जब प्रताप के सामने अकबर को चने चबाने पड़े

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- Author, एम राजीव लोचन, इतिहासकार, पंजाब विश्वविद्यालय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
अकबर को महान कहना चाहिए या फिर महाराणा प्रताप को? यह सवाल सैकड़ों सालों से लोगों को त्रस्त करता आ रहा है. दोनों अपनी जगह महान थे. दोनों के कारण भारत को फ़ायदा हुआ. दोनों से हम आज बहुत कुछ सीख सकते हैं, बशर्ते हमें मालूम हो कि हुआ क्या था.
अगर आप भारत को एक सूत्र में बांधने के काम को महान मानते हैं तो अकबर ने इसके लिए काफ़ी कोशिश की. अगर आप वीरता से आक्रमणकारी को पीछे धकेलने को महान काम मानते हैं तो प्रताप का कोई सानी न था.
अकबर और प्रताप, दोनों के पीछे कई वफ़ादार वीर थे.
अगर अकबर को राजपूत राजाओं का समर्थन मिला हुआ था तो प्रताप को गद्दी पर बैठाने में उसके राज्य के लोगों का हाथ था. वरना, वचन के मुताबिक़ तो प्रताप के छोटे भाई जगमल्ल को गद्दी मिलनी थी.
अकबर हमलावर था. मेवाड़ पर हमला करके उस पर अधिकार जमाना चाह रहा था. राणा प्रताप मेवाड़ का लोकप्रिय शासक था. उन दिनों अकबर भारत पर अपना शासन फैलाने में लगा था. वह भारत को प्रभुत्व-सम्पन्न राष्ट्र बनाना चाह रहा था.
इस काम के लिए उन्होंने कई भारतीय शासकों का समर्थन हासिल कर लिया था. अपने बाप दादा के समय की परंपरा को तोड़कर अपने आप को बादशाह घोषित कर दिया था. जहाँ बाबर और हुमायूँ सुल्तान थे, वहीं अकबर बादशाह था. बादशाह यानी सर्वोपरि राजा. जो किसी ख़लीफ़ा के अधीन नहीं था.
अकबर ने इस्लाम को भी परे कर रखा था. कठमुल्ले उसकी इस हरकत से सख़्त नाराज़ रहते. अकबर को कोसते. पर उनकी कोई न सुनता.

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अकबर ने अपने राज्य के लिए एक नए धर्म के बारे में भी सोच शुरू कर दी थी जो दीन ए इलाही के नाम से जाना जाता था.
दिल्ली के सुल्तानों के समय से चले आ रहे जीतल नाम के सिक्के को भी उसने ख़त्म कर दिया था और भारत की प्राचीन मुद्रा ‘रुपया’ के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया था.
एक तरह से अकबर ने पश्चिम एशिया से अपना संबंध ख़त्म कर दिया था और अपनी जड़ें भारत में जमा लीं थीं.
पर मेवाड़ के राणा, प्रताप सिंह को अकबर की अधीनता स्वीकार न थी. प्रताप के पहले कभी भी मेवाड़ के किसी शासक ने किसी का आधिपत्य नहीं माना था. मेवाड़ था ही इस तरह का.
यहाँ कुछ इलाक़ा ऐसा था जो खेती के हिसाब से बहुत उपजाऊ था, फसल भरपूर होती थी. कुछ इलाक़ा पहाड़ी था जहाँ दुश्मन को रोककर ख़त्म किया जा सकता था.

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सिंध से मालवा और गुजरात से अजमेर-आगरा जाने वाले कारवाँ मेवाड़ से ही गुज़रते थे. उनकी सुरक्षा का इंतज़ाम मेवाड़ का शासक और उसके ठिकानेदार करते. सीधी बात थी, रास्ता जितना निरापद होगा, उतने ही ज़्यादा व्यापारी उसका इस्तेमाल करेंगे और राज्य को उतना ही ज़्यादा फ़ायदा होगा.
आमतौर पर दिल्ली-आगरा, मालवा, अजमेर, गुजरात, सिंध आदि प्रदेशों पर शासन करने वाले मेवाड़ से दोस्ती करना ही श्रेयस्कर समझते थे.
एक बार अकबर ने इन सब पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो उसने मेवाड़ की तरफ़ रुख़ किया. आख़िरकार मेवाड़, अजमेर से गुजरात के रास्ते पर जो पड़ता था.
अकबर ने कई बार दूत भेजकर मेवाड़ को अपने खेमे में मिलाने की कोशिश की. ऐसी दोस्ती जिसमें अकबर को बादशाह मानना पड़े, यह प्रताप को नागवार था. सो हर बार मुग़ल दूत अपना सा मुँह लेकर वापस लौटा.
अंतत: अकबर ने आमेर के राजा मानसिंह के नेतृत्व में फ़ौज भेजकर मेवाड़ पर क़ब्ज़ा करने की ठानी.
प्रताप के साथ कुल 3000 घुड़सवार और कुछ भील तीरंदाज़ थे. हाकिम खाँ सूरी तोपख़ाने का इंचार्ज था.
मुग़ल सेना में 10,000 घुड़सवार, कुछ हाथी और तोपख़ाना था. चार घंटे लड़ाई चलती रही. ऐसा लगता था कोई न जीतेगा.

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इस पर राणा प्रताप ने मानसिंह पर स्वयं हमला किया. इत्तेफ़ाक से हमले में प्रताप का घोड़ा चेतक घायल हो गया. प्रताप को मैदान से हटना पड़ा.
उस समय की परिपाटी के मुताबिक़, सेना प्रमुख के हटते ही लड़ाई ख़त्म हो गई. मुग़ल सेना की जीत हुई. घायल चेतक राणा प्रताप को हल्दीघाटी के पार सुरक्षित स्थान पर ले गया.
यहाँ प्रताप ने भीलों की मदद से फिर फ़ौज खड़ी की और आने वाले वर्षों में मेवाड़ के काफ़ी हिस्से पर फिर से अपना शासन स्थापित कर लिया.
अकबर ने भी यही ठीक समझा कि बेकार में मेवाड़ से झगड़ा मोल लेने से बेहतर है कि बंगाल और दक्कन की तरफ़ रुख किया जाए. मुग़ल बादशाह को धता बताने वाले राणा प्रताप को आने वाले समय में महाराणा की उपाधि से लोगों ने याद रखा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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