रेस में रघुबर के अव्वल आने के असल कारण

इमेज स्रोत, PTI
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
झारखंड में भाजपा विधायक दल ने नए मुख्यमंत्री के रूप में रघुबर दास के नाम पर मुहर लगा दी है. वे राज्य के पहले ग़ैर आदिवासी मुख्यमंत्री होंगे.
झारखंड में आदिवासी बनाम गैर आदिवासी मुख्यमंत्री की जद्दोजहद राज्य के गठन के समय से जारी है.
मगर राज्य पर सबसे ज़्यादा शासन करने वाली भाजपा इससे पहले कभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि वह किसी गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बना सके.
इस बार भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद ऐसा करने का रास्ता साफ़ हुआ. तो क्या कारण रहे रघुबर दास के इस पद तक पहुँचने के?
पढ़ें पूरा विश्लेषण
झारखंड में आदिवासी मुख्यमंत्री की परंपरा भाजपा ने ही शुरू की थी जब नवंबर 2000 में बिहार का दक्षिणी इलाक़ा काटकर अलग झारखंड राज्य बना.
हालांकि उस वक़्त पार्टी के झारखंड में कई बड़े नेता हुआ करते थे जैसे करिया मुंडा, मृगेंद्र प्रताप सिंह, प्रोफ़ेसर निर्मल कुमार चटर्जी आदि.
पार्टी में तब भी कई गैर आदिवासी चेहरे थे, जिन्होंने अलग झारखंड राज्य या यूं कहें कि अलग 'वनांचल राज्य' के लिए आंदोलन किया.
इन चेहरों में एक रघुबर दास भी थे.
14 साल

नए राज्य के गठन के वक़्त भाजपा को लगा था कि आदिवासी मुख्यमंत्री होगा तो आदिवासियों के बीच उसकी गहरी साख जमेगी क्योंकि नए राज्य की क़रीब एक चौथाई आबादी आदिवासियों की थी.
हालांकि अलग राज्य के गठन के आंदोलन में बाबूलाल मरांडी का कभी कोई बड़ा योगदान नहीं रहा क्योंकि वह संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे.
मगर दिग्गजों को दरकिनार कर भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनाना बेहतर समझा.
तब मरांडी विधायक नहीं, लोकसभा सदस्य थे.
चूंकि यह धारणा रही कि झारखंड का गठन यहां के आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखकर किया गया था, इसलिए आदिवासी मुख्यमंत्री की लगभग परंपरा बन गई.
गठबंधन सरकार

इमेज स्रोत, RAGHUBAR DAS FB
झारखंड के हिस्से में बिहार की 81 विधानसभा सीटें आईं थीं. इस राज्य में किसी राजनीतिक दल या गठबंधन को कभी पूर्ण बहुमत नहीं मिला और सरकार चलाने के लिए निर्दलीय सदस्यों का ही सहारा लेना पड़ा.
जब कुछ सत्ताधारी निर्दलीय विधायकों ने मरांडी के खिलाफ बग़ावत की तो पार्टी ने उन्हें हटाकर एक अन्य आदिवासी अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बना दिया.
तब से अर्जुन मुंडा ही भाजपा के आदिवासी नेताओं का चेहरा बने रहे.
चूंकि पूर्ण बहुमत वाली सरकार नहीं बन पा रही थी इसलिए एक बार तो कांग्रेस ने भी एक निर्दलीय आदिवासी विधायक मधु कोड़ा को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवा दिया.
हाशिए पर आदिवासी

इमेज स्रोत, Neeraj Sinha
मगर यह धारणा आम थी कि 14 साल के झारखंड में नौ बार मुख्यमंत्री बने नेताओं ने आदिवासी समाज के लिए कुछ नहीं किया.
इत्तेफ़ाक से झारखंड में सबसे ज़्यादा शासन भी भाजपा ने ही किया.
मगर सरकारों पर आरोप लगे कि उन्होंने पांचवीं अनुसूची के इलाक़ों पर कभी ध्यान नहीं दिया और राज्य में आदिवासियों की जनसंख्या लगातार घटती चली गई.
बड़े पैमाने पर आदिवासियों का पलायन भी शुरू हो गया.
राज्य गठन के कुछ ही सालों में आदिवासी 25 फ़ीसदी से घटकर 22 तक आ गए.
गैर आदिवासी मुख्यमंत्री

इमेज स्रोत, BBC
माना जाने लगा कि ग़ैर आदिवासी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ही चीज़ें बेहतर हो सकती हैं.
इसकी मांग भाजपा के अंदर से होनी शुरू हो गई और इसका पहला परचम बुलंद किया वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने.
मगर पार्टी को लगा कि कहीं इससे उसे आदिवासी बहुल इलाकों में नुक़सान न हो जाए.
2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने मुख्यमंत्री के लिए कोई चेहरा पेश नहीं किया और चुनाव नरेंद्र मोदी के भरोसे लड़ा. स्थानीय स्तर पर संगठन के पास बड़े मुद्दे नहीं थे.
पूर्ण बहुमत

इमेज स्रोत, RAGHUBAR DAS FB
ये चुनाव झारखंड के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण थे कि पहली बार किसी राजनीतिक दल या गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला.
दूसरे कई धुरंधर इस समर में डूब गए या यूं कहें कि उनकी करारी हार हुई.
बाबूलाल मरांडी के अलावा, हेमंत सोरेन को एक सीट पर हारना पड़ा. वहीं ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष सुदेश महतो को भी हार का मुंह देखना पड़ा.
सबसे बड़ा झटका पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की हार के बाद लगा.

इमेज स्रोत, RAGHUBAR DAS FB
पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद अब पहली बार भाजपा को लगा है कि वो नया प्रयोग करने की स्थिति में है.
रघुबर दास
विश्लेषकों को लगता है कि अगर अर्जुन मुंडा जीत गए होते, तो शायद भाजपा आदिवासी मुख्यमंत्री की परंपरा को ही आगे बढ़ाती.
जहां तक अनुभव का सवाल है तो रघुबर दास इलाक़े में संगठन को स्थापित करने वालों में रहे हैं. वह भी तब, जब यहां पार्टी का कोई नामलेवा नहीं था.

दास 1995 से विधायक रहे हैं और उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1977 में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से की थी. वह झारखंड के उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं.
संगठन ने रघुबर दास के राजनीतिक क़द को विधानसभा चुनावों से पहले ही ऊंचा करने का काम शुरु कर दिया था.
उन्हें अमित शाह की नई टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया.
मगर पार्टी के भीतर कुछ लोगों को लगता है कि असल में अर्जुन मुंडा की हार से ही निकली है रघुबर दास की जीत.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












