मोदी के दावों और सच्चाई के बीच के फासले

यूएई में नरेंद्र मोदी

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के दौरे पर गए और वो 34 सालों में वहां का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं.

यूएई ने भारत में 75 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की. मोदी के इस दौरे को कामयाब कहा गया.

मोदी ने ख़ुद कहा कि उनकी सरकार इन 34 सालों के खोए हुए समय की भरपाई करना चाहती है. भारतीय मीडिया और टीम मोदी ने 75 अरब डॉलर के निवेश पर ख़ूब धूम मचाई.

और यही समस्या है प्रधानमंत्री की विदेशी यात्राओं के दौरान विशाल घोषणाओं की. ये ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा चढ़ा कर पेश करने और प्रचार की गूंजती आवाज़ों तले दब जाती हैं.

<link type="page"><caption> पढ़िए: पिछले साल मोदी ने क्या कहा था</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2014/08/140815_zubair_modi_speech_analysis_du" platform="highweb"/></link>

पढ़ें विस्तार से

नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा

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अंग्रेज़ी में एक कहावत है: 'डेविल्स आर इन डिटेल्स'. हमें इस विशाल निवेश का विवरण नहीं दिया गया. हमें नहीं मालूम कि कितने सालों में ये राशि भारत आएगी और निवेशकों की शर्तें क्या होंगी.

प्रधानमंत्री ने अपने पहले 12 महीनों के कार्यकाल में 18 देशों का दौरा किया.

इन देशों की सरकारों और निजी कंपनियों ने भारत में लगभग 100 अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया जिनमें जापान के 35 अरब डॉलर और चीन के 20 अरब डॉलर निवेश करने के वादे शामिल थे.

लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में सरकार ने कहा कि अब तक 12 देशों से लगभग 20 अरब डॉलर भारत में निवेश किया जा चुका है.

मोदी के आलोचक कहेंगे कि अत्यधिक प्रचार और हंगामे के बावजूद उनकी विदेश यात्राओं ने एक साल में केवल 20 अरब डॉलर बटोरा है, जबकि वादा था 100 अरब डॉलर का.

उनके समर्थकों का तर्क ये होगा कि विदेशी निवेशक एक बार में पूरी पूँजी निवेश नहीं करता.

निवेश की हक़ीकत

मोदी यात्रा से निवेश

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मिसाल के तौर पर जापान ने 35 अरब डॉलर का निवेश अगले पांच साल में करने का एलान किया है.

लेकिन प्रधानमंत्री के विदेश दौरों का मुख्या लक्ष्य है विदेशी निवेशकों को भारत में भारी निवेश के लिए प्रेरित करना.

इस तराज़ू में उन्हें तौला जाए, तो प्रचार के मुक़ाबले अभी तक का निवेश फीका रहा है. यही स्वरूप उनके गुजरात के ज़माने में भी नज़र आता था.

शायद यही गुजरात मॉडल है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व, उनका लक्ष्य और उनके काम करने के अंदाज़ में कोई अधिक फ़र्क़ नहीं है.

गुजरात मॉडल

गुजरात में निवेश

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अगर गुजरात के मुख्यमंत्री की हैसियत से उनका फोकस राज्य में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना था तो प्रधानमंत्री के रूप में भी देश के अंदर विदेशी डॉलर का निवेश उनका मुख्य लक्ष्य नज़र आता है.

गुजरात में निवेश के लिए वो हर दो साल पर 'वाइब्रेंट गुजरात' के नाम से निवेशकों का विशाल मेला लगवाते थे.

भारतीय और विदेशी निवेशक भारी संख्या में इसमें शामिल होते थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद वो विदेशी निवेशकों के देशों में खुद लम्बी यात्राएं करने जाते हैं और उनसे भारत में निवेश करने को कहते हैं.

वो पहले गुजरात को निवेशकों के लिए पैकेज करते थे, अब भारत को करते हैं.

गुजरात में समझौता के ज्ञापन या मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) की राशि के एलान पर उन्हें वाहवाही मिलती थी, लेकिन बाद में पता चलता था कि इसका एक छोटा भाग ही निवेश में बदल पाया.

सच

वाइब्रेंट गुजरात

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वाइब्रेंट गुजरात सम्मलेन 2013 में मोदी का कहना था कि गुजरात भारत में विदेशी निवेश का गेटवे बन गया है.

2011 में हुए वाइब्रेंट गुजरात सम्मलेन के दौरान एलान किया गया कि एमओयू की राशि 20 लाख करोड़ रुपए से अधिक है, मगर इसका केवल 8 प्रतिशत निवेश राज्य में आ सका.

इसी तरह से केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, साल 2000-2013 के बीच गुजरात में 39 हज़ार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश हुआ जो देश में आए विदेशी निवेशों का कुल 4 प्रतिशत हिस्सा था.

महाराष्ट्र, दिल्ली और तमिलनाडु के बाद गुजरात चौथे नंबर पर था.

अनिल अंबानी

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वाइब्रेंट गुजरात के कारण मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी निवेशकों के मसीहा बन गए थे.

उद्योगपति अनिल अम्बानी ने उनके बारे में कहा था, "वो बादशाहों के बादशाह हैं."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्योगपतियों की नज़रों में अब पहले से भी बड़े मसीहा बन गए हैं.

लेकिन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार और हक़ीकत के बीच के फासले अब तक कम होते नज़र नहीं आते.

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