वो देश जहां टीनएजर ना शराब पीते हैं ना सिगरेट

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- Author, पाब्लो एस्प्राज़ा
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
क्या आप किसी ऐसे देश के बारे में सोच सकते हैं जहां के युवाओं में शराब पीने का फ़ैशन नहीं हो, या फिर वहां आपको सिगरेट या तंबाकू पीने वाले युवा बमुश्किल से मिलें.
सोचते वक्त इस बात का भी ध्यान रखिएगा कि वहां बिहार जैसी शराबबंदी भी लागू नहीं की गई है.
तो आप अंदाज़ा नहीं लगा पाए, कोई बात नहीं. ऐसी एक जगह दुनिया में है और उसका नाम है आइसलैंड.
यूनिसेफ़ के आंकड़ों के मुताबिक आइसलैंड में 14 से 16 साल के केवल पांच फ़ीसदी युवाओं ने बीते महीने शराब का सेवन किया है. जबकि केवल तीन फीसदी युवा रोजाना के हिसाब से किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं. बीते 30 दिनों में केवल सात फीसदी लोगों ने एक बार हशीश का इस्तेमाल किया है.
ये इसलिए बहुत कम है क्योंकि यूरोपीय देशों में में 14 से 16 साल की उम्र में 47 फ़ीसदी युवा शराब और 13 फ़ीसदी युवा तंबाकू का सेवन करते हैं.

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वैसे आपको ये जानकर अचरज होगा कि महज 20 साल पहले आइसलैंड यूरोप का वैसा देश था, जहां शराब और तंबाकू का इस्तेमाल सबसे अधिक होता था.
कैसे बदल गई तस्वीर
ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि किस तरह तीन लाख की आबादी वाले इस देश ने अपने टीनएजरों को बुरी आदत से बचाया है.
दरअसल, 1998 में आइसलैंड में 'यूथ इन आइसलैंड' नाम से एक अभियान शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य युवाओं में शराब और सिगरेट की लत को दूर करना मुख्य उद्देश्य बनाया गया था.
इस अभियान में युवाओं की शराब सिगरेट की लत के बारे में लगातार अध्ययन किया गया. यूथ इन आइसलैंड कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने वाले सेंटर फॉर रिसर्च एंड सोशल एनालिसिस के निदेशक जॉन सिगफ्यूसन के मुताबिक युवाओं की आदतों और उसके रुझान को समझने के लिए हर दो साल के अंतराल पर उनका सर्वे किया गया.
ये सर्वे देश के हर स्कूल में किया गया. इसके जरिए उनमें शराब और सिगरेट की लत के अलावा उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि जानने और भावनात्मक समस्याओं को समझने की कोशिश की गई.

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इसके जरिए देश के हर इलाके और हर स्कूल के टीनएजर युवाओं के बारे में जानकारी जुटाई गई, इसके आधार पर सामुदायिक पहल और नगर निगम के जरिए शराब और तंबाकू के सेवन के ख़तरे के बारे में इन्हें बताने की मुहिम चलाई गई.
रातों रात नहीं हुआ बदलाव
जॉन सिगफ़्यूसन के मुताबिक ये बदलाव कोई रातों रात नहीं हुआ. हमने प्रभावित बच्चों के माता-पिता से संपर्क करके उन्हें अपने बच्चों पर ध्यान देने को कहा, उनके साथ वक्त बिताने को कहा.
सिगफ़्यूसन के मुताबिक केवल कार्रवाई करने से ये बदलाव नहीं हो पाता. वे कहते हैं, "नशा करने के लिए केवल बच्चे ही ज़िम्मेदार नहीं थे, बल्कि वयस्क होने के नाते हमारे भी ज़िम्मेदारी बनती है. हमें उन्हें ऐसा वातावरण मुहैया करना था, जिससे उनमें पॉजीटिव सोच आए और वे नशा करने से बचें."

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सेंटर ने अपने अध्ययन में पाया कि माता पिता के साथ समय बिताने और खेलकूद जैसी गतिविधियों में शामिल होने के बाद टीनएज़रों में शराब और सिगरेट का नशा करने की प्रवृति कम हुई.
इसके बाद आइसलैड में स्कूली स्तर पर बच्चों में खेल कूद, संगीत, थिएटर और डांस एक्टिविटी से जोड़ने के लिए सरकार ने अपना बजट बढ़ाया.
2002 में सरकार ने एक और क़दम उठाया- 12 साल से कम उम्र के बच्चों का रात के आठ बजे के बाद सड़कों पर अकेले बाहर निकलने पर रोक लगा दी गई, वहीं 13 से 16 साल की उम्र वालों के लिए रात के 10 बजे के बाद बाहर निकलने पर पाबंदी लगाई है, हालांकि आपात स्थिति में बच्चे भी अकेले कहीं भी आ-जा सकते हैं.
अब यूरोप अपना रहा है तरीका
आइसलैंड का ये कार्यक्रम इतना कामयाब था कि 2006 में इसकी तर्ज पर यूथ इन यूरोप कार्यक्रम शुरू किया गया. इसकी कमान भी जॉन सिगफ़्यूसन को सौंपी गई. बीते दस सालों में इस यूरोपीय प्रोजेक्ट में 30 से ज़्यादा देश शामिल हो चुके हैं.

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सिगफ़्यूसन कहते हैं, "हम पूरे देश में काम नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों को सरकार की मदद मिले ये ज़रूरी नहीं, इसलिए हम नगर पालिकाओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं."
इस प्रोजेक्ट में स्पेन का इकलौता नगरपालिका टारागोना सिटी काउंसिल शामिल है. इस काउंसिल के एडिक्शन प्रीवेंशन सर्विस के निदेशक पैट्रिका रोस कहते हैं, "हमलोग आइसलैंड के मॉडल को अपना रहे हैं क्योंकि ये सामुदायिक भागीदारी वाला कामयाब प्रयोग है. हम ये भी जानते हैं कि खेल कूद में दिलचस्पी युवाओं को नशे से दूर करती है."
हालांकि जॉन सिगफ़्यूसन के मुताबिक अलग-अलग जगहों की स्थानीय संस्कृति और पहलू दूसरे होते हैं और जो तरीका आइसलैंड में कामयाब हुआ हो वो दूसरी जगह कामयाब नहीं हो.
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