भारत में क्यों होते हैं इतने लंबे चुनाव?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
भारत में जारी आम चुनाव के तहत बुधवार को आठवें चरण का मतदान होना है. ऐसे में कई लोग सवाल पूछ रहे हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदान को इतना लंबा खींचने की क्या ज़रूरत है.
भारत की 16वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव में 543 सीटों पर सात अप्रैल से 12 मई तक नौ चरणों में मतदान हो रहा है. यह प्रक्रिया 36 दिन तक चलेगी जो कि देश के इतिहास में सबसे लंबी है.
साल 2009 के आम चुनाव में मतदान पाँच चरणों में हुआ था और इसमें लगभग एक महीने का समय लगा था. इस बार चुनाव के चरण पिछली बार की तुलना में लगभग दोगुना हैं लेकिन इसमें उस हिसाब से ज़्यादा समय नहीं लगेगा.
इस बार ज़्यादा चरणों की वजह पूर्वोत्तर की 16 सीटों को माना जा रहा है, जहाँ "प्रशासनिक कारणों" से वोटिंग के लिए तीन दिन निर्धारित किए गए थे.
संभव है एक दिन में चुनाव?
राजनीतिक विश्लेषक जाविद लाइक़ कहते हैं कि यह <link type="page"><caption> ऐसा चुनाव है जिसका कोई अंत नहीं</caption><url href="http://indianexpress.com/article/opinion/columns/an-election-without-end/99/" platform="highweb"/></link> दिखता है. वह कहते हैं कि भारत के लंबे चुनाव अनपेक्षित परिणामों की तरफ़ ले जाते हैं. इससे चुनाव प्रचार तीखा और कटुतापूर्ण हो जाता है और आदर्श आचार संहिता के कारण विकास कार्य ठप पड़ जाते हैं.
वह सवाल उठाते हैं, "अगर इंडोनेशिया और ब्राज़ील जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश अपना चुनाव एक दिन में समाप्त कर सकते हैं तो क्या भारत अपनी मज़बूत चुनावी मशीनरी के दम पर एक दिन में चुनाव संपन्न नहीं करा सकता?"
हमेशा से ही ऐसा नहीं था. साल 1951-52 में हुए देश के पहले ऐतिहासिक आम चुनाव को संपन्न करवाने में तीन महीने लगे थे.
साल 1962 और साल 1989 के बीच हुए आम चुनाव चार से दस दिन में पूरे हुए थे. साल 1980 में चार दिनों में संपन्न हुए चुनाव अब तक के सबसे छोटे चुनाव थे.
लंबे चुनावों की वजह

लेकिन इन अधिकाशं चुनावों के दौरान हिंसा हुई थी और ज़्यादातर मामलों में वे स्वतंत्र व निष्पक्ष नहीं थे. चुनावों के दौरान सैकड़ों लोगों ने झड़पों में अपनी जान गंवाई. मत पेटियों के साथ छेड़छाड़ और मतदाताओं को धमकाने जैसी बात आम थी. स्थानीय पुलिस व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम थी और अक्सर उस पर सत्ताधारी दल के नेताओं के दबाव में काम करने का आरोप लगता था.
1990 के दशक में बेहद सख्त माने जाने वाले नए चुनाव आयुक्त <link type="page"><caption> टीएन शेषन</caption><url href="http://en.wikipedia.org/wiki/T._N._Seshan" platform="highweb"/></link> के कार्यकाल में चीज़ों को बदलने की शुरुआत हुई थी. शेषन ने चुनावों के दौरान हिंसा रोकने के लिए केंद्र सरकार से अर्द्धसैनिक बलों की माँग की. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से <itemMeta>hindi/india/2014/04/140425_caste_politics_india_electionspl2014_rd</itemMeta> पर्याप्त सुरक्षा बल मुहैया कराने को कहा.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी बताते हैं, "लंबे और कई चरणों में संपन्न होने वाले चुनाव का एकमात्र कारण सुरक्षा है."
उनके मुताबिक़, "स्थानीय पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगता है इसलिए हमें केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ती है. इन सुरक्षा बलों को उनकी बाक़ी ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर दिया जाता है और चुनावों के दौरान शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए उन्हें पूरे देश में भेजा जाता है. यही कारण है कि इसमें समय लगता है."

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इस बार के चुनावों में तक़रीबन 120,000 केंद्रीय सुरक्षा बलों की ऐसी टुकड़ियां इस बार तैनात की गई हैं. इनमें सीमा सुरक्षा बल, औद्योगिक सुरक्षा बल और रेलवे सुरक्षा बल के जवान शामिल हैं.
'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव'
मतदाताओं, मतदान केंद्रों, मतगणना केंद्रों और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा बलों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक बस और ट्रेन के माध्यम से पहुँचाना बेहद कठिन काम है.
क़ुरैशी कहते हैं, "साफ़-सुथरे चुनाव करवाना चुनाव आयोग की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है. जब से कई चरणों में चुनाव प्रारंभ हुए हैं, निश्चित रूप से वे पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और निष्पक्ष हो गए हैं.
लेकिन क्या लंबे समय तक खिंचने वाले चुनाव का मतदान के व्यवहार पर कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा जबकि एक्ज़िट पोल, सोशल मीडिया और राजनीतिक दलों के पक्ष और विपक्ष में अभियान चलते रहते हैं?
दिल्ली में सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़ के राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं कि ऐसा कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है जिसके आधार पर यह निश्चित तौर पर कहा जा सके कि ऐसा ही होगा.

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उनका अनुमान है कि लंबी अवधि वाले चुनाव में संभव है कि उस पार्टी के जीत का अंतर बढ़ जाता है जिसके समर्थन में लहर होती है और जिसके बड़े अंतर से जीतने की उम्मीद होती है.
लंबे चुनावों का असर
लेकिन काँटे की टक्कर वाले मुक़ाबलों में लंबे चरण के चुनावों से अंतिम नतीज़ों पर मुश्किल से ही कोई असर होता है क्योंकि मतदाता "नहीं जानते कि कौन जीत रहा है." इसलिए कई चरणों वाले चुनाव का अंतिम नतीजों पर कोई असर नहीं होता.
कई लोगों का मानना है कि चरणों में होने वाले चुनाव से शुरुआती दौर वाले में लड़ने वाले प्रत्याशियों और दलों को नुकसान होता है क्योंकि उन्हें अपने चुनाव अभियान के लिए कम समय मिलता है.
लेकिन बाद के चरणों में चुनाव लड़ने वाले दलों और प्रत्याशियों को ज़्यादा पैसा ख़र्च करना होता है और गर्मियों में होने वाले लंबे चुनावी अभियान में ज़्यादा ऊर्जा लगानी पड़ती है. वास्तव में लंबा चुनावी अभियान किसी के पक्ष में नहीं होता.
भारत के लंबे चुनाव वास्तव में देश की एक सबसे बड़ी कमज़ोरी को उजागर करते हैं. वह है कम वेतन पाने वाली, अव्यवस्थित, कम प्रशिक्षित और अपर्याप्त पुलिस. जब तक कि पुलिस बल को मज़बूत नहीं किया जाता है और इसके स्तर में सुधार नहीं किया जाता है, मतदाताओं को इसी तरह के "अंतहीन चुनावों का सामना" करना होगा.
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