क्या हुआ था उस दिन गुलबर्ग सोसायटी में?

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- Author, प्रशांत दयाल
- पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
28 फरवरी 2002 के पहले भी अहमदाबाद और गुजरात में दंगे हो चुके थे शायद इसी वजह से मुझे दंगों की रिपोर्टिंग में डर नहीं लगा.
लेकिन इस दिन की सुबह ही कुछ और थी. मैं अपने साथी पत्रकारों के साथ अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर प्रशांत चंद्र पांडे के ऑफ़िस पहुंचा.
प्रशांत चंद्र पांडे रोज की ही तरह तसल्ली के साथ बैठे थे. जब हमने उन्हें शहर के हालात के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है. बड़ी तादाद में पुलिसबल शहर में तैनात है.
गोधरा रेलवे स्टेशन पर जलाए गए कारसेवकों के शवों को अहमदाबाद लाया जा चुका था.
शहर में अब भी शांति थी. लेकिन यह शांति कितनी खोखली थी, इसका अंदाज़ा पुलिस कमिश्नर को नहीं था.
बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि आज सुबह कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान ज़ाफरी का फोन आया था. एहसान ज़ाफरी गुलबर्ग सोसाइटी में रहते थे.

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उन्होंने बताया कि गुलबर्ग सोसायटी चूंकि हिंदू बस्ती के बीचो-बीच है इसलिए उन्हें चिंता हो रही है. इसीलिए मैंने ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर एम के टंडन को हालात का जायज़ा लेने के लिए गुलबर्ग सोसायटी भेजा है.
जब हम पुलिस कमिश्नर से बात कर रहे थे तब सुबह के नौ बज रहे थे. अहमदाबाद के पत्रकार जब हालात ठीक नहीं हो तब रिपोर्टिंग के लिए अकेले नहीं चलते बल्कि चार-पांच के गुट में चलते हैं. ताकि आपातकालीन स्थिति में मदद मिल सके.
पुलिस कमिश्नर से मिलने के बाद हम कुछ पत्रकार शहर की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए निकले. काफ़ी जगहों पर पुलिस तैनात थी. लेकिन उनका व्यवहार देख कर लगता था कि कुछ ठीक नहीं है.
कई जगहों पर नाराज़ लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा हो कर खड़े थे और पुलिस उन्हें हटाने की कोशिश नहीं कर रही थी.
पिछले तीन दशक में मैंने कई दंगें देखे हैं और उनकी रिपोर्टिंग की है. लेकिन 2002 में पहली बार ऐसा लगा कि मेरा पत्रकार होना ही मेरे लिए ख़तरा बन गया है.

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पहले जब भी दंगों की रिपोर्टिंग में जाता था तब दंगाई हमें भी रोकते थे, लेकिन पत्रकार होने की जानकारी देने के बाद कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन 2002 दंगों का स्वभाव अलग था.
जैसे-जैसे हम पत्रकार लोग शहर में आगे बढ़ते गए, हमें रास्ते पर खड़े लोग रोकते थे, हमारा परिचय मांगते थे, पत्रकार होनी की जानकारी देने बाद वे हमारी जाति और धर्म भी पूछते थे.
शक़ होने पर परिचय पत्र मांगते थे. मैं अंदर से हिल गया था. मेरा अनुभव कह रहा था कि शहर बड़ी मुश्किल स्थिति में आना वाला है.
हम क़रीब दस बजे गुलबर्ग सोसाइटी पहुंचे. सोसायटी के आसपास बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा थे. वे शांत थे लेकिन उनकी नज़रों में ग़ुस्सा था.
सोसाइटी से क़रीब एक किलोमीटर की दूरी पर दो कारसेवकों के शव लाए गए थे. सोसाइटी के बाहर दो पुलिसवाले भी खड़े थे, उनके पास हथियार के नाम पर सिर्फ़ लाठी थी.
तभी हमें जानकारी मिली कि शहर के कुछ इलाक़ों में ग़ुस्साई भीड़ ने पत्रकारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. टेलीविजन के क्रू मेंबरों को पीटा गया है.
हमारी सलामती इसमें थी कि हम किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाएं. हम वापस पुलिस कमिश्नर के दफ्तर पहुंचे. हमने सोचा कि अगर पुलिस कंट्रोल रूम में बैठेंगे तो पूरे शहर के हालात की जानकारी मिलती रहेगी.

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क़रीब 12 बजे पुलिस कंट्रोल रूम के फ़ोन की घंटी बजने लगी. शहर के नरोदा, बापूनगर, पालड़ी, वेजलपुर, रानीप जैसे कई इलाक़ों में दंगे शुरू हो चुके थे.
घटनास्थल से लोग पुलिस कंट्रोलरूम से और पुलिस बल भेजने की मांग कर रहे थे. मदद मांगने वालों में गुलबर्ग सोसाइटी के निवासी एहसान ज़ाफरी भी थे.
उनकी सोसाइटी को दंगाइयों ने घेर लिया था. पत्थर और पेट्रोल बम फेंक रहे थे.
कंट्रोल रूम के स्टाफ के पास जितना भी फोर्स था, उसे वे भेजने की कोशिश कर रहा था. लेकिन एक ही घंटे में हालात इतने ख़राब हो गए कि मदद मांगने वालों को पुलिस अपनी लाचारी बताने लगी कि हमारे पास फ़ोर्स ही नहीं है.
कुछ ऐसी ही स्थिति फायर ब्रिगेड की थी. आगजनी की घटनाएं इतनी बड़ी तदाद में होने लगीं कि पानी और दमकल की कमी महसूस होने लगी.
दूसरी ओर गुलबर्ग सोसाइटी के हालात इतने बदतर हो गए थे कि वहां मदद पहुंचाना भी मुश्किल हो गया था.

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शाम के चार बजे स्टेट रिर्जव फोर्स (एसआरपी) की कुछ टुकड़ियां अहमदाबाद पहुंचीं.
सभी टुकड़ियों को शहर के अलग-अलग भागों में भेजा गया. कुछ सीनियर अधिकारी एसआरपी की टुकड़ी को लेकर गुलबर्ग सोसाइटी की ओर निकले.
हम भी उनके पीछे-पीछे हो लिए. पुलिस को कई जगह पर बंद रास्तों को खोलना पड़ा. साढ़े चार बजे जब हम गुलबर्ग सोसाइटी पहुंचे तब गुलबर्ग सोसाइटी की आग बुझ चुकी थी. सिर्फ धुंआ निकल रहा था.
पूरी सोसाइटी में लाशें बिखरी पड़ी थीं. 'गोधरा की ग़लती के कारण' गुलबर्ग सोसायटी में 69 लोगों की जान चली गई. पुलिस और फायर ब्रिगेड के लिए करने जैसा कोई काम वहां बचा ही नहीं था.
हां कुछ लोग धुंआ उठ रहे मकान की छत पर बचने के लिए छुपे हुए थे. उनकी मदद के लिए आई पुलिस से भी उन्हें डर लग रहा था.
पुलिस किसी तरह से उन्हें नीचे ले आई. इन लोगों में एहसान ज़ाफरी की बीवी ज़ाकिया ज़ाफरी भी थीं जिन्हें आज तक इंसाफ़ का इंतज़ार है.
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