे हैं.''
सेहत को लेकर चिंता बढ़ी
हालांकि NRDC ने अमरीकियों से ये नहीं पूछा कि उनकी डाइट में आए बदलाव की वजह क्या है. लेकिन सुजाता के मुताबिक़ पर्यावरण पर पड़ने वाले असर से ज़्यादा इसकी वजह अपनी सेहत को लेकर फ़िक्रमंद होना है.
न्ययॉर्क टाइम्स के मुताबिक़ कंज्यूमर रिसर्च फ़र्म मिंटेल ने जनवरी में एक रिसर्च प्रकाशित की थी, जिसमें लोगों से पूछा गया कि वो कम बीफ़ क्यों खा रहे हैं. 37 फ़ीसदी उपभोक्ताओं ने क़ीमतों को इसकी सबसे बड़ी वजह बताया.
35 फ़ीसदी लोगों का कहना था कि वो चिकन या टोफू़ जैसे दूसरे स्रोतों से ज़्यादा प्रोटीन हासिल कर रहे हैं.
लेकिन 25 फ़ीसदी से ज़्यादा का कहना था कि वो कोलेस्ट्रोल और सैचुरेटेड फ़ैट से जुड़ी चिंताओं की वजह से अपनी डाइट बदल रहे हैं.
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