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'इंसाफ अंधा ही नहीं, बहरा और गूंगा भी चलेगा'
- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
आज का विषय थोड़ा गंभीर और दुख भरा है. पाकिस्तान में घिनौने अपराध जैसे हत्या, बलात्कार और इज़्ज़त के नाम पर हत्या की सज़ा अंग्रेजी क़ानून के तहत भी सुनाई जाती है और इस्लामी क़ानून के तहत भी, जिसे क़िसास यानी बदले का क़ानून कहते हैं.
मगर क़िसास के तहत अगर जिसका क़त्ल हुआ हो, उसके वारिस अगर हत्यारे को माफ़ करते है तो सज़ा भी माफ़ हो जाती है.
माफ़ी देने के लिए क़त्ल होने वाले के वारिस हत्यारे से रकम भी मांग सकते हैं जिसे 'ख़ून बहा' कहा जाता है.
जैसे एक अमरीकी कर्मचारी रेमंड डेविस ने पांच साल पहले जब दो पाकिस्तानी नागरिकों को लाहौर में भरे बाज़ार में गोली मार दी तो वारिसों ने 'ख़ून बहा' की रकम के बदले रेमंड डेविस को माफ़ कर दिया.
लेकिन पिछले हफ़्ते लाहौर के एक सेशन कोर्ट ने एक बाप को इसलिए बरी कर दिया कि उसने 'इज़्ज़त की ख़ातिर' अपनी बेटी का क़त्ल किया था और इस क़त्ल में मदद करने वाले अपने बेटे और भतीजे को माफ़ किया और फिर ख़ुद को भी माफ़ कर दिया.
उसकी दलील थी कि चूंकि वो क़त्ल होने वाली कुंवारी बेटी का वारिस भी है, इस हैसियत से वो ख़ुद को भी माफ़ करता है.
शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी हत्यारे ने ख़ुद को माफ़ कर दिया और अदालत ने भी यह माफ़ी मान ली.
दूसरा केस इमदाद अली का है जिन्होंने 15 साल पहले एक आदमी का क़त्ल किया और फिर सेशन कोर्ट ने उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी.
इमदाद अली के ख़ानदान ने लाहौर हाइकोर्ट में अपील की कि इमदाद को स्तिज़ोफ्रेनिया की बीमारी है और उन्हें नहीं मालूम की उसने क्या किया है.
एक सरकारी डॉक्टर ने भी तस्दीक की कि इमदाद अली स्तिज़ोफ्रेनिया के मरीज हैं और वो उनका पिछले आठ साल से इलाज कर रहे हैं.
मगर सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन सुप्रीम कोर्ट के 1988 के एक फ़ैसले का हवाला देते हुए फ़ैसला सुनाया कि स्तिज़ोफ्रेनिया कोई स्थाई दिमाग़ी बीमारी नहीं है, इसका इलाज़ हो सकता है.
तीसरा केस ग़ुलाम क़ादिर और ग़ुलाम सरवर का है जिन्हें चार और दोषियों समेत 2005 में सेशन कोर्ट ने तीन लोगों के क़त्ल के जुर्म में मौत की सज़ा सुनाई.
2010 में हाईकोर्ट ने चार दोषियों को बरी कर दिया, लेकिन ग़ुलाम क़ादिर और ग़ुलाम सरवर की मौत की सज़ा कायम रखी.
दोनों ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने अब से सात दिन पहले दोनों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया.
जब यह फ़ैसला भावलपुर जेल के कर्मचारियों के पास पहुंचा तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को लिखा कि हुज़ूर हम तो दोनों मुजरिमों को पिछले साल अक्टूबर में ही फांसी पर लटका चुके क्योंकि हमें किसी ने नहीं बताया कि दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रखी है.
आपने देखा कि न्याय को अन्याय में बदलना कितना आसान है. बस न्याय के आगे एक डंडा ही तो लगाना है.
अब उस आदमी को ढूंढ रहा हूं जिसने सबसे पहले कहा था कि इंसाफ अंधा होता है. ये तीनों फ़ैसले देखकर मुझे तो लगता है कि इंसाफ अंधा ही नहीं बल्कि बहरा और गूंगा भी हो तो भी चलेगा.
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