मोदी के नए सिपाही: भूल सुधार की कोशिश?

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- Author, सिद्धार्थ वरदराजन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अपने मंत्रिमंडल में 21 नए चेहरों को शामिल करके नरेंद्र मोदी ने अपनी ग़लती सुधारने की कोशिश की है.
उनकी सोच कि भारत जैसे जटिल और विशाल देश को महज़ 44 मंत्रियों के सहारे चलाया जा सकता है एक भूल साबित हुई.
इसे हम उनका ग़लत अनुमान भी कह सकते हैं या उनका दंभ जो मोदी के तत्काल परिणाम हासिल करने की तमन्ना का ही बायप्रोडक्ट है.
सत्ता संभालने के पहले दिन से ही मोदी का मंत्र था 'लेस गवर्नमेंट, मोर गवर्नेंस', लेकिन घोषणाओं के अलावा ज़मीनी स्तर पर कुछ होता हुआ नज़र नहीं आ रहा है.
भूल सुधार?

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ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार के अलावा सरकार के पास कोई और रास्ता नहीं था.
तमाम प्रयासों के बावजूद नरेंद्र मोदी को वे परिणाम हासिल नहीं हो रहे हैं. जो लंबे-चौड़े वायदे उन्होंने लोगों से चुनाव प्रचार के दौरान किए थे, उसे वह पूरा नहीं कर पा रहे हैं.
प्रधानमंत्री को अपनी इस कमी का अहसास पद संभालने के पहले महीने के दौरान ही हो गया था.
ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को खोजना आसान नहीं है जो विकास के साथ-साथ हिंदुत्व की विचारधारा में भी यक़ीन रखते हों और मोदी के एजेंडे को लागू करने के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हों.
सक्षम लोगों की कमी

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भारतीय जनता पार्टी में सक्षम लोगों की कमी है इस बात का अहसास इसी बात से हो जाता है कि उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री (मनोहर पर्रिकर), दूसरी पार्टी से आए नेताओं (सुरेश प्रभु और चौधरी बीरेंद्र सिंह) और एक आरएसएस प्रचारक (जेपी नड्डा) को मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा.
एक और जनाब हैं गिरिराज सिंह, जिन्हें मंत्री बनाया गया. चुनाव प्रचार के दौरान उनके विवादित बयान की वजह से उन्हें मोदी की डांट भी झेलनी पड़ी थी.
गिरिराज ने कहा था, "जिन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए."
गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ अघोषित संपत्ति के एक मामले की जांच चल रही है. (उनके पटना स्थित आवास से चोरी कर भाग रहे एक चोर के पास से एक करोड़ रुपए की रकम बरामद हुई थी)
इसके अलावा सुरेश प्रभु, आदर्श हाउसिंग सोसायटी में एक फ़्लैट के आवंटन को लेकर कटघरे में हैं.
चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने ज़बरदस्त तरीके से इस घोटाले को अपने प्रचार अभियान का हिस्सा बनाया था.
छवि सुधरेगी

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हालांकि मनोहर पर्रिकर और सुरेश प्रभु की एक कुशल प्रशासक के तौर पर छवि बेदाग़ है और इससे मोदी मंत्रिमंडल में विशेषज्ञ मंत्रियों की कमी वाली इमेज सुधारने में मदद मिलेगी.
मोदी का जो शुरुआती मंत्रिमंडल था उसमें तकनीकी रूप से निपुण लोगों की सख्त कमी थी.
वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके सुरेश प्रभु तब से ही ऊर्जा और कोयला क्षेत्र में सुधारों के समर्थक थे. उन्होंने नदियों को जोड़ने के लिए गठित टास्क फ़ोर्स की एक रिपोर्ट भी तैयार की थी.
ये विवादित योजना मोदी के दीर्घकालीन एजेंडे का हिस्सा है.

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मनोहर पर्रिकर के रूप में भारत को आख़िरकार एक पूर्णकालीन रक्षा मंत्री मिल ही गया.
लेकिन इसमें पांच महीने का जो वक़्त लगा वो दिखाता है कि इस पद को लेकर बीजेपी के आलाकमान और आरएसएस में मतभेद थे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क़रीबी जेपी नड्डा का शामिल होना दिखाता है कि आरएसएस से जुड़े होना मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए अयोग्यता कतई नहीं है.
मीडिया में ये बात ख़ासी प्रचारित हुई थी कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पूर्व मुख्य सतर्कता अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को हटाने में नड्डा का अहम रोल था.
शिवसेना से दूरी

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लेकिन राजनीतिक रूप से रविवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार की सबसे बड़ी ख़बर तो सुरेश प्रभु का मंत्री बनना ही थी.
महाराष्ट्र के ताज़ा तरीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के शपथ ग्रहण समारोह में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की मौजूदगी से ये संकेत गया था कि दोनों पार्टियां नए फ़ॉर्मूले के तहत साथ आने को तैयार हो गई हैं और मोदी कैबिनेट में शिवसेना की ज़्यादा मौजूदगी नज़र आएगी.
लेकिन ऐसा कतई नहीं हुआ. उलटे शिवसेना से इस्तीफ़ा देकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए प्रभु को अहम मंत्रालय (रेल) देना ठाकरे के सम्मान को और 'ठेस' पहुंचाने जैसा है.
महाराष्ट्र में फड़नवीस सरकार की स्थिति राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बिना शर्त समर्थन से और मज़बूत हो गई है. हालांकि दीर्घकालीन तौर पर ये समर्थन टिकाऊ नहीं नज़र आता.
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