You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
30 साल बाद पाकिस्तान को याद आए सलाम
- Author, एम इलियास ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तानी वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अब्दुस सलाम को 1980 में इलेक्ट्रोवीक यूनिफ़िकेशन के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिलने के तुरंत बाद उनके वतन में उन्हें सम्मानित करने के लिए न्योता गया.
पर इसका नतीजा ठीक उलटा हुआ.
डॉक्टर सलाम अहमदिया समुदाय के हैं और पाकिस्तान में साल 1974 में एक क़ानून बना कर इस समुदाय को ग़ैर मुस्लिम क़रार दिया गया था.
अहमदिया पंथ की स्थापना मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने की थी, जिनका जन्म 1835 में हुआ था. इस समुदाय के लोग उन्हें मसीहा और पैगंबर मानते हैं.
इस्लाम के मुताबिक़, मोहम्मद अंतिम पैगंबर थे. इसलिए कट्टरपंथी मुसलमान अहमदिया लोगों को मुसलमान नहीं मानते, हालांकि अहमदिया समुदाय का कहना है कि वे क़ुरान के बताए रास्ते पर ही चलते हैं.
समुदाय के लोगों ने 1947 में पंथ का मुख्यालय भारत के क़ादियां से हटा कर पाकिस्तान के रबवाह कर लिया.
पाकिस्तान के मशहूर वैज्ञानिक परवेज़ हुदभाय ने बीबीसी से कहा, "यह कार्यक्रम क़ायदे आज़म विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में आयोजित किया गया था. इस विभाग की स्थापना डॉक्टर सलाम के छात्र डॉक्टर रियाज़ुद्दीन ने की थी."
डॉक्टर सलाम इस्लामाबाद तो पंहुच गए, पर क़ायदे आज़म विश्वविद्यालय के अंदर दा़ख़िल तक नहीं हो सके.
जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन ने उनका ज़बरदस्त विरोध किया और विश्वविद्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया.
हुदभाय उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे अच्छी तरह याद है. स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई थी. उस छात्र संगठन के कुछ लोगों ने धमकी दी थी कि डॉक्टर सलाम ने विश्वविद्यालय के अहाते में घुसने की हिमाक़त की तो उनकी टांगे तोड़ दी जाएंगी. हमें कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था. "
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने उस घटना के 37 साल बाद उसी विश्वविद्यालय के उसी विभाग का नाम डॉक्टर सलाम पर रखने को हरी झंडी दिखा दी है.
इसका साथ ही हर साल विदेशों में भौतिकी में डॉक्टरेट करने वाले पांच पाकिस्तानी छात्रों को वजीफ़ा देने का फ़ैसला भी किया गया है.
कई लोगों ने सरकार के इस फ़ैसले का स्वागत किया है.
पाकिस्तान में छपने वाले अंग्रेज़ी अख़बार 'डॉन' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि "आख़िरकार एक ऐतिहासिक ग़लती को दुरुस्त किया जा रहा है."
एक निहायत ही समान्य परिवार में जन्मे डॉक्टर सलाम पाकिस्तान सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार बन गए. समझा जाता है कि उन्होंने ही देश के अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रमों की नींव डाली थी.
पर जब 1974 में अहमदिया समुदाय को ग़ैर मुस्लिम बताने वाला क़ानून लागू कर दिया गया, वे देश छोड़ कर चले गए. लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के वैज्ञानिक समुदाय से संपर्क बनाए रखा.
उसके बाद पाकिस्तान में अहमदिया विरोधी भावनाएं और तेज़ होती चली गईं.
समझा जाता है कि शरीफ़ ने सलाम की 20वीं पुण्यतिथि पर एक कार्यक्रम टीवी पर देखा. उसके तुरत बाद उन्होंने आयोजकों को फ़ोन किया और नेशनल सेंटर फॉर फ़ीजिक्स का नाम डॉक्टर सलाम पर रखने का एलान कर दिया.
यह फ़ैसला उस समय आया जब पाकिस्तानी सेना का प्रमुख बनने की दौड़ में जनरल क़मर जावेद बाजवा भी थे. उनकी पत्नी के रिश्तेदार अहमदिया हैं.
परवेज़ हुदभाय भी मानते हैं कि पाकिस्तान ने डॉक्टर सलाम के साथ जो ग़लती की थी, उसे ठीक करने की कोशिश की जा रही है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह फ़ैसला दिखाता है कि पाकिस्तान एक 'सामान्य' देश बनने की कोशिश कर रहा है. नवाज़ शरीफ़ इसकी छवि बदल कर एक ऐसे देश के रूप में करना चाहते हैं जो अपने तमाम मुसलमान और ग़ैर मुस्लिम नायकों को पूरी तरह स्वीकार करता है."
लेकिन, जिस दिन प्रधानमंत्री ने इस अहमदिया वैज्ञानिक को सम्मानित किया, ठीक उसी दिन पुलिस ने रबवाह स्थित अहमदिया समुदाय के मुख्यालय पर छापा मारा. उन्होंने चार लोगों को गिरफ़्तार कर लिया और एक प्रिटिंग प्रेस को बंद कर दिया.
पुलिस ने कहा कि इसकी वजह यह है कि उस छापाखाने में "नफ़रत फैलाने वाली सामग्री" छापी जा रही थी.
एक अहमदिया-विरोधी गुट ने अपने वेबसाइट पर दावा कि उसकी शिकायत पर ही पुलिस ने छापा मारा था.
लगता है कि देश को सामान्य बनाने के रास्ते में अड़चनें भी हैं.