सदानंद और अंशा की उम्मीदें पूरी कर पाएँगे मोदी?

इमेज स्रोत, AP

    • Author, मुकेश शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाराणसी से

आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाने वाले नरेंद्र मोदी की ‘युवाओं में अपील’ की इस पूरे चुनाव के दौरान काफ़ी चर्चा रही.

ये चर्चा इसलिए भी उल्लेखनीय थी क्योंकि उनके मुक़ाबले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ज़्यादा युवा हैं. शुरुआत में विश्लेषकों को लगा था कि मोदी के मुक़ाबले शायद राहुल युवाओं से बेहतर ‘कनेक्ट’ स्थापित कर सकें.

मगर युवाओं के एक बड़े वर्ग को विकास का मोदी का सपना और अब तक गुजरात में काम का उनका ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ ज़्यादा पसंद आया.

मुझे रह-रहकर बनारस का वो दृश्य याद आता है जहाँ मेरे सामने से एक के पीछे एक चार मोटर साइकिल फ़र्राटे से गुज़री थीं. उनमें से हर मोटर साइकिल पर तीन-तीन युवा सवार थे. उनके हाथों में भाजपा के झंडे थे और वे ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ का नारा लगाते, हॉर्न बजाते जा रहे थे.

उम्मीदों की चुनौती

उनका जुनून अलग क़िस्म का था. ऐसे जुनूनी युवाओं से लेकर सिर्फ़ अपने करियर पर ध्यान देने वाले युवाओं तक- इस वर्ग की उम्मीदें बहुत तरह की हैं.

ये वो वर्ग है जिसके बड़े हिस्से ने अपना समर्थन सोशल मीडिया से लेकर मतपेटियों तक मोदी को दिया है और ये वर्ग ऐतिहासिक रूप से कम से कम अपने धैर्य के लिए तो नहीं जाना जाता. यानी मोदी को युवाओं के लिए ख़ास कार्यक्रमों पर ध्यान देना होगा.

sadanand

इमेज स्रोत, bbc

इमेज कैप्शन, बिहार के सदानंद झा बेरोज़गारी से परेशान दिखे.

बिहार में मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय में आयोजित बीबीसी कैंपस हैंगआउट कार्यक्रम में एक छात्र सदानंद झा ने बेहद पैने अंदाज़ में एक सवाल उछाला था, "बिहार में बेरोज़गारी है. यहाँ ज़मीन तो अच्छी है मगर मैं क्या मिट्टी खाऊँगा? मिट्टी में उपजाने के लिए पानी चाहिए, खाद चाहिए. यहाँ सिंचाई की व्यवस्था नहीं है, उद्योग-धंधे नहीं हैं तो क्या हम मिट्टी खाकर ज़िंदा रहेंगे?"

बिहार की माँगें

उसी विश्वविद्यालय की अनु सिंह ने बेहिचक माना था कि अगर उन्हें अपने राज्य में बेहतरीन विकल्प नहीं मिले तो वह अवसर की तलाश में दूसरी जगह जाने में बिल्कुल नहीं हिचकेंगी.

इस बिहार राज्य ने मोदी के नेतृत्त्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को 40 लोकसभा सीटों में से 31 सीटें दी हैं. उनकी इस लहर ने राज्य की राजनीति में भी उथल-पुथल मचा दी है.

ऐसे में मोदी को सदानंद और अनु जैसे युवाओं की उम्मीदों को समझना होगा. कैंपस हैंगआउट में शामिल छात्र-छात्राओं ने ये बात तो मानी थी कि नीतीश कुमार की अगुवाई में राज्य में बुनियादी ढाँचा सुधरा है मगर उन युवाओं की विकास की सोच की उड़ान ऊँची है. क्या नरेंद्र मोदी उन युवाओं की उम्मीद पर खरे उतर पाएँगे?

बिहार से विशेष राज्य के दर्जे की माँग उठती रही है, क्या मोदी सरकार उस माँग को राजनीति का चश्मा उतारकर देख सकेगी?

शिक्षा की बेहतर सुविधाएँ, रोज़गार के बेहतर अवसर और कृषि के बेहतर संसाधन- ये सिर्फ़ बिहार के ही नहीं बहुतेरे राज्यों के युवाओं की उम्मीद है. इस उम्मीद पर खरा उतरना आसान नहीं होने वाला.

सांसद की ज़िम्मेदारी

वह उत्तर प्रदेश की जिस वाराणसी सीट से सांसद चुने गए हैं वहाँ की उम्मीदें भी उनसे काफ़ी हैं.

