हम जो पहनते हैं उससे क्यों आंके जाते हैं?

जीन्स

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    • Author, प्रगति सक्सेना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

एक कॉलेज के निदेशक के तौर पर जब मैं पहली बार जींस पहन कर दफ़्तर पहुंची तो मेरी सहयोगी ने मुझे याद दिलाया कि मेरी मीटिंग यूनिवर्सिटी के कुछ वरिष्ठ लोगों से होने वाली है. मुझे जींस पहन कर नहीं आना चाहिए था. ‘साड़ी एक बेहतर च़ॉइस होती.’

उन्होंने कहा तो मीटिंग के बाद फैकल्टी कक्ष में ये बहस का मुद्दा हो गया कि हमें आखिर क्या पहनना चाहिए. मेरे कुछ सहयोगियों का मत था कि साड़ी पहनने से व्यक्तित्व में गंभीरता आ जाती है.

मैं इस बात पर राज़ी थी कि औपचारिक मौकों पर औपचारिक परिधान माहौल के अनुकूल होता है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को बाध्य नहीं होना चाहिए औपचारिक परिधान पहनने के लिए. आख़िर ये हमारा मूलभूत अधिकार है.

मैं अपनी बात पर अड़ी रही. हालांकि कई मौकों पर मुझे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ये एहसास दिलाया गया कि चूंकि मैं जींस या स्कर्ट पहने हूँ इसलिए मुझे परंपरा, इतिहास या राजनीति की कोई जानकारी नहीं. ज़्यादा से ज़्यादा मैं एक आकर्षक महिला हो सकती हूँ.

ज़िम्मेदार

स्मिता सभरवाल

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इमेज कैप्शन, तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय में अतिरिक्त सचिव स्मिता सब्बरवाल के पहनावे पर एक पत्रिका ने टिप्पणी की थी.

वर्षों बाद आज फिर ये वाकया याद आया. जब एक नौजवान महिला आईएएस अधिकारी एक मुख्यमंत्री के दफ्तर में सुरुचिपूर्ण परिधान पहन कर दफ़्तर जाने लगी. और ये बात ख़बर बन गई.

फिर ये सवाल आया कि क्या सुंदर या आकर्षक दिखने से आपके पद की गंभीरता पर फ़र्क पड़ता है? क्या आप सुंदर दिखते हैं तो ये मान लिया जाए कि आप गंभीर और ज़िम्मेदार काम नहीं कर सकते?

हमारी दिक्कत ये है कि हमने अपने सारे जीवन और वर्गों को खांचों में बांट लिया है. राजनीति में जो होगा वो खादी ही पहनेगा.

एक व्यक्ति अगर कमीज़ पैंट पहन कर घूमता है तो उसे पहली नज़र में ख़ारिज कर देना हमारी आदत हो गई है.

प्रशासन में आप अगर हैं तो आपको गंभीर दिखना चाहिए, आंखों पर चश्मा हो तो और भी अच्छा और नाक नक्श उन्नीस हों तो वाह, क्य़ा बात है.

मानसिकता

स्कर्ट

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अगर आप फ़ैशनेबल वस्त्र पहने हैं तो पहले ही मान लिया जाएगा कि विचार के स्तर पर आप खाली हैं और प्रशासनिक सख़्ती तो आपमें बिल्कुल नहीं.

अगर आप शिक्षक हैं तो आपको पैंट नहीं पहनना चाहिए, स्कर्ट तो बिल्कुल नहीं, जींस भी सूट नहीं करेगी, आप सिर्फ साड़ी, सलवार कमीज़ ही पहन सकती हैं. पुरुषों के लिए सिर्फ पैंट कमीज़ ही रिकमेंड की जाती है.

तकनीकी विकास और बाज़ार के बढ़ते असर के नतीजतन हमारे रिश्तों के समीकरण बदल रहे हैं, व्यावसायिक चौखटे टूट रहे हैं, नए बन रहे हैं.

लेकिन इसके साथ जिस रचनात्मकता, उदारता और मौलिकता को प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ.

उसके उलट ‘हम जो दिखता है, वही बिकता है’ वाली मानसिकता के शिकार बन रहे हैं.

पोशाक और विचार

साड़ी

यानी विचार के स्तर पर आपको आपके परिधान और शक्लोसूरत के आधार पर ही आंका जाएगा. ये सिर्फ महिलाओं की समस्या नहीं है.

एक समाज के तौर पर हम ऊपरी चीज़ों और बातों से इतना प्रभावित हैं कि विचार के स्तर तक पहुंचने से पहले ही पूर्वग्रहों से ग्रसित हो जाते हैं.

दुखद ये है कि तथाकथित तौर पर बुद्धिजीवी समाज भी उपभोक्तावाद की इस रौ से अछूता नहीं रहा है. सुरुचिपूर्ण परिधान पहनना पुरुष या स्त्री आधारित नहीं है.

ये हमारे सौंदर्यबोध को अभिव्यक्त करता है. अगर एक व्यक्ति सुरुचिपूर्ण कपड़े पहनता है तो उसके सौंदर्यबोध की तारीफ़ करनी चाहिए.

उसके कपड़े उसके व्यक्तित्व की एक हल्की सी झलक देते हैं उसके पूरी शख़्सियत को परिभाषित नहीं करते.

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