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बुधवार, 29 अप्रैल, 2009 को 08:56 GMT तक के समाचार
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'हमला' मुंबई में ही मुद्दा नहीं बनता दिखता

प्रदर्शन करते मुंबई के लोग (फ़ाइल फ़ोटो)
मुंबई पर 26 नवंबर को हुए सुनियोजित चरमपंथी हमले के ख़िलाफ़ लोगों में काफ़ी आक्रोश था
मुंबई में 26 नवंबर को हुए हमले को देखते हुए देश में अनेक जगहों पर भले ही सुरक्षा एक चुनावी मुद्दा बना हो लेकिन मुंबई में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से बात करने के बाद नहीं लगता कि यहाँ सुरक्षा बड़ा चुनावी मुद्दा बना है.

सुनने में यह भले ही अजीब लगे लेकिन मुंबई के लोगों से बातचीत करने से तो ऐसा ही लगता है. ऐसा प्रतीत होता है कि मुंबई में लोगों के लिए बिजली, पानी और आधारभूत सुविधाएँ अधिक बड़े मुद्दे हैं.

ताज पैलेस होटल के आसपास का इलाक़ा चरमपंथी हमले में बुरी तरह झुलसा था लेकिन वहाँ भी लोगों के बीच इस मुद्दे पर कोई ख़ास चर्चा नहीं हो रही है.

स्थानीय मुद्दे

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के आम कर्मचारी सुरेश कहते हैं, "ग़रीबों की कोई सुनता नहीं है. सब पार्टियाँ अपना हित देखती हैं. मेरे घर में बिजली का बिल बहुत आता है. पानी की दिक्कत है लेकिन समस्या कोई नहीं सुलझाता."

पान की दुकान चलाने वाले एक दुकानदार तो यहाँ तक कहते हैं कि इस बार चुनावों में जोश मतदाताओं में नहीं बल्कि नेताओं में अधिक है.

सुरेश रामदेकर
बहुराष्ट्रीय कंपनी के कर्मचारी सुरेश अपने बिजली के बिल और पानी की दिक्कत से परेशान हैं

हालाँकि हमें एक आर्किटेक्ट मिले जिनकी बात इन से अलग थी.

आर्किटेक्ट मुनाफ़ वडगामा कहते हैं, "हम चाहते हैं ऐसी पार्टी को वोट मिले जो केंद्र में स्थायी सरकार दे. हमारे लिए तो आतंकवाद मुद्दा है, साथ में अर्थव्यवस्था पर भी ध्यान देने की ज़रुरत है."

इस बात को समझना मेरी लिए कुछ कठिन है कि मुंबई के लोगों के लिए मात्र पाँच महीने पहले हुए हमले अब अहम क्यों नहीं हैं. मैंने यही सवाल रखा लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर के सामने.

कुमार केतकर का कहना था, "मुंबई के हमलों में लगभग क़रीब 180 लोगों की मौत हुई थी लेकिन आपको याद होगा 2005 में आई बाढ़ में मरने वालों की संख्या 500 से अधिक थी. मुंबई का हमला बड़े होटलों पर हुआ था जबकि बाढ़ में आम लोग मरे थे. इससे आप समझ सकते हैं कि आम लोगों का जुड़ाव मुंबई के हमले से क्यों नहीं है."

मतदान पर असर

केतकर कहते हैं कि 'आतंकवाद' अगर मुंबई की सात सीटों में से किसी पर मुद्दा बन सकता है तो वो एकमात्र दक्षिणी मुंबई की सीट होगी क्योंकि इस इलाके़ के निवासियों को ही आतंक का सीधा दंश झेलना पड़ा था.

 मुंबई के हमलों में लगभग क़रीब 180 लोगों की मौत हुई थी लेकिन आपको याद होगा 2005 में आई बाढ़ में मरने वालों की संख्या 500 से अधिक थी. मुंबई का हमला बड़े होटलों पर हुआ था जबकि बाढ़ में आम लोग मरे थे. इससे आप समझ सकते हैं कि आम लोगों का जुड़ाव मुंबई के हमले से क्यों नहीं है
कुमार केतकर, वरिष्ठ पत्रकार

वे कहते हैं कि इसका असर मतदान पर तभी दिखेगा जब बड़ी संख्या में दक्षिणी मुंबई के निवासी वोट करने निकलेंगे लेकिन जिनके बारे में आम तौर पर कहा जाता है कि वे तो वोट देते ही नहीं हैं.

केतकर अकेले नहीं हैं जो ये तर्क देते दिखाई देते हैं. जाने-माने कालम लेखक अनिल धारकर भी कहते हैं कि मुंबई के चुनावों में आतंकवाद मुद्दा नहीं होगा क्योंकि ये मुद्दा लोगों के जीवन से वैसे नहीं जुड़ा है जैसा कि जीवन की आधारभूत सुविधाओं का मसला.

ऐसे में मुंबई की सभी सात सीटों के लिए चुनावी मुक़ाबला और रोचक हो गया है. परिसीमन के कारण सीटों के मतदाताओं का कलेवर बदल चुका है और ये अनुमान लगाना मुश्किल है कि किसी सीट पर क्या होगा.

वैसे भी न केवल मुंबई में बल्कि पूरे महाराष्ट्र में 48 सीटों में से अधिकतर पर बहुकोणीय मुक़ाबला है, जिसमें महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एक और अलग कोण पेश कर रही है.

बानगी के तौर पर कांग्रेस एनसीपी के पिछले दस साल के राज से लोग परेशान हैं. दूसरी तरफ़ शिव सेना-भाजपा गठबंधन के बारे में आम राय है कि भाजपा शिव सेना के बिना कुछ नहीं कर सकती लेकिन शिव सेना के वोट आधार में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने सेंध लगा दी है.

ऐसी परिस्थिति में महाराष्ट्र के परिणाम काफ़ी चौंकाने वाले हो सकते हैं.

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