किबिथू गांव के लिए दिल्ली दूर रंगून पास

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बिजली कभी-कभी. मकान कच्चे. फ़ोन नहीं. इंटरनेट नहीं. रास्ता दुर्गम. मकान कच्चे. मीडिया नहीं. वोटर 51. राष्ट्रीयता भारतीय. नक्शे पर देखें तो, रंगून दिल्ली से ज़्यादा नज़दीक है चीन और बर्मा की सरहद से सटे किबिथू से.
मैं भारत के सबसे पूर्वी गांव जाकर वहां के लोगों के चेहरे देखना चाहती थी.
असम के डिब्रूगढ़ से 300 किलोमीटर और आगे अरुणाचल प्रदेश के इस गांव में. चाय बागानों के परे पहाड़ियों को पार कर. लोकतंत्र, नागरिकता, अधिकारों, चुनावों, आज़ादी और ज़िंदगी के बारे में बात करने के लिए. उनकी बात सुनने के लिए.
दिल्ली में बैठकर लगता है, देश यहीं से चलता है. दिल्ली और देश के बाक़ी हिस्से एक दूसरे की पंहुच में हैं. सबसे दूरस्थ गांव जाकर रिपोर्टिंग करने का विचार ही मुझे बहुत सारे उत्साह, रोमांच, डर और काल्पनिक थकान से भर देता है.
अगले तीन दिन ऐसे ही रहे.
अपने देश में परमिट
बढ़िया पक्की सड़क के दोनों ओर हरे रंग के कालीन जैसे ख़ूबसूरत चाय बागान, असम के डिब्रूगढ़ से तिनसुकिया का रास्ता काफ़ी हसीन है. फिर दृश्य बदलता है. अरुणाचल प्रदेश की सीमा में दाख़िल होते सड़कें टूटी ज़्यादा हैं और बनी कम, गिट्टी के रास्ते के चारों तरफ़ घने जंगल हैं.
कभी भी हाथी या तेंदुए सड़क पर आ सकते हैं, ऐसा लोग कहते हैं. मुझे नहीं मिले. वीरान इलाक़ा. कहीं-कहीं दो-एक झोंपड़ियों के अलावा आबादी नहीं के बराबर.

अरुणाचल प्रदेश भारत के उन दो राज्यों (दूसरा मिज़ोरम) में से एक है, जहां जाने के लिए देश के नागरिक होने के बावजूद परमिट लेना ज़रूरी है. ये क़ायदा बना तो अंग्रेज़ों के ज़माने में था, पर लागू अब भी है.
देश से दूरी का फ़ासला थोड़ा और बढ़ाते हुए. कुछ घंटों में जंगल छंटते हैं और सामने पहाड़ हैं. अगले क़रीब 250 किलोमीटर तक. औसत रफ़्तार 25 किलोमीटर प्रति घंटा, पर कई जगह सड़क टूटी होने की वजह से यह 10 किलोमीटर प्रति घंटा तक भी हो सकती है.
नेटवर्क ख़त्म
टूटी-फूटी सड़क और संकरे रास्ते. कई जगह तो पहाड़ ऐसे कटे थे कि सामने कुछ नहीं दिखता था,
सामने से कोई गाड़ी आ जाए, तो पक्की सड़क छोड़कर कच्चे हिस्से में अपनी कार को रोकना पड़ता था.
मैं खाई की तरफ़ बैठी थी और नीचे की ओर न देखने की असफल कोशिश करती रही.
गाड़ी में ड्राइवर ने अपने मोबाइल में हिंदी फ़िल्मों के गाने लगाए थे. शायद नींद भगाने के लिए, शायद खाई और ख़तरे से ध्यान भगाने के लिए.
अब कई घंटों से मोबाइल नेटवर्क नहीं पकड़ रहा था यानी किसी मुसीबत में फंसने पर मदद के लिए किसी से संपर्क करने का कोई ज़रिया नहीं.
फिर शाम ढलते-ढलते मौसम ख़राब हो गया, एक ढाबे पर रुके तो पता चला कि पिछली दो रातों से पहाड़ के ऊपरी इलाक़े में बारिश हो रही थी और आज भी वही आसार थे.
रात हुई, तो झमाझम बारिश भी शुरू हो गई. अब सिर्फ़ वाइपर की आवाज़, गाड़ी की हेडलाइट की रौशनी और सीट बेल्ट पकड़े मैं. ये रोमांचक था या डरावना नहीं कह सकती.
रात के बाद
अब भी किबिथू से क़रीब 100 किलोमीटर दूर थे. अब आगे जाना ख़तरे से ख़ाली नहीं था, इसलिए हम रात में हाइलॉन्ग नाम की जगह पर रुके.
यहां सेना का बेस कैंप होने की वजह से आख़िरकार फ़ोन का नेटवर्क मिला, पर सुबह वहां से निकलते ही चला गया.

