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पाक-अफ़ग़ानिस्तान की अनबन मिटाने की कोशिश होगी सफल?
- Author, साजिद इक़बाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वैसे तो अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान भौगोलिक तौर पर दो अलग-अलग इकाइयां हैं लेकिन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लिहाज़ से दोनों इस तरह से जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग तौर पर देखना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर है.
आजकल दोनों देशों के संबंध तनाव का शिकार हैं और इनमें बेहतरी की फ़िलहाल कोई गुंजाइश नज़र नहीं आ रही.
पाकिस्तान ने पिछले दिनों सिंध में लाल शाहबाज़ कलंदर के मज़ार पर हमले के बाद से अफ़ग़ानिस्तान के साथ अपनी करीब 1,100 किलोमीटर लंबी सरहद को बंद कर रखा है.
इसमें हाल में सिर्फ दो दिनों के लिए ही नरमी देखने में आई थी जब पाकिस्तान में फंसे हुए अफ़ग़ान शहरियों को वापस जाने की इजाज़त दी गई थी.
पाकिस्तानी हुक़्मरान का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान के साथ अपनी सरहद की वाकई कड़ी निगरानी नहीं कर रहा और भारत समर्थक कट्टरपंथी गुटों को पनाह दे रहा है.
इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान पर इसी तरह के आरोप लगाता रहा है. यही वजह है कि जब पाकिस्तानी हुक़्मरानों ने पिछले दिनों 76 संदिग्ध चरमपंथियों की फ़ेहरिस्त अफ़ग़ानिस्तान की सरकार के हवाले की थी तो उन्होंने इससे भी लंबी सूची पाकिस्तान को थमा दी थी.
इसी के मद्देनज़र पिछले दिनों दोनों मुल्कों के ताल्लुकात को सामान्य करने के लिए लंदन में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई जिसमें पाकिस्तान की तरफ़ से प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हनीफ़ अत्मार ने शिरकत की.
मेज़बान ब्रिटेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सर मार्क लायल ग्रान्ट ने अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की.
सर मार्क लायल ग्रान्ट पाकिस्तान में ब्रिटेन के हाई कमिश्नर भी रह चुके हैं और उन्हें पाकिस्तान के सियासी और सरकारी हलकों में काफ़ी सम्मान की नज़रों से देखा जाता है.
ये वही सर मार्क लायल ग्रान्ट हैं जिनके पुरखों के नाम पर पाकिस्तान के लायलपुर शहर का नाम रखा गया था. वर्तमान में इस शहर को फ़ैसलाबाद कहा जाता है.
लंदन में हुई बातचीत में कोई फ़ौरी नतीजा तो नहीं आया लेकिन पाकिस्तान में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत उमर ज़ाखिलवाल ने कहा कि बातचीत सकारात्मक थी और इससे रिश्तों में आए तनाव को सामान्य करने की दिशा में मदद मिलेगी.
पाकिस्तान के अधिकारियों ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हुई बातचीत हौसला बढ़ाने वाली थी और इससे दोनों देशों के प्रतिनिधियों को आमने-सामने बैठकर एक दूसरे के पक्ष को सुनने और समझने का मौका मिला है.
इस पहल की कामयाबी या नाकामी के बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी.
लेकिन बातचीत के दौरान आगे के लिए जिस मैकेनिज़्म पर दोनों देशों में सहमति नज़र आई उसकी गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से हो पाएगा कि वो किस हद तक तनाव को कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने में कारगर साबित होता है.
आजकल पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान के साथ होने वाले हर मामले को भारत की भूमिका से जोड़कर देखता है और इसी को पाकिस्तान में चरमपंथी हिंसा की ताज़ा लहर के लिए ज़िम्मेदार मानता है.
ऐसी सूरत में अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के अलावा भारत को भी बातचीत में शामिल करने की ज़रूरत महसूस होती है.
पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और भारत के इस त्रिकोणीय संवाद की ग़ैरमौजूदगी में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच की कड़वाहट को कम करना आसान नहीं होगा.
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