अमरीका में अजगर पकड़ रहे भारत के संपेरे

    • Author, सौतिक विस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हर सुबह मासी सादेयान और वदिवेल गोपाल अमरीका के फ़्लोरिडा में अपने अस्थाई घर से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े सांपों का शिकार करने निकल पड़ते हैं.

ये दोनों संपेरे भारत के खानाबदोश इरुला आदिवासी से आते हैं और फ़्लोरिडा के बीहड़ में बर्मीज़ अजगरों को पकड़ने के लिए ख़ास तौर पर बुलाए गए हैं.

बर्मीज़ अजगर अमरीका में मूल रूप से पाए नहीं जाते, लेकिन पालतू जानवरों के कारोबारी इन्हें अमरीका लाते हैं.

लेकिन अब ये विशाल सांप फ़्लोरिडा के नेशनल पार्क में छोटे स्तनधारी जानवरों के लिए ख़तरा बन चुके हैं.

ख़तरनाक अजगर

बर्मीज़ अजगर चिड़ियों, घड़ियालों और हिरणों को भी खा जाते हैं.

2005 में एक बर्मीज़ अजगर ने एक घड़ियाल को निगलने की कोशिश की, इसी कोशिश में वो फट गया. इसमें न घड़ियाल बचा न अजगर.

दो दशक पहले जबसे बीहड़ में इन ख़तरनाक सांपों को देखा गया है तब से इन्हें पकड़ने की कोशिशें लगातार होती रही हैं, हालांकि ये कोशिशें बहुत कामयाब नहीं रही हैं.

आसानी से पकड़ में नहीं आते अजगर

अमरीका में अधिकारियों ने सांपों के प्रजनन के मौसम में जंगलों में अन्य अजगर छोड़ बर्मीज़ अजगरों को पकड़ने की कोशिशें की, लोगों से अपने पालतू सांपों को ज़हर देकर जंगल में छोड़ने की गुज़ारिश भी की और अजगरों के शिकार के लिए नकद इनाम देने का भी एलान किया.

लेकिन नतीजा बहुत अच्छा नहीं हुआ.

पिछले साल, करीब एक हज़ार शिकारियों ने बर्मीज़ अजगर के शिकार की एक महीने तक चली प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. इसमें सिर्फ़ 106 सांपों का शिकार किया जा सका.

पिछले चार हफ़्तों से तुलना की जाए तो भारत के दो आदिवासियों ने अमरीका में सात अजगर पकड़े हैं जिसमें 16 फ़ीट की मादा अजगर भी है जो कि लार्गो के मिसाइल बेस पर लावारिस थी.

बर्मीज़ अजगर

बर्मीज़ अजगरों को एशिऐटिक रॉक पायथन, ब्लैक टेल्ड पायथन और इंडियन रॉक पायथन भी कहा जाता है.

ये सांप ज़्यादातर भारत, चीन, माले और दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई द्वीपों पर पाए जाते हैं.विशालकाय सांप तीन मीटर तक लंबे होते हैं.

अब अमरीका के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में इन सांपों ने अपने गढ़ बना लिए हैं.

माना जाता है कि पालतू सांप या तो जंगल तक भागने में कामयाब हुए होंगे या फिर इन्हें जंगल में छोड़ दिया गया होगा. यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़्लॉरिडा के जीव विज्ञानी फ़्रैंक माज़ोटी ने कहा कि मासी और वदिवेल ने बहुत अच्छा काम किया है.

वो इस बात का पता लगाते हैं कि अजगर उस जगह पर मौजूद हैं या नहीं, फिर उन्हें ढूंढकर पकड़ लेते हैं.

इरुला संपेरे

मयामी हेरल्ड अख़बार के मुताबिक सर्प विशेषज्ञ रॉम विटेकर ने इन इरुला संपेरों को दुनिया में सांपों का बेहतरीन शिकारी बताया है.

मयामी हेरल्ड का कहना है कि इरुला प्रजाति के लोगों के सांप पकड़ने के तरीके रहस्यमय हैं.

इन आदिवासियों के साथ अमरीका गई लेखिका जानकी लेनिन का कहना है कि की लार्गो में मासी और वदिवेल ने बंकर के दरवाज़े पर उगी घास को साफ़ किया, दरवाज़े का निरीक्षण किया, अंदर गए, कंक्रीट की नली को तोड़कर 75 किलो के सांप को बाहर निकाला.

जबकि आठ फ़ुट लंबे एक अजगर को पकड़ते वक्त सांप ने ख़ुद को बचाने के लिए काफ़ी मशक्कत की और उसकी पूंछ पकड़े हुए मासी पर ही आंतों से सारा मल फेंक दिया.

