'लड़की हैं, इसलिए इतनी पाबंदियां हैं'

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- Author, स्नातक अंतिम वर्ष की एक छात्रा
- पदनाम, मगध महिला कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय
कॉलेज हॉस्टल के कई मतलब होते हैं. आज़ादी, रैगिंग, घरवालों की यादें, रूमानियत, अनुशासन और कुछ बंदिशें भी.
हां, ये भी मायने रखता है कि हॉस्टल लड़कों का है या फिर लड़कियों का. अगर बात लड़कियों की हो तो कई चीजें मुश्किल हो जाती हैं.
लड़कियों के हॉस्टल में अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लड़कों जैसी नहीं होती और उनकी जरूरतें भी अलग होती हैं.
सुरक्षा के नाम पर लड़कियों को उन बंदिशों का सामना करना पड़ता है जो कई बार तो काल्पनिक लगती हैं.
पढ़ें, कॉलेज हॉस्टल पर बीबीसी हिंदी सिरीज़ की तीसरी कड़ी

बात 2013 की है तब मैं ग्रेजुएशन में दूसरे साल की छात्रा थी. एक शाम लगभग पांच बजे मैं एटीएम से पैसे निकालने कॉलेज हॉस्टल से बाहर निकली.
लौटते वक़्त मैंने देखा कि कुछ लड़के मेरा पीछा कर रहे हैं. साथ में न तो फ़ोन था और न ही कोई सहेली.
मैं बहुत डर गई. मैंने खुद को कभी इतना असुरक्षित महसूस नहीं किया था. लेकिन धैर्य बनाए रखते हुए मैंने रास्ते में पड़नी वाली एक दुकान पर कुछ देर रुकना उचित समझा.
कुछ देर के बाद जब लड़के नज़र नहीं आए तो मैं हिम्मत कर तेज़ कदमों से कॉलेज हॉस्टल लौटी. इस घटना का काफ़ी मानसिक असर मुझ पर पड़ा.
मोबाइल फ़ोन की इजाज़त नहीं

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दरअसल, मेरे कॉलेज में लड़कियां कॉलेज या छात्रावास में फ़ोन नहीं रख सकती हैं. दाखिला लेते वक़्त हमें बताया गया था कि ऐसा कॉलेज प्रिंसिपल के आदेश से है.
मोबाइल फ़ोन नहीं रख पाने के कारण हम लड़कियां ज़रूरी बातचीत और संपर्क नहीं कर पाती हैं. नतीजनत हम हर रोज़ परेशानी का सामना करते हैं.
हमारी परेशानी तब और बढ़ जाती है जब पटना से अपने घर तक आने-जाने की लगभग चार-पांच घंटे तक की यात्रा हमें अकेले बिना मोबाइल फ़ोन के करनी पड़ती है.
एक तो हॉस्टल या कॉलेज में मोबाइल फ़ोन रखने की इजाजत नहीं है, दूसरे हॉस्टल प्रबंधन ने लैंडलाइन की कोई सुविधा भी नहीं दी है.
ऐसे में कॉलेज कैंपस में स्थित साइबर कैफ़े का टेलीफ़ोन बूथ ही एकमात्र सहारा है.
इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी प्रतिबंधित

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मोबाइल ही नहीं, हमें लैपटॉप, टैबलेट जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण रखने की भी इजाजत नहीं है.
पटना विश्वविद्यालय के लड़कों के हॉस्टल में मोबाइल फ़ोन सहित इलेक्ट्रॉनिक उपकरण रखने की छूट है.
ऐसे में मुझे अक्सर लगता है कि सिर्फ़ लड़की होने के कारण ही हम पर इतनी पाबंदियों लगाई गई हैं.
इस कारण आज के जमाने में भी हम इंटरनेट आधारित सूचनाओं और ज्ञान से लगभग दूर ही रहते हैं.
ऐसे में हमारी पढ़ाई और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी बहुत प्रभावित होती है.
अख़बारों से जो जानकारी मिलती है, उसके सहारे हमारी सभी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं.
इंटरनेट की ज़रूरत

हालाँकि कॉलेज कैंपस में साइबर कैफ़े है. लेकिन यह छुट्टी के दिनों को छोड़कर सुबह दस से पांच के बीच ही खुलता है और उस समय ही हमारी क्लासेस भी होती हैं.
ऐसे में हमारी सभी ज़रूरतें साइबर कैफ़े से पूरी नहीं हो पाती हैं. साथ ही कैंपस का कैफ़े बाहर के मुक़ाबले महंगा भी है.
हमें ख़रीदारी करने के लिए महीने में बस दो दिन बाहर निकलने का मौका मिलता है. इसके अलावा ज़रूरत पड़ने पर गार्जियन को बुलाकर साथ जाने को कहा जाता है.
लेकिन फ़ोन पर आसान संपर्क नहीं होने के कारण और गार्जियन के दूसरे शहरों में रहने के कारण ऐसा भी अक्सर संभव नहीं हो पाता.
पढ़ाई की सभी ज़रूरतें कॉलेज की कक्षाओं और खुद पढ़ने भर से पूरी नहीं हो पाती हैं. ऐसे में हमें भी ट्यूशन या फिर कोंचिंग क्लास का सहारा लेने की भी ज़रूरत पड़ती है.
लड़की होने के कारण

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हॉस्टल का टाइम-टेबल भी मौसम के अनुसार बदलता रहता है. ऐसे में मुझे दो बार कोचिंग क्लास में दाखिला लेने का मौका नहीं मिल पाया, क्योंकि कोचिंग क्लास का समय हॉस्टल के टाइम-टेबल के अनुसार नहीं था.
पटना विश्वविद्यालय के लड़कों के हॉस्टल में बाहर आने-जाने पर भी हमारे जैसा प्रतिबंध नहीं है.
ऐसे में मुझे अक्सर लगता है कि सिर्फ़ लड़की होने के कारण ही हम पर इतनी पाबंदियों लगाई गई हैं.
(पटना विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कॉलेज मगध महिला कॉलेज की स्नातक अंतिम वर्ष की छात्रा की हॉस्टल जीवन की कहानी, उन्हीं की जुबानी)
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