रात भर बिजली चमकती रही, बादल गरजते रहे और तेज़ बारिश की आवाज़ कानों में पड़ती रही. फिर भी सुबह हमने बेहतर मौसम की उम्मीद के साथ अपने सफ़र की शुरुआत की.
हमें बताया गया था कि तीन दिन की बारिश ने मिट्टी को ढीला कर दिया होगा और हम जितना ऊपर बढ़ेंगे, चट्टानों के धसकने का ख़तरा भी बढ़ता जाएगा.
और हम कुछ ही दूर आगे बढ़े तो सड़क पर चट्टानें गिरी हुई मिलीं भी. बार-बार गाड़ी रोकते और उतरकर चट्टानें हटाते, हम धीरे-धीरे बढ़ रहे थे कि अचानक सामने पहाड़ ही धसका हुआ था.
रास्ता बंद था और चट्टानों समेत कई पेड़ गिरे हुए थे. कुछ चट्टानें अभी भी लुढ़ककर गिर रही थीं. यह भूस्खलन शायद कुछ ही देर पहले हुआ था.
पहला ख़्याल मन में आया कि अब आगे नहीं जा पाएंगे, रास्ता साफ़ होने में कई दिन लग सकते हैं, तो हमें लौटना ही होगा. पर दूसरे ही पल सोचा कि अगर हम कुछ देर पहले निकले होते, तो शायद इसकी चपेट में आ जाते.
क़तार के लगभग आख़िरी
अपने मन की मायूसी और संतोष का कोलाहल दबाते हुए हम पलटे और फिर चल पड़े भारत की सबसे पूर्वी सड़क पर.

वहीं कपड़े सुखाते हुए मुझे मिलीं बनिम्ला नागर, वो वहीं रहती हैं, सड़क के किनारे. अपने पति और दो बच्चों निक्की और मिशेल के साथ. आम दुनिया के संपर्क से दूर.
टीन की तीन झोंपड़ियों की ओर इशारा कर मुझे बोलीं कि ये उनके घर हैं. एक में दुकान चलती है, एक में किचन और बैठने का कमरा है और एक उनका बेडरूम है.
उनके पति कुछ किलोमीटर दूर लूई गांव के सरकारी स्कूल में टीचर हैं. घर में बिजली आती है, पर मौसम ख़राब हो तो कई घंटे गुल भी रहती है.
मैं पूछती हूं कि बाक़ी दुनिया से कटा-कटा महसूस नहीं होता क्या? बनिम्ला हंसती हैं और कहती हैं, “जहां रहने लगो, वहां की आदत हो जाती है और यह इतना ख़ूबसूरत है, सब कुछ पास ही तो है. बस फ़ोन करना हो तो कुछ किलोमीटर चलना पड़ता है, हाईलॉन्ग में नेटवर्क मिल जाता है.”
भूस्खलन की उन्हें ज़्यादा परवाह नहीं. कुछ दिन में रास्ता ठीक हो जाएगा और ज़िंदगी फिर चल पड़ेगी अपनी रफ़्तार पर.
बनिम्ला के बच्चे पास के शहर के प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं. वो कहती हैं कि उनके पति के सरकारी स्कूल के मुक़ाबले वहां बेहतर पढ़ाई होती है.
यानी इन घने हरे पहाड़ों के बीच वह और उनके पति ही रहते हैं. मैं बोल पड़ी कि यह तो हनीमून जैसा है, तो बनिम्ला ने भी कहा, “हां, हनीमून ही तो है.”
दिल्ली फिर भी दूर है
चलते-चलते एक शहरी पत्रकार की तरह मैं बनिम्ला से पूछ बैठी कि नरेंद्र मोदी के बारे में जानती हैं क्या? उन्होंने हां में सर हिला दिया. पर तपाक से बोलीं, “हमारे इलाक़े में तो कांग्रेस ने अच्छा काम किया है, तो हमें तो उसके बारे में ही सोचना पड़ेगा न.”
पर देश की सरकार? बनिम्ला मुस्कुरा दीं. कहा उनके लिए देश उनका लूई गांव ही है. सरकार उनकी सुध लेने आई थी और उनके लिए इतना काफ़ी था.
जैसे बनिम्ला मुझे मिलीं, वैसे ही उनके इलाक़े से कांग्रेस के विधायक और मौजूदा राज्य सरकार में वित्त मंत्री कालिखो पुल हमसे अचानक टकरा गए हाइलॉन्ग के बाज़ार में.
साल 1995 से वह लगातार इस इलाक़े से विधायक चुने जाते रहे हैं. बोले, “मेरा रिकॉर्ड है, और इस बार भी रहेगा, लोकसभा के साथ ही राज्य के चुनाव भी हो रहे हैं. हमारे इलाक़े से विधायक भी कांग्रेस का होगा और सांसद भी.”

और इलाक़े के बाहर, क्या भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस को पछाड़ देगी? क्या नरेंद्र मोदी राहुल गांधी से ज़्यादा लोकप्रिय हैं? मैं सवाल को चाहे जितना घुमाती, पुल साहब का जवाब बदलता ही नहीं था. बार-बार कहते रहे, “मैं अपने इलाक़े के बारे में जानता हूं. मैंने ईमानदारी से काम किया है, देश का बाक़ी लोग जानें.”
एक लिहाज़ से गांव की रहने वाली बनिम्ला और उनके विधायक में ख़ास फ़र्क नहीं था. दोनों की ज़िंदगी सरल और अपने तक सीमित थी.
दरअसल बात मोबाइल या फ़ोन से संपर्क न होने की नहीं थी, बल्कि बाक़ी देश से सरोकार न रहने की थी.
मैं किबिथू तक तो नहीं जा पाई, पर उसके रास्ते ने वहां की वास्तविकता का थोड़ा अहसास तो दिला ही दिया.
कंक्रीट के शहरी जंगल की ओर लौटते व़क्त मैं सोचती रही उन अनसुलझे सवालों के बारे में, जिनके साथ सफ़र शुरू किया था.
पर चेहरे पर मायूसी नहीं ठहराव था क्योंकि बार-बार ज़ेहन में आते रहे वो सहज सुलझे जवाब जो बिन मांगे ही मुझे मिल गए थे.
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