35 आदिवासी समुदायों के बीच रहने के अनुभव

इमेज स्रोत, Jimmy Nelson Pictures BV
- Author, डेव सेमिनारा एवं एली कॉब
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
ब्रितानी नागरिक 46 वर्षीय जिमी नेल्सन पिछले चार साल से दुनिया के आदिवासियों के बीच घूम रहे हैं और उनकी तस्वीरें खींच रहे हैं.
सालों साल ऐसा करते रहना कैसे संभव है? और क्या इसे कोई करियर कह सकता है?
जिमी का मकसद आदिवासियों की गुरबत या मजबूरी दिखाना नहीं है. वो अपना मकसद आदिवासियों को कमज़ोर नहीं ताकतवर, ग़रीब नहीं ख़ूबसूरत, हाशिए पर नहीं स्वाभिमानी दिखाना मानते हैं.
वो उन विदेशी पर्यटकों या फ़ोटोग्राफ़रों की तरह नहीं हैं जो आदिवासियों की फोटो लेकर उस गांव से पहली बस से बाहर निकल जाते हैं.
जिमी नेल्सन आदिवासियों के बीच वक्त गुजारते हैं, उनकी संस्कृति को समझने का प्रयास करते हैं, उनके रीति-रिवाज़ और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने का काम कर रहे हैं.

जिमी पेशेवर फोटोग्राफ़र हैं और वे अपने विंटेज 4 गुना 5 प्लेट कैमरे के साथ दुनिया भर की यात्रा करके आदिवासी समुदाय की तस्वीर खींचते हैं. ग़ौरतलब है कि इनमें से अधिकतर आदिवासियों को फ़ोटोग्राफ़ी और तस्वीरों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है.
वे अपनी प्रोजेक्ट 'बिफोर दे पास एवे' के लिए आदिवासी समुदाय के लोगों के जीवन और संस्कृति का दस्तावेज तैयार कर रहे हैं.
दुनिया देखने की अजीब शुरुआत
बीबीसी ट्रैवल ने नेल्सन के एमस्टर्डम स्थित उनके घर पर उनसे उनके प्रोजेक्ट के बारे में बातचीत की है.
उन्होंने बताया कि ग्लोबलाइजेशन और समरूपता के इस दौर में जिमी का काम आपको याद दिलाता है कि दुनिया के कई कोनों में लोग सौकड़ों-हज़ारों साल पहले अपने पूर्वज की ही तरह रह रहे हैं.
लेकिन जिमी ने शुरुआत कैसे की? वो बताते हैं कि ये सिलसिला तब शुरू हुआ जब 1984 में वे स्कूल से पास होकर निकले ही थे.
अचानक से उनके सिर के सारे बाल गिर गए. ब्रितानी समाज में उस समय गंजे लोगों को स्किनहेड कहते थे, हिंसक स्वभाव का मानते थे और नापसंद किया करते थे.

जिमी ने सोचा कि क्यों नहीं ऐसी जगह चला जाए जहां लोग उन्हीं के जैसे हों. और 18 साल की उम्र में वे तिब्बत पहुंचे और बौद्ध भिक्षुओं के साथ रहने लगे.
तब तिब्बत 30 साल के बाद दुनिया भर के लिए खुला ही था और इसका पूरा फ़ायदा उठाते हुए पूरा देश देखा.
इस यात्रा ने जिमी के जीवन को बदल दिया. वे कहते हैं, "इस यात्रा ने मुझे कहानी दी. उत्सुकता पैदा की. जो फोटोग्राफ़ मैं लेकर आया था उसे रॉयल ज्योग्राफ़िक सोसायटी की पत्रिका ने प्रकाशित किया."
तिब्बत के बाद, जिमी ने शौकिया तौर पर अगले छह साल फोटोग्राफ़ी की. जिमी कहते हैं, "मैंने ग्वातेमाला, एल साल्वेडोर, अफ़ग़ानिस्तान और सोमालिया के आदिम लोगों की तस्वीरें उतारीं. मैं उत्सुकतावश काम करता जा रहा था."
उन्होंने 24 साल की उम्र में नीदरलैंड्स की आशकियाने होराडेमा से विवाह किया और खर्च बढ़ने पर फोटोग्राफ़ी को ही पेशा बना लिया.