वो कहती हैं मासी ने जब इस अजगर को काबू में कर लिया तो आस-पास खड़े अमरीकी अपनी नाक दबाए खड़े थे.

मासी कहते हैं कि वो सांप के मल से परेशान नहीं हो सकते, अगर मल में सने होंगे तो ही उसे पकड़ सकेंगे.

कोबरा भी हाथ लगा

फ़्लोरिडा फ़िश एंड वाइल्ड लाइफ़ कन्ज़र्वेशन कमीशन ने इन दोनों की अमरीका यात्रा के लिए करीब 70 हज़ार डॉलर का खर्च उठाया है.

जानकी लेनिन कहती हैं,'' अभी तक तो ये लोग यही कहते हैं कि उन्हें अमरीका में रहना पसंद है और वो कई अजगर पकड़ना चाहते हैं .''

मासी और वदिवेल ने पिछले साल अगस्त में थाईलैंड में शोध के लिए अजगरों पर रेडियो ट्रांसमीटर लगाने में शोधकर्ताओं की मदद की थी.

इस दौरान उनके हाथ दो किंग कोबरा लग गए.

जानकी बताती हैं कि उन्होंने कई सांप पकड़े थे लेकिन किंग कोबरा को लेकर ज़्यादा सफलता नहीं मिली थी.

ख़तरनाक काम

भारत में ये दोनों इरुला प्रजाति के लोगों के लिए बनाई एक सहकारी संस्था के सदस्य हैं.

28 साल से चल रही इस सहकारी संस्था के सदस्य सांप पकड़कर उसका ज़हर निकालते हैं और इसे बेचते हैं.

भारत में कई प्रजातियों के सांप पाए जाते हैं और हर साल सांपों के काटने से 46 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है.

1972 में सांप और छिपकली का केंचुल निकालने पर प्रतिबंध लगने तक इरुला लोग इसी काम में लगे थे.

इस प्रतिबंध के एक दशक बाद इन लोगों ने चेन्नई में एक सहकारी संस्था बनाई और फिर सांप पकड़ने का काम करने लगे.

ये लोग कोबरा, बंगाल के ज़हरीले सांपों, क्राइट्स और वाइपर, को पकड़कर इनका ज़हर बेचते हैं.

इस ज़हर को भारत में सात प्रयोगशालाओं को बेचा जाता है जहां सांप के काटने पर ज़हर से बचाने का टीका तैयार किया जाता है.

बिकता है ज़हर

पिछले साल इस सहकारी संस्था के 370 सदस्यों ने तीन करोड़ रुपए का ज़हर बेचा जिसकी कीमत 1982 में सिर्फ़ छह हज़ार रुपए थी.

इस सहकारी संस्था में 122 महिलाएं भी सदस्य हैं.

इरुला प्रजाति के लोगों के पास हर साल 8,300 सांप पकड़ने का लाइसेंस है. हर सांप को चार बार ज़हर निकालने के बाद जंगल में छोड़ दिया जाता है.

इन लोगों की मांग है कि इन्हें तीन गुना ज़्यादा सांप पकड़ने की इजाज़त मिले.

कोबरा का एक ग्राम ज़हर 23 हज़ार रुपए में बिकता है, 1983 से अब तक ज़हर की कीमत में छह गुना उछाल आया है.

एक इरुला आदिवासी हर महीने तकरीबन आठ हज़ार रुपए कमा लेता है, स्वास्थ्य और पेंशन सुविधाएं भी इन लोगों को मिलती हैं.

इरुला आदिवासी के रवि ने बताया, "हम अशिक्षित और ग़रीब हैं. हमारे पास ज़मीनें भी नहीं हैं. सांपों ने ही हमारी ज़िन्दगी बचाई है."

नई पीढ़ी

लेकिन अब संपेरों की इस प्रजाति के लोग कहते हैं कि उनके बच्चे शहरों में जाकर नौकरियां करना चाहते हैं.

हाल ही में सहकारी संस्था के सदस्य एक इरुला परिवार की बेटी ने कॉलेज की पढ़ाई की और अब नर्स बनने की ट्रेनिंग ले रही है.

क़रीब एक लाख 16 हज़ार इरुला आदिवासियों के लिए सवाल ये है कि पुश्तैनी काम करने वाली कहीं ये आख़िरी पीढ़ी तो नहीं.

अगर ऐसा है तो सांप पकड़ने का ये पारंपरिक हुनर लुप्त हो सकता है.

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