कलाम की किताब के विमोचन पर मचा बवाल

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- Author, परगित पी इलायथ
- पदनाम, कोच्चि से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की आख़िरी किताब 'ट्रान्सेन्डेन्स माई स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस विद प्रमुख स्वामीजी' के विमोचन पर किताब की अनुवादक श्रीदेवी एस कार्था को मंच पर आने से रोकने पर विवाद खड़ा हो गया है.
ख़ास बात ये है कि विवाद की वजह भी प्रमुख स्वामीजी (डॉ कलाम के आध्यात्मिक गुरु माने जाने वाले) के प्रतिनिधि हैं.
दरअसल, प्रकाशक करंट बुक्स ने त्रिचूर में शनिवार को किताब का विमोचन कार्यक्रम रखा था.
प्रकाशक ने मलयालम लेखिका श्रीदेवी एस कार्था से कहा था कि वो प्रमुख स्वामीजी के प्रतिनिधि ब्रह्मा विहारी दास स्वामी के साथ मंच साझा न करें.
श्रीदेवी ने डॉ कलाम की किताब का अनुवाद मलयालम में किया है जिसे नाम दिया गया है 'कालतीर्थम'.
सोशल मीडिया पर बवाल

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श्रीदेवी ने कहा, "मैंने प्रकाशक के कहने पर किताब का अनुवाद किया. पहले मैंने सोचा कि प्रकाशक मज़ाक कर रहे हैं. मैंने कार्यक्रम में जाने के लिए टिकटें भी बुक करा ली थीं. लेकिन जब मुझे लगा कि यह निजी मामला नहीं है, बल्कि महिलाओं के लिए अपमानजनक बात है तो मैंने अपनी बात सोशल मीडिया पर डाल दी."
सोशल मीडिया पर लेखिका की पोस्ट आने के बाद उनके समर्थन में आए सामाजिक कार्यकर्ता तीखी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने केरल साहित्य अकादमी के हॉल पहुंचकर स्वामी ब्रह्मा विहारी दास के खिलाफ़ नारेबाज़ी की.
जिसके बाद स्वामी ब्रह्मा विहारी दास को कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर जाना पड़ा.
डॉ कलाम के सह-लेखक अरुण तिवारी भी कार्यक्रम में मौजूद थे.
अजीब शर्तें
श्रीदेवी ने बताया, "प्रमुख स्वामीजी के आश्रम ने विमोचन कार्यक्रम के लिए दो शर्तें रखी थी. पहला, ब्रह्मा विहारी दास स्वामी के साथ मंच पर कोई महिला नहीं होगी और दूसरा, पहली तीन पंक्तियां प्रमुख स्वामी के भक्तों के लिए आरक्षित होंगी."

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हिंदू संगठनों ने इस विवाद को ख़ारिज करते हुए कहा है कि स्वामीजी की मांग पर हंगामा बेकार है.
एक हिंदू संगठन के कार्यकर्ता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा, "स्वामीनारायण संप्रदाय में संत प्रण लेते हैं कि वे कभी महिलाओं से सीधे संपर्क में नहीं आएंगे. प्रमुख स्वामी और उनकी जीवनशैली पर किताब लिखने के बाद भी श्रीदेवी ऐसा कैसे कह सकती हैं?"
वहीं, प्रकाशक का कहना है कि सभी अनुवादकों को किताब के विमोचन के अवसर पर मंच पर बुलाने की कोई परंपरा नहीं है.
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