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देखे हैं ऐेसे सजे-धजे कबूतर
तुर्की के दक्षिण-पूर्वी शहर शानलेउर्फ़ा में बीते दिनों सबसे सुंदर कबूतर चुनने की राष्ट्रीय प्रतियोगिता हुई.
सीरिया से सटे इलाक़ों में कबूतर पालने और उनकी नई प्रजातियां पैदा करने का शौक सदियों पुराना है. यहां बक़ायदा कबूतरों की बोली लगती है.
शौक़ीन लोग कबूतरों को सजा कर रखते हैं. कुछ लोग उनके पैरों में घुंघरू और रंगीन धागे बांध देते हैं.
कुछ लोग तो कबूतरों के परों में चांदी के गहने तक लगा देते हैं.
अबाली नाम के इस कबूतर की क़ीमत 1,000 तुर्की रियाल लगाई गई थी.
इस्पायर नाम का यह कबूतर 1,500 तुर्की रियाल में बिका.
उज़्बेक के बहुमूल्य कबूतरों में एक की क़ीमत 320 डॉलर लगाई गई.
कबूतर के बाड़ों की पुख़्ता सुरक्षा की व्यवस्था की जाती है. वहां अलार्म और सीसीटीवी कैमरे तक लगाए जाते हैं ताकि पूरी निगरानी रखी जा सके.
नीलामी करने वाले इमाम दिलदास का दावा है कि एक बार तो एक जोड़ा कबूतर 75,000 डॉलर में बिका था.
वे कहते हैं, "यह ऐसा शौक़ है, ऐसा जुनून है, जिसे आप छोड़ नहीं सकते."
उन्होंने कहा कि एक बार तो उन्होंने अपना फ़्रिज़ और पत्नी के गहने बेचकर एक जोड़ा कबूतर ख़रीदा था.
इस्माइल उज़्बेक कबूतर पालने के शौकीन हैं. उन्होंने 200 कबूतर पाल रखे हैं.
कुर्दिश छापामारों और सरकार की सेना के बीच हालिया झड़पों के बावजूद इस बार भी यहां कबूतरों की नीलामी हुई और ऊंची क़ीमतें भी लगाई गईं.
इस इलाक़े से सीरिया की सीमा सिर्फ़ 30 मील है. ऐसे में कई कबूतर सीमा पार कर यहां चले आए और लौट नहीं सके.
लिहाज़ा, कबूतरों की तादाद बढ़ गई और उनकी क़ीमतें गिर गईं. लेकिन ज्योंही लड़ाई तेज़ हुई, क़ीमतें एक बार फिर बढ़ीं.
इमाम दिलदास 2,750 डॉलर की क़ीमत तक के कबूतर बेच चुके हैं. वे नीलामी में मिली क़ीमत का 10 फ़ीसद कमीशन लेते हैं.