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित बीबीसी कैंपस हैंगआउट में शामिल अंशा को इस चुनाव से बनारस के लिए ज़्यादा उम्मीद नहीं थी. उन्होंने कहा था, "बनारस एक चुनावी सर्कस में बदल गया है, ये पूरी तरह पीपली लाइव हो गया है. मगर चुनाव के बाद ये फ़ोकस जल्द ही ख़त्म हो जाएगा."

ansha

इमेज स्रोत, bbc

इमेज कैप्शन, बनारस की अंशा को इन चुनाव से ज्यादा उम्मीद नहीं है.

अंशा जैसे बहुत से लोग हैं बनारस में, जो पिछले खट्टे अनुभवों के बाद किसी नए वादे पर यक़ीन करने में डरते हैं. सुनील कुमार सोनकर ने कहा था, “चुनाव तो पहले भी हुए हैं मगर बनारस को क्या हासिल हुआ? व्यवस्था जस की तस है. बनारस आज भी मध्यकालीन भारत जैसा दिखता है. बनारस को शंघाई जैसी इमारतें नहीं चाहिए, यहाँ घाट की सफ़ाई होनी चाहिए, व्यवस्था सुधरनी चाहिए.”

इससे पहले कि अंशा और सुनील जैसे छात्रों का राजनीतिक व्यवस्था और राजनेताओं से विश्वास पूरी तरह उठ जाए मोदी अगर वडोदरा को छोड़कर बनारस का प्रतिनिधित्व करने का फ़ैसला करते हैं तो उन्हें बनारस के सांसद होने का फ़र्ज़ भी पूरा करना होगा.

बनारस का गंगा से एक अटूट रिश्ता है, ये बात साफ़ थी हैंगआउट के छात्र-छात्राओं की राय से. ज्यादातर चाहते थे कि गंगा साफ़ होनी चाहिए, सिर्फ़ फ़ाइलों में नहीं वास्तव में.

शायद मोदी को भी इस बात का अंदाज़ा है तभी उन्होंने जीत के बाद बनारस में ख़ुद लोगों से भी अपील की कि वे शहर और गंगा की साफ़-सफ़ाई की दिशा में काम करना शुरू करें. देखना होगा कि सांसद मोदी इस दिशा में कितना योगदान दे पाएँगे.

औद्योगीकरण और कृषि

वह जिस राज्य का इतने वर्षों से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं वहीं, अहमदाबाद में स्थित गुजरात विद्यापीठ के एक छात्र बालकृष्ण ने कहा था कि उनके गाँव तक तो नहीं पहुँचा गुजरात का विकास, ''विकास हुआ है. फ़्लाईओवर बने हैं मगर हमारे गाँव में तो आज भी पानी की दिक़्क़त है.''

वहीं की एक छात्रा कृपा के पापा राज्य में पुलिस विभाग में हैं. 1983 से नौकरी में हैं और 30 साल से ज़्यादा की नौकरी में सिर्फ़ साइकिल ले पाए. कृपा ने कहा था, ''पुलिस में नई भर्ती वालों को 2400 रुपए मिलते हैं, उनका गुज़ारा कैसे होगा? भला ये कैसा विकास है?''

बालकृष्ण या कृपा की ये चिंताएँ सिर्फ़ राज्य स्तर की नहीं हैं, इन्हें राष्ट्र स्तर पर समझकर मोदी को विकास के गुजरात मॉडल को देश के अनुरूप परिवर्तित करना होगा.

विद्यापीठ की छात्रा जलपा ने कहा था, “विकास का जो मॉडल है, कृषि और औद्योगिक विकास का योग है. उसमें औद्योगिक विकास ज़्यादा नज़र आ रहा है, कृषि का उस तरह का विकास नहीं हो पा रहा है. सिर्फ़ औद्योगिक विकास से क्या होगा? समाज के अंतिम व्यक्ति तक अग्रणी विकास की बात करनी होगी.”

जलपा जैसे बहुत से लोग हैं जो औद्योगीकरण के विकास का पर्याय बन जाने से चिंतित हैं.

मोदी को पारुल पटेल जैसे युवाओं की बात पर ध्यान देना होगा, “विकास हुआ है मगर वो जिन तक पहुँचना चाहिए क्या वहाँ तक पहुँचा है... और अगर वहाँ तक नहीं पहुँचा है तो कब तक पहुँचेगा... अमीर और अमीर तथा ग़रीब और ग़रीब होने लगे तो इस ओर ध्यान देना होगा.”

नरेंद्र मोदी को देश भर में जिस तरह युवाओं का समर्थन मिला है वह एक बड़ी ज़िम्मेदारी भी लेकर आया है. युवाओं की आँखों में विकास का जो सपना उतर गया है वो सरकार की प्राथमिकताओं में राजनीतिक कारणों से नीचे न चला जाए मोदी को ये सुनिश्चित करना होगा.

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप हमसे फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ सकते हैं)