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...ताकि पाकिस्तानी खांस-खांसकर बेहाल हो जाएं
- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से
इससे ज़्यादा फ़ालतू का सवाल हो नहीं सकता कि आख़िर एनडीटीवी के प्रसारण पर ही क्य़ों एक दिन की रोक लगाई जा रही है?
ज़रूरी नहीं कि एनडीटीवी या उसके दर्शकों को भी हो. पठानकोट की कवरेज वैसे तो सभी चैनल लाइव कर रहे थे, मग़र ये बात सिर्फ़ सरकार जानती है कि आतंकवादी सबसे ज़्यादा शौक़ से जो चैनल देखते हैं, वो एनडीटीवी है.
इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा को भी सबसे ज़्यादा ख़तरा अभी इसी चैनल से है. मग़र सरकार ये बात खुलेआम नहीं कह सकती, क्योंकि ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है.
भारत में भले ही एनडीटीवी पर रोक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा हो, लेकिन यहां पाकिस्तान में मीडिया इस ख़बर को कोई ख़ास घास डालने को तैयार नहीं है.
इससे ज़्यादा कवरेज तो उस स्मॉग की हो रही है, जिसे भारत ने पाकिस्तान की तरफ़ धकेल दिया है, ताकि करोड़ों पाकिस्तानी ख़ांस-ख़ास कर बेहाल हो जाएं.
जब मैंने एक चैनल के पत्रकार से पूछा कि भइया ये कैसी साज़िश है कि भारत ने पाकिस्तान को स्मॉग में लपेट-लपेटकर दम घोंटने के जो स्थिति बनाई है, उसका निशाना सिर्फ़ लाहौर वाले नहीं बल्कि दिल्ली से अमृतसर तक के लोग भी बन रहे हैं?
इस पर मेरे पत्रकार दोस्त ने पूछा कि आप भारत के पक्ष में क्यों बोल रहे हैं. क्या आप नहीं जानते कि स्मॉग भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है?
हां तो मैं बता रहा था कि एनडीटीवी का मुद्दा पाकिस्तानी मीडिया के लिए कोई ख़ास अहमियत नहीं रखता. बल्कि यहां तो ये परेशानी है कि बाक़ी चैनल और अख़बार आख़िर इतना बढ़-चढ़कर एनडीटीवी के हक़ में क्यों बोल रहे हैं?
क्योंकि दो साल पहले जब पाकिस्तान में वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर पर हमला हुआ था, तो जियो न्यूज़ चैनल ने इस हमले का दोषी सीधा-सीधा गुप्तचर देशभक्तों को ठहराया.
चुनांचे, जियो का प्रसारण कई दिनों के लिए बंद कर दिया गया. इस पर बाक़ी चैनलों ने अपने माथे पर बल नहीं डाले.
बल्कि भंगड़े डाले, मिठाइयां बांटी और जियो के देशद्रोह को चौक में नंगा करके ख़ूब कूटा. और अपनी-अपनी रेटिंग ऐसे समेटी, जैसे बाईजी का छोटा कोठे के फ़र्श पर बिख़रे रुपए समेटता है.
इसके बाद जब नया चैनल 'बोल' मार्केट में आने के लिए पर तौल रहा था, तो जियो और बाक़ी चैनल भाई-भाई हो गए और सबने मिलकर 'बोल' चैनल की ऐसी-ऐसी पोल खोली कि सरकार ने उसकी लॉन्चिंग से ही मना कर दिया.
आजकल बोल फिर से मार्केट में आने के लिए पर तौल रहा है, मगर अब किसी चैनल के पेट में दर्द नहीं हो उठ रहा.
तो क्या एनडीटीवी को फ़ोन पर किसी देशभक्त सरकारी कर्मचारी ने धमकियां दीं? क्या एनडीटीवी पर किसी दूसरे चैनल ने आईएसआई का एजेंट होने का इल्ज़ाम लगाया? क्या एनडीटीवी की कोई गाड़ी जली? कैमरा टूटा? रिपोर्टर पिटा? फ़ायरिंग हुई?
सरकारी महक़मों ने बायकॉट किया? सैनिक छावनियों में उसका प्रसारण देखने पर पाबंदी लगाई गई? अगर इनमें से कुछ भी नहीं हुआ तो फिर कैसी रोक और कहां का विरोध?
सिर्फ़ एक दिन के प्रसारण पर रोक लगाने के हुक़्म पर इतना हंगामा? अब आपकी समझ में आया कि सीमापार एनडीटीवी से कोई हमदर्दी क्यों नहीं?
भारतीय मीडिया में काम करने वाले मित्रों से बस यही कहूंगा कि ज़रा दिल बड़ा रखिए, अभी तो पार्टी शुरु हुई है!