करीब पांच साल पहले डिजिटल फोटोग्राफी का दौर शुरू होने के बाद जिमी को लगा कि हर हाथ में कैमरा होने के कारण, पेशे के तौर पर फोटोग्राफ़ी तो खत्म हो जाएगी, लिहाजा किसी एक क्षेत्र में स्पेशलाइज़ेशन हासिल करनी चाहिए.
इस पर विचार करते हुए जिमी ने उन संस्कृतियों और आदिवासी समुदायों पर काम करने का फ़ैसला किया जो तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं.
ऐसे बस 100 आदिवासी बचे हैं
अपने प्रोजेक्ट के लिए वे 35 अलग अलग आदिवासी समुदाय की संस्कृतियों पर काम कर रहे हैं.
इनमें उत्तरी पूर्वी साइबेरिया की चुकुटका प्रांत के आदिम समुदाय चुकची भी शामिल हैं, जिनकी संख्या अब 100 से भी कम रह गया है. वे एस्कीमो की तरह रहते हैं.
उन्होंने पापुआ न्यू गिनी के चार आदिवासी समुदायों- हुली, असारो, कालाम और गोरोका की संस्कृति को समझने की कोशिश की है.
2010 से 2013 के बीच तीन साल के दौरान, जिमी ने 16 यात्राएं कीं जो महीने से दो महीने तक की थीं. हर यात्रा अलग थी.
चुकची समुदाय के लोगों को तलाशने में ही जिमी को डेढ़ महीने का वक्त लग गया. अब इस समुदाय के 80 लोग ही बचे हैं जो फ्रांस जितने क्षेत्रफल वाली जगह पर रहते हैं जहाँ कोई सड़क नहीं है.

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इथियोपिया के कारो समुदाय के लोगों तक पहुंचने के लिए जिमी को आदीस अबाबा से तीन दिन तक लगातार यात्रा करनी पड़ी. अमेजन को उन्होंने नाव से पार किया. पापुआ न्यू गिनी और हिमालय के क्षेत्रों में उन्होंने पैदल यात्रा की थी.
संवाद करने की मुश्किल
समुदाय की पहचान करना और वहां तक पहुंचना तो समझ में आता है लेकिन ऐसे समुदाय से संवाद स्थापित करना वाकई में मुश्किल चुनौती है.
इस पर जिमी नेल्सन कहते हैं, "80 फ़ीसदी बार तो हमारी भाषाएं मेल नहीं खातीं, इसलिए दुभाषिया की तलाश की जाती है. लेकिन आदिवासी समुदाय के लोगों की भाषाओं को कई बार दुभाषिए भी नहीं जानते हैं. ऐसे में मुझे ख़ुद अपनी बात रखने की कोशिश करनी पड़ती है."
यह इतना आसान भी नहीं था. चुकची समुदाय के लोगों की पहली तस्वीर लेने में जिमी को तीन सप्ताह लग गए. आदिवासी ख़ुद भी चाहते थे कि वे पहले उनके रहन-सहन और जीवनशैली को अच्छी तरह जान लें. वहां कड़ाके की ठंड थी और लोगों और हालात को समझने के लिए उन्हें समय लगा.

लेकिन जिमी की ख़ास बात ये है कि वे डिज़िटल कैमरे का इस्तेमाल नहीं करते हैं. उनके मुताबिक डिज़िटल फोटोग्राफी प्लास्टिक फोटोग्राफ़ी है, लेकिन प्लेट कैमरे से आप फ़िल्म तैयार करते हैं और अपने अंदाज़ से ग्रेनी तस्वीर बनाते हैं जो असलियत के ज़्यादा करीब महसूस होती है.
जिमी ये भी बताते हैं कि उन्होंने कभी तस्वीर लेने के लिए किसी आदिवासी को पैसे नहीं दिए. ये ज़रूर था कि वे आदिवासियों को भेंट के तौर पर बकरियां, भेड़ें इत्यादि ज़रूर देते हैं.
बिफ़ोर दे पास अवे
इथियोपिया के ओमो वैली के आदिवासियों को फोटोग्राफ़ी और मुद्रा के बारे में मालूम था लेकिन काफी वक्त बिताने के बाद वे भी बिना पैसों के तस्वीर खिंचाने के लिए तैयार हो गए.
ऑस्ट्रेलिया के आदिम समुदाय के लोग कैमरे और मीडिया के लोगों के प्रति आक्रोश से पेश पाते हैं, उनकी तस्वीरें जिमी नेल्सन नहीं ले पाए.
इन समुदायों की फोटोग्राफ पर आधारित जिमी की पुस्तक 'बिफोर दे पास अवे' प्रकाशित हो चुकी है.
इस साल जिमी नेल्सन जिन समुदायों से मिल चुके हैं, उनके पास एक बार फिर जाएँगे ताकि वे बनी हुई तस्वीरें उन्हें दिखा सकें और तोहफ़े के तौर पर उन्हें वो दे सकें.
तो इतना घूमने फिरने और अलग तरह के लोगों की बीच रहने के बाद जिमी ने क्या सीखा? जिमी कहते हैं कि विकसित दुनिया में लोग बीते हुए समय और भविष्य में रहते हैं, वर्तमान में जीनी भूल जाते हैं. दूसरी तरफ़ आदिवासी लोग वर्तमान में, हर क्षण को जीते हैं.
<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/travel/bespoke/story/20150326-travel-pioneers/jimmy-nelson/index.html" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी ट्रैवल</caption><url href="http://www.bbc.com/travel" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>
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